सिद्धार्थ के हाथ से सूटकेस छूट कर ज़मीन पर गिर पड़ा। वह लिफ़ाफ़ा और चूड़ियाँ सीने से लगाए, घुटनों के बल वहीं ज़मीन पर बैठ गया और अपने पिता के पैरों पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगा। आज उसे अपनी पढ़ाई, अपनी नौकरी और अपनी हैसियत, अपने उस कमज़ोर पिता के फटे हुए कुर्ते के सामने बहुत छोटी लग रही थी। रमाकांत जी ने मुस्कुराते हुए अपने कांपते हाथों से बेटे के सिर को सहलाया, मानो कह रहे हों कि एक पिता कभी अपने बच्चों से कुछ नहीं माँगता, वह तो बस अपना सब कुछ लुटाने के बहाने ढूँढता है।
बनारस की तंग गलियों में बसा वो पुश्तैनी मकान आज भी वैसा ही था, जैसा सिद्धार्थ उसे दस साल पहले छोड़कर मुंबई गया था। दीवारों का रंग उखड़ चुका था, लकड़ी के दरवाज़ों में दीमक की शिकायतें साफ़ नज़र आती थीं और आँगन में लगे तुलसी के पौधे के पास रखी पुरानी आरामकुर्सी अपने मालिक के अकेलेपन की गवाही दे रही थी। सिद्धार्थ अपने कमरे में सूटकेस पैक कर रहा था। उसकी मुंबई की फ्लाइट शाम की थी और वह जल्द से जल्द इस घुटन भरे, पुराने माहौल से निकलकर अपनी वातानुकूलित और तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में वापस लौटना चाहता था। वह सिर्फ़ दो दिन के लिए एक ज़मीन के कागज़ात पर हस्ताक्षर करने आया था, लेकिन ये दो दिन उसे दो साल के बराबर लग रहे थे।
नीचे दालान में उसके पिता, रमाकांत जी बैठे थे। जब से सिद्धार्थ आया था, रमाकांत जी ने शिकायतों और घर-गृहस्थी की परेशानियों का एक लंबा पुलिंदा उसके सामने खोल कर रख दिया था। सिद्धार्थ के कानों में उनके शब्द अभी भी गूँज रहे थे। “बेटा, आजकल तो बाज़ार जाना भी मुहाल हो गया है, दाल और तेल के भाव आसमान छू रहे हैं,” उन्होंने कल रात खाने पर कहा था। आज सुबह चाय पीते हुए उनकी बातों का विषय बदल गया था, “वो पीछे वाले कमरे की छत बरसात में बुरी तरह टपकती है, ठेकेदार कह रहा था कि बीस हज़ार से कम में मरम्मत नहीं होगी। और वो शर्मा जी को देखा है? उनका बेटा तो हर महीने उन्हें पच्चीस हज़ार रुपये भेजता है, बुढ़ापे में दवाइयों का खर्च भी तो कितना बढ़ गया है।”
इन दो दिनों में रमाकांत जी ने अपनी शुगर की बीमारी, महंगे होते अस्पताल, घर की मरम्मत, पुराने कर्ज़ और यहाँ तक कि पड़ोस के तिवारी जी की बेटी की शादी में दिए जाने वाले शगुन तक की चर्चा कर डाली थी। सिद्धार्थ एक सफल मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था। उसकी कमाई लाखों में थी, लेकिन मुंबई जैसे शहर में उसकी ईएमआई, बच्चों की महंगी फीस, उसकी पत्नी श्रुति की लाइफस्टाइल और क्रेडिट कार्ड के बिल्स उसे हमेशा एक अजीब से दबाव में रखते थे।
