गुरु दक्षिणा

मास्टर विद्यानाथ थोड़ा घबरा गए। उन्होंने अपनी कमज़ोर आँखों से डॉक्टर को पहचानने की कोशिश की। “कौन हो बेटा? उठो, तुम इतने बड़े आदमी हो, मेरे पैर क्यों छू रहे हो?”

डॉ. समर ने जब अपना सिर उठाया तो उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। उन्होंने रुंधे हुए गले से कहा, “मास्टर जी… आपने मुझे पहचाना नहीं? मैं आपका वही उधारी वाला छात्र, समर हूँ। मैं आपके वो पाँच सौ रुपये का उधार लौटाने आया हूँ, जो आपने मुझे पच्चीस साल पहले मेरी माँ के दस्तानों के लिए दिए थे।”

यह सुनते ही मास्टर विद्यानाथ के हाथ से लाठी छूटकर ज़मीन पर गिर गई। उनके कांपते हुए हाथ डॉ. समर के सिर पर आ गए। “समर… मेरा समर,” उनके मुंह से बस इतना ही निकला और वे फूट-फूट कर रो पड़े।

दिसंबर का महीना था और पूरे उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। कोहरे की सफेद चादर ने पूरे गाँव को अपने आगोश में ले रखा था। हवा में ऐसी गलन थी जो सीधे हड्डियों तक पहुँच रही थी। ऐसे ही एक ठंडे दिन, गाँव के इकलौते सरकारी स्कूल में पाँचवीं कक्षा के भीतर बच्चे अपने-अपने स्वेटर और टोपियों में सिकुड़े हुए बैठे थे। मास्टर विद्यानाथ, जो अपनी अनुशासनप्रियता के साथ-साथ अपने नरम दिल के लिए पूरे गाँव में जाने जाते थे, आज बच्चों को एक विशेष विषय पर निबंध लिखने के लिए कह रहे थे।

मास्टर जी ने ब्लैकबोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा— ