*बस बहुत हो गया* – तोषिका

“*बस बहुत हो गया*। मेरी बेटी अब एक पल भी इस घर में नहीं रहेगी।” माही के पिता रामचरण ने बोला। “अरे पापा, आप ऐसा क्यों बोल रहे है, छोटी सी बात है इसमें घर ले जाने वाली कौन सी बात हो गई।

शादी को अभी एक साल भी नहीं हुआ है।” माही के पति कार्तिक ने बोला। “ये कोई छोटी बात नहीं है, तुमने जो किया है वो बहुत गलत है।” रामचरण ने चिल्लाते हुए बोला।

घर का माहौल बिल्कुल शांत हो गया था। किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या बोले। तभी एक हल्की सी आवाज आई सबने उधर देखा तो कार्तिक की मां वहां खड़ी थी और वो बोली “भाई साहब मैं मानती हू मेरे बेटे से गलती हुई है,

उसको ऐसा नहीं करना चाहिए था और इस बात को लेकर मैं बहुत शर्मिंदा भी हू, लेकिन आप मेरे बेटे को एक मौका और दे दीजिए वो ऐसी गलती दुबारा नहीं करेगा।

रामचरण ने बोला “देखिए मैं आपके जज़्बात समझ रहा हू, पर जिस समय आपके बेटे ने मेरी बेटी पर हाथ उठाया वो भी बस इसीलिए क्योंकि वो गुस्से में था, आपको तभी रोक लेना चाहिए था।”

अपनी बात को पूरी करते हुए रामचरण आगे बोला “अगर आप चाहती, तो आप तभी अपने बेटे को बताती कि वो कितना गलत है। रही बात इस रिश्ते को एक और मौका देने की तो आप मुझे माफ कीजिए, मैं नहीं देना चाहता दूसरा मौका।

आज ये पहली बार हुआ है, ऐसा उसको किसी ना किसी बात पर गुस्सा आता रहेगा तो वो फिर वो ही गलती दुबारा करेगा और जब गुस्सा शांत हो जाएगा तो माफी मांग लेना।”

कार्तिक की आवाज़ में अब थोड़ा चिड़चिड़ा पन था और वो अपनी आवाज को तेज करते हुए बोला “पापा, इतनी बड़ी भी कोई बात नहीं है, हर घर की कहानी है ये और रही बात माही को यहां से ले जाने की तो आप अगर लेकर जाएंगे तो बदनामी आपकी होगी और फिर आपकी बेटी से कोई शादी करना भी पसंद नहीं करेगा”।

कार्तिक इस से पहले आगे कुछ बोले एक दम से चटाक आवाज आई और वो रामचरण ने मारा था कार्तिक को । उनको अब कार्तिक से ज्यादा उसकी छोटी सोच पर गुस्सा आ रहा था और सबसे ज्यादा अपने ऊपर क्योंकि उन्होंने खुद ही अपनी एक लौटी बेटी के लिए लड़का ढूंढा था।

राम चरण बोला “हमारे घर में ऐसा कुछ नहीं होता है, चाहे वो बड़ा हो छोटा हो या फिर कोई औरत या स्त्री हम कभी किसी पर हाथ नहीं उठाते है और, मुझे कोई शरम नहीं है अपनी बेटी को वापिस घर ले जाने के लिए। आप लोगों को बस बाहरी दुनिया क्यूं बोलेगी उसको पढ़ी है लेकिन मुझे समाज से ज्यादा मेरी बेटी को फिक्र है।”

ये सब माही खड़े हो कर सुन रही थी और जैसे ही उसने ये सुना। वो बाहर गई और अपने पिता को गले लगा लिया।

राम चरण ने अपनी बेटी को बोला “चल बेटा, अपने घर चलते है।”

साथ ही में कार्तिक की मां की तरफ देख कर बोला “हमें अपनी बेटी प्यारी है और अगर आपको अपना बेटा प्यारा हैं तो आप कृपया कर उसको सुधारे क्योंकि ऐसे आदते आसानी से नहीं जाती है”।

ये कहकर वो अपनी बेटी को वहां से आजाद कर दिया जिसके बंधनों की जकड़न बहुत मजबूत थी।

कुछ समय के बाद कार्तिक के घर पर तलाक के कागजात आए और उसने दस्तखत भी कर दिए जैसे उसको कोई फर्क ही नहीं पड़ता और तलाक के तुरंत बाद ही दूसरी शादी कर ली लेकिन इस बार कार्तिक की मां अपने बेटे को गलतियों पर पर्दा नहीं डालती और अगर कार्तिक कुछ गलत भी करे तो उसे रोकती भी है।

और दूसरी तरफ माही ने अपना आगे की पढ़ाई पूरी कर के अपने नए भविष्य की ओर कदम बढ़ाया और इस बार उसे मत पिता उसके साथ खड़े थे तो उसको बिल्कुल भी डर नहीं लग रहा था। साथ ही में माही के पिता अपनी बेटी को फिरसे पुराने जैसे हस्ते हुए देख कर बहुत खुश हुए क्योंकि उनके लिए उनकी बेटी से बढ़कर कुछ नहीं है।

#जैसा हम बचपन से देखते आए है, वैसा ही बच्चे सीखते है इसीलिए हमें कोशिश करनी चाहती कि हम बच्चों के लिए एक अच्छे सलाहकार बने। अपने जीवन साथी की इज्जत करे और बच्चों को प्यार से पाले।

लेखिका

तोषिका

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