पिता की एक-एक बात सुनकर सिद्धार्थ के मन में एक ही विचार आ रहा था— ‘पिताजी भूमिका बाँध रहे हैं।’ उसे पक्का यकीन हो गया था कि जाने से पहले उसके पिता उससे एक बड़ी रकम की माँग करेंगे। या तो वे घर की मरम्मत के नाम पर पचास-साठ हज़ार रुपये माँगेंगे, या फिर कहेंगे कि उनका हर महीने का खर्च बढ़ा दिया जाए। सिद्धार्थ को सबसे बड़ा डर इस बात का था कि कहीं बातों-बातों में वे यह न कह दें कि अब उनका इस पुराने घर में अकेले मन नहीं लगता और वे भी उसके साथ हमेशा के लिए मुंबई चलना चाहते हैं।
सिद्धार्थ ने मन ही मन एक मज़बूत रक्षा कवच तैयार कर लिया था। उसने सोच लिया था कि अगर पिताजी मुंबई चलने की बात करेंगे, तो वह घर के छोटे होने और श्रुति की व्यस्तता का बहाना बना देगा। और जहाँ तक पैसों की बात है, वह उन्हें एक छोटी सी रकम देकर समझा देगा कि आजकल उसकी खुद की आर्थिक स्थिति थोड़ी तंग चल रही है। आखिर शहर में रहने के भी अपने बड़े खर्च होते हैं, जो इन छोटे शहरों में रहने वाले लोगों को कभी समझ नहीं आते।
टैक्सी का हॉर्न बाहर गली के नुक्कड़ पर बजने लगा। टैक्सी वाला उस संकरी गली में अंदर तक नहीं आ सकता था। सिद्धार्थ ने राहत की साँस ली। उसने अपना सूटकेस बंद किया और उसे लेकर सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा। उसने पहले ही अपने बटुए से पाँच-पाँच सौ के दस नोट निकालकर अपनी पैंट की दाहिनी जेब में रख लिए थे। उसने तय किया था कि वह बिना कोई लंबी बात किए, ये पाँच हज़ार रुपये उनके हाथ में रखेगा, उनके पैर छुएगा और टैक्सी की तरफ भाग जाएगा ताकि कोई और भावुक या आर्थिक चर्चा न हो सके।
नीचे पहुँचने पर उसने देखा कि दालान खाली था। रमाकांत जी अपनी आरामकुर्सी पर नहीं थे। तभी उनके कमरे से एक कमज़ोर सी खाँसती हुई आवाज़ आई, “सिद्धार्थ… बेटा, ज़रा अंदर तो आना।”
सिद्धार्थ के कदम ठिठक गए। उसका माथा ठनक गया। ‘लो, आ गया वह पल,’ उसने बुदबुदाते हुए सोचा। ‘जाने के ऐन वक्त पर कमरे में बुलाने का मतलब ही है कि अब कोई बड़ी माँग होने वाली है। अब या तो मुंबई चलने की ज़िद होगी या किसी बड़े खर्चे का बिल मेरे सामने रखा जाएगा।’
वह भारी कदमों से और एक अनमने, चिढ़ भरे चेहरे के साथ पिता के कमरे में दाखिल हुआ। उस कमरे में आज भी अजीब सी सीलन और पुरानी किताबों की महक थी। रमाकांत जी अपने बिस्तर के किनारे बैठे थे। उनके चेहरे पर झुर्रियों का जाल था और आँखों में मोतियाबिंद की हल्की सफेदी के बीच एक अजीब सी चमक थी। उनके कांपते हुए हाथों में एक पुरानी सी, कपड़े की थैली थी।
“मुझे देर हो रही है पिताजी, टैक्सी वाले का मीटर डाउन है,” सिद्धार्थ ने अपनी जेब में रखे उन पाँच हज़ार रुपयों को मुट्ठी में भींचते हुए थोड़ी रूखी आवाज़ में कहा। वह बस वह पैसे निकालने ही वाला था कि पिता ने अपने हाथ में पकड़ी वह थैली उसकी तरफ बढ़ा दी।
“पता है बेटा,” रमाकांत जी की आवाज़ थोड़ी भर्राई हुई थी, “तू बहुत बड़ा आदमी बन गया है। मुंबई जैसे शहर में खर्चे बहुत होते हैं। तेरा अपना परिवार है, बच्चे हैं। मैं पिछले दो दिनों से तुझे घर की, महँगाई की और अपनी बीमारियों की परेशानियां गिना रहा था न?”
