दोहरे चेहरे – सुदर्शन सचदेवा

शहर में एक प्रसिद्ध चित्रकार रहता था—समर। वह लोगों के चेहरे बनाता था, लेकिन उसकी एक खासियत थी। वह केवल चेहरे की सुंदरता नहीं, बल्कि उस चेहरे के पीछे छिपे भावों को भी अपनी चित्रकारी में उतार देता था। लोग कहते थे कि समर की बनाई तस्वीरें बोलती हैं।

एक दिन शहर के सबसे प्रतिष्ठित व्यापारी राघव ने समर को अपना चित्र बनाने के लिए बुलाया। राघव ने कहा, “मेरी ऐसी तस्वीर बनाओ, जिसमें मेरी शालीनता, दयालुता और महानता दिखाई दे।”

समर ने मुस्कुराकर कहा, “मैं वही चित्र बनाऊँगा, जो मुझे दिखाई देगा।”

राघव कुछ समझा नहीं।

चित्र बनना शुरू हुआ। समर ने राघव का एक सुंदर चेहरा बनाया—माथे पर आत्मविश्वास, आँखों में चमक और होंठों पर मुस्कान। लेकिन चित्र के दूसरे हिस्से में उसने एक अलग चेहरा भी उकेरा—वही चेहरा, जिसमें लालच, अहंकार और स्वार्थ की परछाईं थी।

राघव यह देखकर क्रोधित हो गया। उसने कहा, “तुमने मेरा अपमान किया है! मेरा चेहरा तो ऐसा बिल्कुल नहीं है।”

समर शांत रहा और बोला, “चेहरा आपका है, मैंने तो केवल आईना दिखाया है।”

राघव ने चित्र फाड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, तभी दरवाजे पर एक वृद्ध मजदूर आ खड़ा हुआ। उसने राघव को देखते हुए कहा, “मालिक, शायद चित्रकार ने सच ही कहा है।”

राघव चौंक गया।

वृद्ध ने आगे कहा, “जब हमारे पास काम होता है, तब आप हमें अपना परिवार कहते हैं। लेकिन जब मजदूरी देने की बात आती है, तो आप हमें पहचानते तक नहीं। सामने आपका चेहरा मुस्कुराता है, लेकिन पीछे आपका व्यवहार कुछ और होता है।”

राघव कुछ बोल नहीं पाया।

तभी समर ने चित्र उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, “हर इंसान के भीतर दो चेहरे होते हैं। एक वह, जिसे हम दुनिया को दिखाते हैं और दूसरा वह, जिसे हम अपने कर्मों से प्रकट करते हैं। फर्क इतना है कि कुछ लोग अपने दूसरे चेहरे को स्वीकार कर लेते हैं और कुछ जिंदगी भर उसे छिपाने की कोशिश करते रहते हैं।”

राघव उस रात सो नहीं पाया। पहली बार उसने अपने जीवन को बाहर से नहीं, भीतर से देखा। उसे याद आया कि कितने लोगों ने उस पर भरोसा किया था और उसने अपने स्वार्थ के लिए उन्हें निराश किया था।

अगली सुबह वह उसी मजदूर के घर पहुँचा। उसने उसकी बकाया मजदूरी चुकाई और कहा, “आज से मैं तुम्हें केवल मजदूर नहीं, अपने परिवार का हिस्सा समझूँगा।”

वृद्ध की आँखों में आँसू आ गए।

समय के साथ राघव सचमुच बदलने लगा। अब उसकी मुस्कान केवल चेहरे पर नहीं, उसके व्यवहार में भी दिखाई देने लगी। कुछ महीनों बाद वह फिर समर के पास गया और बोला, “अब मेरा चित्र बनाओ।”

समर ने नया चित्र बनाया। इस बार उसमें केवल एक चेहरा था—सादा, शांत और सच्चा।

राघव ने पूछा, “इस बार दूसरा चेहरा कहाँ है?”

समर मुस्कुराया और बोला, “जब इंसान के विचार और कर्म एक हो जाते हैं, तब दोहरे चेहरे की जरूरत नहीं रहती।”

दूसरों को धोखा देकर हम कुछ समय के लिए अपनी छवि बचा सकते हैं, लेकिन अपने अंतरात्मा से नहीं बच सकते। जीवन की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि हमारा दिखने वाला चेहरा और हमारा असली चरित्र एक जैसा हो।

सुदर्शन सचदेवा

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