ऑंखें खुल जाना – एम. पी. सिंह “मोहि”

राजू के पैदा होते ही उसकी मां गुजर गई थी और जब वो 7 साल का था, उसके पिता भी गुजर गए थे। दादी थी नहीं, इसलिए दादा ने जैसे-तैसे बड़ा किया। 15 साल की उम्र में दादा भी साथ छोड़ गए। पेट भरने के लिए उसने पढ़ाई छोड़ दी और एक स्कूटर रिपेयर की दुकान पर काम करने लगा।

मेहनत और समय के साथ-साथ वो अच्छा मैकेनिक बन गया और आज अपनी अलग दुकान चला रहा है। शादी के कुछ ही महीनों बाद उसकी पत्नी राधा ने अपनी खुद की दुकान खोलने के लिए प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया जिससे उसकी मेहनत और हुनर किसी और की जेब में न जाएं।

इस काम के लिए उसने अपना सोना-चांदी सब दे दिया और राजू ने गहने बेच कर अपनी खुद की एक दुकान उसी बाजार में शुरू कर दी। लोग उसे और उसके काम से वाकिफ थे,

इसलिए बिना किसी परेशानी के धंधा चल निकला। इसी के साथ एक खुशखबरी और आ गई, कि राजू बाप बनने वाला है। समय बीता और राधा ने एक प्यारी सी लड़की को जन्म दिया। राधा और राजू बहुत खुश थे और बेटी का नाम खुशी रखा।

खुशी के पैदा होने के बाद न जाने राधा को क्या हो गया कि वो अक्सर बीमार रहने लगी और दिन-ब-दिन कमजोर होती गई। बहुत इलाज कराने के बाद भी उसकी सेहत में कोई सुधार नहीं हो रहा था। खुशी मां के हर छोटे-बड़े काम में हाथ बटाती और समय से पहले ही समझदार हो गई।

खुशी जब 8-9 साल की थी, एक दिन अचानक राधा की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई और हॉस्पिटल में 2-3 दिन के इलाज के दौरान ही वो खुशी और राजू को अकेला छोड़ कर सदा के लिए चली गई।

पत्नी के गुजर जाने के बाद राजू को खुशी की बहुत चिंता होने लगी, वो अच्छी तरह जानता था कि बिन मां-बाप के बच्चों की क्या दशा होती है। राजू ने दूसरी शादी करने का फैसला किया और कुछ ही महीनों बाद कोयल नाम की लड़की से शादी कर ली। कुछ दिन तो सब ठीक रहा,

फिर सौतेली मां ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए और खुशी से घर के सारे काम करवाने लगी। कोयल की मां और भाई भी आए दिन वहीं पड़े रहते और कोयल को सौतेली बेटी के खिलाफ भड़काते रहते। खुशी सब समझती थी पर कुछ नहीं बोलती थी बस मुस्कुरा कर काम करती रहती।

कुछ समय बाद राजू को पता चला कि कोयल मां बनने वाली है तो वो बहुत खुश हुआ। परंतु उसकी ये खुशी ज्यादा दिन नहीं रही, क्योंकि एक दिन कोयल बाथरूम में गिर गई और उसका मिसकैरेज हो गया।

ज्यादा ब्लीडिंग होने की वजह से खून और पैसों की जरूरत पड़ गई। ऐसे वक्त में कोयल की मां और भाई कोई सहारा न देकर गांव चले गए परंतु खुशी ने मां की बहुत सेवा की और उसे पूरा आराम दिया। जैसे मां बच्चों को पालती/डांटती है, वैसे ही खुशी अपनी मां को पाल रही थी। 

राजू अब देख-समझ रहा था और एक दिन खुशी से बोला, कोयल तुम्हारे साथ कितनी ज्यादती करती है फिर भी तुम उसकी सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ रही हो।

खुशी पापा से बोली, मां मुझे बेटी माने या न माने पर मैंने उन्हें मां समझा है। मैं किस्मत वाली हूं क्योंकि बहुत से बच्चे तो ऐसे भी होते हैं जिन्होंने मां-बाप को कभी देखा ही नहीं।

कोयल लेटी हुई बाप-बेटी की सब बातें सुन रही थी और उसके बाद अपने आंसुओं को

रोक नहीं पाई और उठकर खुशी को गले लगा लिया और बोली, “बेटी, मुझे माफ कर दो, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। तुम्हारी बातों ने मेरी “आँखें खोल दीं” और मुझे अपनों की पहचान करवा दी। अपने वो नहीं होते जिनसे खून का रिश्ता होता है बल्कि वो होते हैं जो दिल से बनाए और निभाए जाते हैं। आज के बाद तू ही मेरी बेटी है और मैं गर्व से सबको बताऊंगी कि मैं खुशी की मां हूं।

उस दिन के बाद से राजू, कोयल और उनकी इकलौती बेटी खुशी, मिलजुल कर प्यार से रहते हैं।

एम. पी. सिंह “मोहि”

कोटा, राज़.

स्वरचित

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