डील के कागजात

दीनानाथ जी की सुबह छत पर बने उस छोटे से टिन के कमरे में होती थी, जिसे घर वाले ‘कबाड़खाना’ कहते थे। गर्मियों में यह कमरा भट्टी की तरह तपता था और सर्दियों में यहाँ की सीलन हड्डियों तक में उतर जाती थी। रात भर मच्छरों की भिनभिनाहट और टिन की छत से टपकती ओस ने दीनानाथ जी को पल भर भी सोने नहीं दिया था। उनके घुटनों का दर्द अब बर्दाश्त के बाहर हो रहा था। उन्होंने अपनी पुरानी, जंग लगी छड़ी उठाई और कांपते कदमों से सीढ़ियां उतरकर नीचे आने लगे। उनका बड़ा बेटा सुमित आज एक बहुत बड़ी बिजनेस मीटिंग के लिए जाने वाला था। दीनानाथ जी हॉल में रखी एक कुर्सी पर चुपचाप बैठ गए, इस उम्मीद में कि सुमित के कमरे से निकलते ही वे उससे अपने लिए एक मच्छरदानी और घुटनों के दर्द की दवा मंगाने के लिए कहेंगे।

करीब साढ़े आठ बजे सुमित अपना कोट पहनते हुए कमरे से बाहर निकला। उसके चेहरे पर एक अजीब सी जल्दबाजी और तनाव था। दीनानाथ जी ने हिम्मत करके धीमी आवाज में कहा, “सुमित बेटा… रात भर मच्छरों ने सोने नहीं दिया। छत पर बहुत मच्छर हो गए हैं। वापसी में एक मच्छरदानी और मेरे घुटनों के लिए वो लाल वाला मलहम लेते आना। दर्द से रात भर करवटें बदलता रहा।” सुमित के कदम वहीं रुक गए। उसने एक गहरी सांस ली और माथे पर सिलवटें डालते हुए बोला, “पिताजी, आपको यही समय मिलता है अपनी बीमारियों का रोना रोने के लिए? मैं एक बहुत जरूरी डील फाइनल करने जा रहा हूँ, और आपने सुबह-सुबह अपशकुन कर दिया। घर से निकलते ही टोकने की आपकी यह आदत कभी नहीं जाएगी। जब मैं स्कूल जाता था तब भी आप यही करते थे, और आज जब मैं इतनी बड़ी कंपनी का मालिक बनने जा रहा हूँ, तब भी आपकी यही किटकिट चालू है।”

दीनानाथ जी का दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में भींच लिया हो। उनकी बूढ़ी आँखें डबडबा गईं। उन्होंने रुंधे हुए गले से कहा, “बेटा, मैं तेरा बुरा कैसे सोच सकता हूँ? तू तो मेरे बुढ़ापे की लाठी है। मैं तो बस अपनी तकलीफ…” सुमित ने हाथ उठाते हुए उन्हें बीच में ही रोक दिया और अपनी पत्नी को आवाज लगाई, “काव्या! ओ काव्या! जरा बाहर आना।” काव्या हाथ में तौलिया लिए बाहर आई। सुमित झुंझलाते हुए बोला, “जरा पिताजी को समझाओ कि जब मैं काम से निकल रहा हूँ तो मुझे परेशान न किया करें। मेरा तो सुबह-सुबह मूड ही खराब कर दिया। अब पता नहीं आज का दिन कैसा जाएगा।” इतना कहकर सुमित पैर पटकता हुआ घर से बाहर निकल गया और अपनी महंगी गाड़ी में बैठकर चला गया।

सुमित के जाते ही काव्या ने अपनी त्योरियां चढ़ाईं और दीनानाथ जी की तरफ देखकर तीखे स्वर में बोली, “पिताजी, आपको चैन नहीं मिलता क्या? दिन-रात बस अपनी बीमारियों का राग अलापते रहते हैं। आपको पता भी है कि सुमित कितनी मेहनत करता है? सुबह-सुबह उसका दिमाग खराब कर दिया। और यह मच्छरदानी-मच्छरदानी क्या लगा रखा है? आपको क्या लगता है, छत पर हम आपके लिए एसी लगवा दें? एक तो वैसे ही इस घर में जगह की कमी है।”