सिद्धार्थ ने कुछ नहीं कहा, बस मन ही मन सोचा कि अब बस कुछ ही सेकंड में माँग सामने आने वाली है।
रमाकांत जी ने गहरी साँस ली और बोले, “मैं ये सब इसलिए बता रहा था क्योंकि मुझे हमेशा लगता था कि मैं अपने पोते-पोती के लिए कुछ कर नहीं पाया। जब तेरी माँ थी, तो उसने कुछ जेवर बचा कर रखे थे। और जब से तूने मुझे हर महीने थोड़े पैसे भेजने शुरू किए, मैंने अपनी ज़रूरतें कम कर दीं। मैं शाम को टहलने पैदल ही चला जाता हूँ, रिक्शे के पैसे बच जाते हैं। मैंने घर की मरम्मत भी नहीं करवाई, क्योंकि मैं अकेला ही तो हूँ, किसी तरह गुज़ारा कर लेता हूँ।”
सिद्धार्थ अब कुछ उलझन में था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि बात किस दिशा में जा रही है।
रमाकांत जी ने उस कपड़े की थैली से एक भूरे रंग का लिफ़ाफ़ा और एक लाल रंग की छोटी सी डिब्बी निकाली। उन्होंने वे दोनों चीज़ें सिद्धार्थ के हाथों में थमा दीं। “बेटा, ये लाल डिब्बी में तेरी माँ की आखिरी निशानी है, सोने की चूड़ियाँ। ये अपनी पत्नी श्रुति को देना। और इस लिफ़ाफ़े में एक फिक्स्ड डिपॉज़िट की रसीद है।”
सिद्धार्थ ने कांपते हाथों से लिफ़ाफ़ा खोला। वह बैंक की एक रसीद थी, पूरे तीन लाख रुपये की।
“ये… ये क्या है पिताजी?” सिद्धार्थ की आवाज़ गले में ही अटक गई।
“ये मेरे पिछले आठ सालों की बचत है बेटा। जो पैसे तू मुझे भेजता था, और जो मेरी पेंशन आती थी, उसमें से पाई-पाई जोड़कर मैंने अपनी पोती अवनि के लिए ये जमा किया है। मुझे पता है शहर में बच्चों की पढ़ाई बहुत महँगी है। मेरी तरफ से अपनी बेटी को ये छोटी सी भेंट दे देना। और हाँ, बच्चों को लेकर एक बार ज़रूर आना… उन्हें देखे हुए बहुत साल हो गए हैं। मैं तुमसे और कुछ नहीं माँगता, बस मुझे कभी-कभी फ़ोन पर उनका चेहरा दिखा दिया कर।”
कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। बाहर बजते टैक्सी के हॉर्न की आवाज़ अब सिद्धार्थ को सुनाई नहीं दे रही थी। उसकी पैंट की जेब में रखे वो पाँच-पाँच सौ के दस नोट, जिन्हें वह पिता को खैरात की तरह देने वाला था, अब उसकी जांघों को अंगारों की तरह जला रहे थे। उसका अपना खुद का गुरूर, शहर की चकाचौंध में अंधा हो चुका उसका दिमाग, और उसकी घटिया सोच—सब कुछ उस बूढ़े बाप के निस्वार्थ प्रेम के आगे टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया था।
पिता ने अपना पूरा बुढ़ापा, अपनी ज़रूरतें, अपनी दवाइयाँ और अपने घर की छत इसलिए दांव पर लगा दी थी, ताकि उनके बेटे को कोई बोझ न उठाना पड़े और वे अपनी आने वाली पीढ़ी को अपना आशीर्वाद दे सकें। और बेटा? बेटा उन्हें एक लालची और बोझ समझ रहा था।
सिद्धार्थ के हाथ से सूटकेस छूट कर ज़मीन पर गिर पड़ा। वह लिफ़ाफ़ा और चूड़ियाँ सीने से लगाए, घुटनों के बल वहीं ज़मीन पर बैठ गया और अपने पिता के पैरों पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगा। आज उसे अपनी पढ़ाई, अपनी नौकरी और अपनी हैसियत, अपने उस कमज़ोर पिता के फटे हुए कुर्ते के सामने बहुत छोटी लग रही थी। रमाकांत जी ने मुस्कुराते हुए अपने कांपते हाथों से बेटे के सिर को सहलाया, मानो कह रहे हों कि एक पिता कभी अपने बच्चों से कुछ नहीं माँगता, वह तो बस अपना सब कुछ लुटाने के बहाने ढूँढता है।
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लेखिका : नमिता पंडित