सैंडविच जनरेशन’

सुधा जी ने अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछते हुए कहा। “याद है आपको जब मेरी शादी होकर बनारस आई थी? अम्मा जी (रामनाथ जी की माँ) का कितना कड़ा अनुशासन था। सुबह चार बजे उठकर पूरे घर का आंगन लीपना, चूल्हे पर सबके लिए रोटियां सेंकना। मजाल है जो कभी अपनी मर्जी से मायके जाने का नाम भी ले लूँ। पूरी जवानी सास-ससुर की सेवा में, उनके ताने सुनने में और उनकी हर हाँ में हाँ मिलाने में निकाल दी। हमने कभी बड़ों के आगे जुबान नहीं लड़ाई, क्योंकि तब संस्कार यही कहते थे कि बड़ों का कहा मानना है।”

 सुधा जी के हाथ मशीन की तरह चल रहे थे। गैस के एक बर्नर पर दूध उबल रहा था, दूसरे पर सब्जी छौंकने की तैयारी हो रही थी और चॉपिंग बोर्ड पर उनके हाथ तेजी से प्याज-टमाटर काट रहे थे। उनकी कमर का दर्द आज फिर से उभर आया था, लेकिन रुकने का कोई उपाय नहीं था। उनका बेटा विकास और बहू अंजलि बस ऑफिस से आते ही होंगे। उनके आने से पहले रात का खाना तैयार होना चाहिए, क्योंकि दोनों दिन भर के थके-हारे आते हैं और आते ही उन्हें गरमा-गरम खाना चाहिए होता है।

ड्राइंग रूम में उनका सात साल का पोता, कबीर, अपने खिलौनों के साथ पूरे कमरे में एक युद्ध का मैदान बनाए हुए था। टीवी पर किसी कार्टून चैनल की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि सुधा जी को अपने ही विचारों की आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी।

“अरे कबीर बेटा, टीवी की आवाज़ थोड़ी कम कर लो, मेरे सिर में दर्द हो रहा है,” सुधा जी ने रसोई से ही आवाज़ लगाई। लेकिन कबीर अपने खेल में इतना मगन था कि उसने सुना ही नहीं।

उसी ड्राइंग रूम के एक कोने में रखे आरामदेह सोफे पर सुधा जी के पति, रामनाथ जी, शांति से बैठकर अपने मोबाइल में पुराने भजन सुन रहे थे। उन्हें देखकर सुधा जी के अंदर का गुबार अचानक फूट पड़ा। वह हाथ में पकड़ा हुआ चाकू स्लैब पर जोर से पटकते हुए बाहर आईं।

“मुझसे अब यह कोल्हू के बैल वाली जिंदगी और नहीं जी जाती!” सुधा जी की आवाज़ में थकान और चिड़चिड़ाहट दोनों साफ झलक रहे थे। “आप तो सारा दिन बस सोफे पर बैठकर भजन सुनते रहते हैं या बालकनी से गाड़ियां गिनते हैं। और एक मैं हूँ, सुबह उठने से लेकर रात के ग्यारह बजे तक इस घर में चक्की पीस रही हूँ। पहले कबीर को स्कूल के लिए तैयार करो, उसका टिफिन बनाओ, फिर वो कामवाली बाई… आज फिर उसने बिना बताए छुट्टी कर ली! अब सारा घर भी मैं समेटूं, झाड़ू-पोछा भी मैं देखूं, और इन दोनों के आने से पहले खाना भी मैं ही बनाऊं। क्या मेरी अपनी कोई जिंदगी नहीं बची है?”

रामनाथ जी ने मोबाइल म्यूट किया और अपनी पत्नी की ओर बड़ी ही नरमी से देखा। वे जानते थे कि सुधा का गुस्सा नाजायज नहीं है। उन्होंने शांत स्वर में कहा, “अरे भाग्यवान, क्यों अपना खून जला रही हो? बाई नहीं आई थी तो छोड़ देती सारा काम। जब अंजलि और विकास आते तो बाहर से कुछ मंगवा लेते या हल्का-फुल्का खिचड़ी-दलिया बन जाता। इतना तनाव लेने की क्या जरूरत है?”