दीनानाथ जी ने कांपते हुए स्वर में कहा, “बहू, बस एक मच्छरदानी ही तो मांगी थी। और अगर वहाँ इतनी परेशानी है, तो मुझे नीचे सीढ़ियों के नीचे वाले कोने में ही एक खाट डाल दो। मैं चुपचाप वहीं पड़ा रहूँगा। कम से कम वहाँ इतनी घुटन और मच्छर तो नहीं होंगे।” काव्या ने तंज कसते हुए कहा, “जी नहीं! नीचे मेहमान आते-जाते हैं। कोई देखेगा तो क्या कहेगा कि हमारे घर में कैसा कबाड़ फैला है? आप चुपचाप उसी कमरे में रहिए। अगर कोई पुरानी जाली पड़ी होगी तो मैं भिजवा दूँगी। अब मुझे अपने काम करने दीजिए, पीछे से आवाज मत लगाइएगा।” इतना कहकर काव्या रसोई की तरफ मुड़ गई।

दीनानाथ जी भारी कदमों से वापस अपने टिन वाले कमरे में लौट आए। दोपहर के करीब एक बज रहे थे। अचानक नीचे से बहुत ही स्वादिष्ट पकवानों की खुशबू आने लगी। देसी घी में छौंकी गई दाल, शाही पनीर, और इलायची वाली खीर की महक ने दीनानाथ जी की मृतप्राय हो चुकी भूख को फिर से जगा दिया। आज उनके इकलौते पोते रोहन का जन्मदिन था। दीनानाथ जी मन ही मन मुस्कुराने लगे। उन्हें लगा कि आज इतने दिनों बाद घर में कुछ अच्छा बना है, तो शायद उन्हें भी भरपेट खाने को मिलेगा। वे अपनी पुरानी यादों में खो गए, जब सुमित छोटा था और दीनानाथ जी अपनी सरकारी स्कूल की मामूली सी तनख्वाह में से पैसे बचाकर सुमित के जन्मदिन पर उसके लिए बाहर से मिठाई लाते थे। खुद भूखे रह जाते थे, लेकिन बेटे की थाली में कभी कोई कमी नहीं होने दी।

इन्हीं ख्यालों में डूबे दीनानाथ जी को सीढ़ियों पर किसी के कदमों की आहट सुनाई दी। काव्या हाथ में एक पुरानी, किनारों से पिचक चुकी स्टील की थाली लिए अंदर आई। उसने बिना कुछ कहे थाली दीनानाथ जी के सामने रखी रखी एक टूटी हुई तिपाई पर पटक दी। दीनानाथ जी ने उम्मीद भरी नजरों से थाली की तरफ देखा। थाली में कल रात की बची हुई सूखी रोटियां और एक कटोरी में पानी जैसी पतली लौकी की सब्जी थी। दीनानाथ जी का चेहरा उतर गया। उन्होंने हिचकिचाते हुए पूछा, “बहू… आज तो घर में रोहन का जन्मदिन है। नीचे से बहुत अच्छी खुशबू आ रही थी। क्या बच्चों ने भी यही रुखी-सूखी रोटी खाई है?”

काव्या ने मुँह बनाते हुए जवाब दिया, “पिताजी, आपको अपनी उम्र का भी लिहाज नहीं है? नीचे जो खाना बना है वह बहुत मसालेदार और भारी है। वो शाही पनीर और पूरियां आपके पेट में पचेंगी नहीं। फिर रात भर आप पेट दर्द का बहाना बनाकर हमें सोने नहीं देंगे। आपके लिए यही खाना ठीक है। इसे खा लीजिए और हाँ, थाली धोकर नीचे रख दीजिएगा, वरना यहाँ चींटियां लग जाती हैं।”

तभी दरवाजे पर आठ साल का रोहन दौड़ता हुआ आया। उसके हाथ में एक छोटी सी कटोरी थी जिसमें रबड़ी वाली खीर थी। वह अपनी तोतली आवाज में बोला, “मम्मी, आपने दादाजी को खीर तो दी ही नहीं! देखो, मैं दादाजी के लिए लाया हूँ।” दीनानाथ जी के सूखे होंठों पर एक मुस्कान तैर गई, उन्होंने अपने पोते की तरफ हाथ बढ़ाया ही था कि काव्या ने झपटकर रोहन के हाथ से वह कटोरी छीन ली। “रोहन! मैंने तुमसे कहा था न कि दादाजी को मीठा मना है? उनकी तबीयत खराब हो जाएगी। चलो नीचे चलो, तुम्हारे दोस्त आने वाले हैं।” रोहन अपनी माँ की डांट सुनकर सहम गया और भागकर नीचे चला गया। दीनानाथ जी का हाथ हवा में ही रह गया। उनकी आँखों से दो बूँद आँसू उस सूखी रोटी पर गिर पड़े, जिसे उन्होंने कभी अपने खून-पसीने से सींचकर सुमित के लिए कमाया था।

