ऑफिस से लौटते ही अनुराग ने पंखा फुल स्पीड पर चलाया और सोफ़े पर मोबाइल लेकर पसर गया।
“आशी, ज़रा जल्दी चाय बना दो। आज ऑफिस में बहुत काम था… जान ही निकल गई।”
आशी भी उसी के साथ ऑफिस से लौटी थी। उसने मुस्कुराकर पहले अनुराग को पानी दिया, फिर स्कूल से लौटे बच्चों के जूते-मोज़े उतरवाए, यूनिफॉर्म बदली।
“मम्मा… बहुत भूख लगी है। मैगी बना दो।”शानू की आवाज आई
“मम्मा, पहले मेरी ड्राइंग के लिए कोई टॉपिक बता दो तनु ड्राइंग कॉपी लेकर खड़ी हो गई।
आशी एक हाथ से बच्चों को संभाल रही थी, दूसरे हाथ से गैस पर चाय चढ़ा चुकी थी।
ड्रॉइंग रूम में बैठे अनुराग ने आवाज़ लगाई— “और हाँ, चाय के साथ कुछ पकौड़े भी बना देना। मौसम अच्छा है।”
बिना झुंझलाए आशी ने खौलते पानी में मैगी डाली और बेसन घोलने की तैयारी करने लगी।
जा मेरे लिए मैगी ले आ किचन से बड़े भाई शानू ने छोटी बहन तनु को आदेश सा दिया तो तनु जो ड्राइंग में उलझी थी तुनक कर बोली , जाओ जाओ अपने आप ले आओ मैं क्या तुम्हारी नौकर लगी हूं..?? सुनते ही पास बैठी दादी मालिनी जी नाराज हो गईं अरे ऐसे बोलते हैं क्या लड़की हो छोटी बहन को तो बड़े भैया का ख्याल रखना चाहिए ना देखो तो मेरा बाबू कितना थक कर आया है स्कूल से कहते हुए बड़े दुलार से शानू के सिर पर हाथ फिराने लगीं।
ओहो बड़ा लाट साहब है कितना थक गया है दादी मै भी स्कूल से ही लौट कर आई हूं और ड्राइंग बना रही हूं इससे छोटी हूं फिर भी नहीं थकी है ना पापा..!! मुंह चढ़ाकर तनु बोल उठी और दादी को भैया का बेवजह लाड़ करते देख चिढ़ कर पापा की गोदी में बैठ गई।
अनुराग ने मोबाइल किनारे रखते हुए बेटी को प्यार से बिठा लिया हां हां मेरी लाडो बेटी भी स्कूल से थक कर आई है जाओ शानू अपनी मैगी खुद लेकर आओ और अपनी छोटी बहन के लिए भी ले आओ ।
क्यों क्यों मै क्यों जाऊं?ये तो लड़की है दादी ठीक कहती हैं इसको करना ही चाहिए शानू दादी से लाड़ करवाता अहम से बोला।
अब जमाना बदल गया है बेटा लड़का लड़की सब बराबर हैं तुम्हारी दादी पुराने खयाल की हैं उन्हें क्या पता।उनके जमाने में तो लड़कियां पढ़ाई ही नहीं करती थीं और आज के जमाने में देखो तुम्हारी मम्मी ऑफिस में नौकरी कर रही हैं पूरे आत्मविश्वास से अनुराग ने कहा।
हां और घर के सारे काम भी..!! मम्मी ही करती हैं।वो भी तो आपकी तरह अभी ऑफिस से लौट कर आईं हैं लेकिन आप थक गए और सोफे पर लेट कर आराम से मोबाइल चला रहे हैं जबकि मम्मी बिना रुके चाय पानी मैगी और पकौड़े बना रही हैं सबका ख्याल रखने का काम उन्हींका है शानू ने आराम से कहा तो एक पल को अनुराग और उनकी मां सन्नाटे में आ गए।
पापा पापा मै भी खूब पढ़ाई करके जब नौकरी करूंगी तब भी मैं ही सबके लिए चाय और नाश्ता बनाऊंगी …कौन बनाएगा नन्हीं तनु परेशान सी पापा को हिला हिला कर पूछ रही थी।
किचेन में पकौड़े की तैयारी करती आशी ठहर सी गई।
अनुराग की माँ चुपचाप सब देख रहीं थीं।
कुछ देर बाद वे धीरे से रसोई में पहुँचीं। आशी के माथे पर पसीना था। उन्होंने बिना कुछ कहे उसके हाथ से बेसन ले लिया।
“बहू, तुम जाकर पाँच मिनट बैठ जाओ।”
“अरे नहीं माँजी, अभी हो जाएगा…”
“मैंने कहा ना, जाओ।”
आशी संकोच से बाहर आकर बैठ गई।
माँ ने अनुराग को आवाज़ दी— “बेटा, ज़रा इधर आओ।”
“जी माँ?”
“तुमने अभी कहा था कि ऑफिस में बहुत काम था?”
“हाँ माँ, बहुत थक गया हूँ।”
माँ ने शांत स्वर में पूछा—
“और बहू कहाँ से आई है?”
“ऑफिस से…”
“अच्छा… तो क्या उसके ऑफिस में आज छुट्टी थी? “फिर बात और व्यवहार में इतना अंतर क्यों?”
अनुराग चुप।
माँ आगे बोलीं—
“बेटा, जब तुम छोटे थे, तब मैं तुम्हारे पिताजी से यही शिकायत करती थी। वे बाहर की थकान गिनाते थे, मेरी नहीं। तब मैंने मन ही मन ठान लिया था कि अगर मेरा बेटा बड़ा होकर यही करेगा, तो समझूँगी मेरी परवरिश अधूरी रह गई।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
माँ ने चाय की ट्रे अनुराग की ओर बढ़ाते हुए कहा—
“लो, आज चाय तुम बनाकर लाए हो या मैं—इससे फर्क नहीं पड़ता। फर्क इससे पड़ता है कि घर किसे अपना काम और किसे ‘उसका काम’ समझता है।”
फिर मुस्कुराकर बोलीं—
“बेटा, दोहरे चेहरे केवल समाज और राजनीति में नहीं होते। वे घरों में भी होते हैं। बाहर बराबरी की बातें करना आसान है, लेकिन घर के भीतर उन्हें जीना कठिन। बच्चे हमारे उपदेश नहीं, हमारा व्यवहार पढ़ते हैं।”
अनुराग ने पहली बार मोबाइल मेज़ पर रखा, चाय की ट्रे उठाई और रसोई की ओर बढ़ गया।
पापा मै भी आ रहा हूं शानू के व्यवहार में तत्काल परिवर्तन हो गया।
दरवाज़े पर खड़ी उसकी बेटी यह सब देख रही थी।उसे अपनी ड्राइंग का टॉपिक मिल गया उसने ड्राइंग कॉपी में पापा के हाथ में चाय की ट्रे बना दी और नीचे लिखा—
“आज पापा ने मुझे बराबरी का पाठ नहीं पढ़ाया…
बराबरी करके दिखाई।”
मम्मा देखो मेरी ड्राइंग अच्छी है ना आशी के सामने उत्साह से अपनी ड्राइंग कॉपी रखते हुए तनु बोल उठी।
आशी कुछ क्षण चित्र को निहारती रही। उसकी आँखों में अनकही चमक थी।
दादी ने भी कॉपी देखी। हल्की-सी मुस्कान उनके होंठों पर तैर गई।
“बेस्ट ड्राइंग…” उन्होंने धीमे से कहा।
क्योंकि इस बार रंग केवल कागज़ पर नहीं बिखरे थे,
एक घर की सोच भी नए रंगों से भर उठी थी।
लतिका श्रीवास्तव
दोहरे चेहरे # कहानी प्रतियोगिता