“हल्का-फुल्का?” सुधा जी ने एक व्यंग्यात्मक हँसी हँसी। “क्या हल्का-फुल्का अपने आप जादू से बन जाता है? उसमें भी तो रसोई में खड़ा होना पड़ता है, सब्जियां काटनी पड़ती हैं। और बाहर का खाना बच्चों को रोज-रोज कैसे खिला दूँ? मेरी तो समझ में नहीं आता कि हम यहाँ आए ही क्यों? हम तो अपने बनारस में ही लाख दर्जे अच्छे थे।”

सुधा जी की आँखों में बनारस के उस पुराने, खुले आंगन वाले घर की यादें तैर गईं। वहाँ उनके पास समय ही समय था। सुबह जल्दी उठकर गंगा स्नान को जाना, फिर मंदिर में दर्शन करना, पड़ोस की औरतों के साथ बैठकर सुख-दुःख बाँटना और दोपहर में तुलसीदास जी की रामायण पढ़ना। लेकिन पिछले डेढ़ साल से, जब से वे पुणे आए थे, उनका जीवन इस फ्लैट की चारदीवारी और रसोई के डिब्बों के बीच सिमट कर रह गया था। विकास ने यह कहकर उन्हें यहाँ बुलाया था कि “पापा, आप लोग वहां अकेले क्यों रहेंगे? उम्र हो गई है, हमारे पास आ जाइये, हमारी भी आँखों के सामने रहेंगे और कबीर को भी दादा-दादी का प्यार मिलेगा।”

बातें तो बहुत मीठी थीं, लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली। यहाँ आने के बाद सुधा जी और रामनाथ जी बस एक ‘मुफ्त के केयरटेकर’ बनकर रह गए थे।

सुधा जी सोफे के किनारे बैठ गईं, उनके घुटनों का दर्द अब असहनीय हो रहा था। उन्होंने गहरी साँस लेते हुए कहा, “जी भर गया है मेरा इस शहर से। वहाँ बनारस में हम अकेले जरूर थे, लेकिन आज़ाद थे। यहाँ तो हमारी हैसियत बस एक नौकरानी और चौकीदार से ज्यादा कुछ नहीं है। बेटा-बहू प्यार से ले तो आए, लेकिन उन्हें हमारी जरूरत सिर्फ इसलिए थी ताकि उनके पीछे से उनका घर और बच्चा सुरक्षित रहे। उन्हें हमारे सुकून से कोई लेना-देना नहीं है।”

रामनाथ जी ने चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा। वे भी इस सच से वाकिफ थे, लेकिन उन्होंने स्थिति को संभालने की कोशिश करते हुए कहा, “सुधा, तुम बात का बतंगड़ बना रही हो। बच्चे हैं हमारे, दोनों वर्किंग हैं, उनकी अपनी मजबूरियां हैं। इसी बहाने हम परिवार के साथ तो हैं। बुढ़ापे में अपनों का साथ ही तो सबसे बड़ी दौलत होती है।”

“कैसा साथ?” सुधा जी की आँखों में अब आँसू छलक आए थे। “क्या इसे साथ कहते हैं? वो दोनों सुबह आठ बजे निकलते हैं और रात को आठ बजे आते हैं। वीकेंड पर उन्हें अपनी पार्टी और दोस्तों से फुर्सत नहीं मिलती। हम तो बस इस घर के फर्नीचर का एक हिस्सा बन गए हैं। सच कहूँ राम जी, मुझे अब इस बात से चिढ़ होने लगी है। मुझे लगता है कि हमारी जो पीढ़ी है न… वो दोनों तरफ से ठगी गई है।”

“दोनों तरफ से ठगी गई है? मतलब?” रामनाथ जी ने पूछा।

“हाँ, दोनों तरफ से!” सुधा जी ने अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछते हुए कहा। “याद है आपको जब मेरी शादी होकर बनारस आई थी? अम्मा जी (रामनाथ जी की माँ) का कितना कड़ा अनुशासन था। सुबह चार बजे उठकर पूरे घर का आंगन लीपना, चूल्हे पर सबके लिए रोटियां सेंकना। मजाल है जो कभी अपनी मर्जी से मायके जाने का नाम भी ले लूँ। पूरी जवानी सास-ससुर की सेवा में, उनके ताने सुनने में और उनकी हर हाँ में हाँ मिलाने में निकाल दी। हमने कभी बड़ों के आगे जुबान नहीं लड़ाई, क्योंकि तब संस्कार यही कहते थे कि बड़ों का कहा मानना है।”

सुधा जी रुकीं, एक लंबी साँस ली और फिर भारी आवाज़ में बोलीं, “और आज? आज जब हम खुद सास-ससुर बन गए हैं, हमारे आराम करने के दिन आए हैं, तो भी हमें छोटों के हिसाब से चलना पड़ रहा है। उनके हिसाब से खाओ, उनके हिसाब से रहो। उनकी मॉडर्न लाइफस्टाइल में दखल मत दो। टीवी पर उनके चैनल चलेंगे, खाना उनकी पसंद का बनेगा। हमारी पीढ़ी तो दोनों तरफ से पिसी है। तब सास-ससुर का दबदबा था, और आज बेटा-बहू का दबदबा है। हमने तब भी अपने मन को मारा था और आज भी अपने मन को मार रहे हैं।”

कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। सिर्फ कबीर के कार्टून की आवाज़ आ रही थी। रामनाथ जी अवाक रह गए। सुधा के इन शब्दों में जो पीड़ा थी, वो कोई आज की नहीं थी, बल्कि सालों से दबी हुई एक टीस थी जो आज ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ी थी। रामनाथ जी को अचानक एहसास हुआ कि सुधा कितनी सही कह रही है। उन्होंने खुद को देखा, बनारस के अस्सी घाट की वो चाय की चुस्कियां, अपने दोस्तों के साथ वो शाम की गपशप, यहाँ इस बंद डिब्बे जैसे फ्लैट में कहीं खो गई थी। वे खुद भी तो अंदर ही अंदर घुट रहे थे, बस बेटे के मोह में कुछ कह नहीं पा रहे थे।

उन्होंने ध्यान से सुधा के चेहरे को देखा। वो चेहरा जो कभी बनारस की गलियों में हमेशा खिलखिलाता रहता था, आज थकान, झुर्रियों और एक गहरी उदासी से भर गया था। रामनाथ जी को अपनी पत्नी से बहुत गहरा प्रेम था। उन्होंने हमेशा हर कदम पर एक-दूसरे का साथ दिया था। आज उन्हें लगा कि अपने बेटे की सहूलियत के लिए वे अपनी जीवनसंगिनी की खुशियों का गला घोंट रहे हैं।

रामनाथ जी अपनी जगह से उठे और धीरे से सुधा जी के पास आकर बैठ गए। उन्होंने सुधा के उन कांपते और काम से खुरदुरे हो चुके हाथों को अपने हाथों में लिया। उन हाथों में उन्हें सालों का वो संघर्ष महसूस हुआ जो सुधा ने इस परिवार को बनाने में किया था।

रामनाथ जी ने बहुत ही प्यार और एक शरारती मुस्कान के साथ सुधा की आँखों में देखते हुए कहा, “सुधा… एक बात कहूँ?”

सुधा जी ने मुँह फेरते हुए कहा, “अब क्या कहना बाकी रह गया है? जाइए टीवी देखिए, मुझे खाना छौंकना है।”

रामनाथ जी ने उनका हाथ थोड़ा और कसकर पकड़ा और अपनी तरफ खींचते हुए बोले, “अरे, सब्जी को मारो गोली… ये बताओ, वो गंगा किनारे वाली अपनी छोटी सी छत और वो सुबह वाली कचौड़ी-जलेबी याद है? अगर मैं कहूँ कि चलो अपना बैग पैक करो… क्या हम वापस अपने बनारस लौट चलें?”

यह सुनते ही सुधा जी के हाथ ठिठक गए। उन्होंने झटके से रामनाथ जी की ओर देखा। उन्हें अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। “क्या… क्या कह रहे हैं आप? सच में?”

रामनाथ जी ने सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ, बिल्कुल सच। तुमने बिल्कुल सही कहा, हमारी जिंदगी कोई मशीन नहीं है जो दूसरों की सहूलियत के लिए चलती रहे। हमने अपने बच्चों को पाल-पोस कर बड़ा कर दिया, उन्हें काबिल बना दिया, अब उनकी जिम्मेदारियां उन्हें खुद उठानी होंगी। हमारे भी तो कुछ गिने-चुने साल बचे हैं, उन्हें हम यहाँ घुट-घुट कर क्यों बिताएं? कल ही मैं विकास से बात करता हूँ, हम इस वीकेंड वापस बनारस जा रहे हैं। हमेशा के लिए।”

सुधा जी के चेहरे पर जो थकान और निराशा पिछले डेढ़ साल से छाई हुई थी, वह जैसे एक पल में छूमंतर हो गई। उनके होठों पर एक ऐसी खुशी की लहर दौड़ गई जैसे किसी मुरझाए हुए फूल पर सावन की पहली बारिश की बूँद गिर गई हो। उनकी आँखों से ख़ुशी के आँसू बह निकले और उन्होंने हाँ में सिर हिला दिया। आज पहली बार उन्हें लगा कि ढलती उम्र में भी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने का हक़ उन्हें भी है।

दोस्तों, यह कहानी सिर्फ सुधा और रामनाथ जी की नहीं है, बल्कि आज के समाज में कई ऐसे बुजुर्गों की है, जो ‘सैंडविच जनरेशन’ का हिस्सा बन गए हैं—जिन्होंने अपनी जवानी में अपने बड़ों की सेवा की और अब बुढ़ापे में बच्चों की। कहानी पढ़ने के बाद आप क्या सोचते हैं? क्या आज के समय में बच्चों को अपने बुजुर्गों को सिर्फ अपनी सहूलियत के लिए पास रखना चाहिए, या उन्हें उनके हाल और उनकी आज़ादी के साथ जीने देना चाहिए? बुजुर्गों की इस स्थिति का सही समाधान आपके अनुसार क्या है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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लेखिका : हर्षिता सिंह

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