शाम हो चुकी थी। नीचे पूरा घर रोशनी से जगमगा रहा था। रोहन के जन्मदिन की शानदार पार्टी चल रही थी। लाउडस्पीकर पर तेज संगीत बज रहा था और मेहमानों के हंसने-बोलने की आवाजें छत तक आ रही थीं। लेकिन दीनानाथ जी के कमरे में घुप्प अंधेरा था क्योंकि उनके कमरे का बल्ब पिछले तीन दिन से फ्यूज था। तभी पार्टी में एक विशेष मेहमान का आगमन हुआ। ये सुमित के सबसे बड़े क्लाइंट, श्रीमान माथुर थे, जिनके साथ सुमित करोड़ों की डील साइन करने वाला था। माथुर जी एक बहुत ही उसूलों वाले और पारंपरिक विचारों के व्यक्ति थे। सुमित ने झुककर उनका स्वागत किया। माथुर जी ने सुमित से हाथ मिलाते हुए पूछा, “सुमित, मैंने तुम्हारे पिता जी के बारे में सुना था। वे तो बहुत जाने-माने शिक्षक रहे हैं अपने इलाके के। मैं तो आज उनसे भी मिलने की उम्मीद से आया था। कहाँ हैं वे?”

सुमित थोड़ा हड़बड़ा गया। उसने झूठी मुस्कान ओढ़ते हुए कहा, “जी सर, पिताजी की उम्र हो गई है, तो वे भीड़-भाड़ से दूर अपने मास्टर बेडरूम में आराम कर रहे हैं। उन्हें डिस्टर्ब करना ठीक नहीं होगा।” माथुर जी ने दृढ़ता से कहा, “अरे नहीं सुमित, एक गुरु का आशीर्वाद लिए बिना मैं कोई भी नया काम शुरू नहीं करता। तुम मुझे उनके कमरे तक ले चलो, मैं बस दूर से उनके पैर छूकर आ जाऊँगा।” सुमित और काव्या के चेहरे का रंग उड़ गया। वे माथुर जी को टालने की कोशिश करने लगे, लेकिन माथुर जी अपनी बात पर अड़े रहे। हारकर सुमित को उन्हें ऊपर छत की तरफ ले जाना पड़ा।

जैसे-जैसे माथुर जी सीढ़ियां चढ़ रहे थे, उनके माथे की लकीरें गहरी होती जा रही थीं। छत पर बने उस बदबूदार, अंधेरे और सीलन भरे कमरे के दरवाजे पर पहुँचकर जब माथुर जी ने अंदर झांका, तो वे सन्न रह गए। मोबाइल की फ्लैशलाइट की रोशनी में उन्होंने देखा कि एक बुजुर्ग व्यक्ति फटे हुए कपड़ों में, एक टूटी हुई खाट पर सिकुड़ा हुआ बैठा है। पास ही तिपाई पर वही पुरानी एल्युमिनियम की थाली रखी थी जिसमें सूखी रोटियों के टुकड़े पड़े थे। माथुर जी का खून खौल उठा। उन्होंने सुमित की तरफ पलटकर देखा, जिसकी नजरें शर्म से झुकी हुई थीं।

माथुर जी ने दीनानाथ जी के पास जाकर उनके पैर छुए और भारी आवाज में बोले, “सुमित, जो इंसान अपने उस पिता को, जिसने उसे अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर इस मुकाम तक पहुँचाया, अपने ही घर में दो वक्त की इज्जत की रोटी और एक साफ छत नहीं दे सकता… वह इंसान मेरे साथ करोड़ों का व्यापार करते हुए ईमानदारी दिखाएगा, यह मैं कैसे मान लूँ? जो अपनों का सगा नहीं हुआ, वो व्यापार में मेरा सगा क्या होगा?” माथुर जी ने वहीं खड़े-खड़े डील के कागजात फाड़ दिए। सुमित गिड़गिड़ाने लगा, काव्या रोने लगी, लेकिन माथुर जी ने एक नहीं सुनी। उन्होंने दीनानाथ जी का हाथ पकड़ा और बोले, “चलिए बाबूजी, मैं एक वृद्धाश्रम चलाता हूँ, जो मेरे लिए किसी मंदिर से कम नहीं है। वहाँ आपके जैसे कई पिता हैं। आपको वहाँ वह सम्मान मिलेगा जिसके आप हकदार हैं।”

दीनानाथ जी ने एक नजर उस घर को देखा जिसे उन्होंने अपने जीवन की सारी कमाई लगाकर बनाया था, और बिना कुछ कहे माथुर जी के साथ सीढ़ियां उतर गए। सुमित और काव्या बस खाली हाथ और शर्मिंदगी से भरे अपने उस बड़े से महल में खड़े रह गए, जो आज से सिर्फ एक वीरान इमारत बन चुका था।

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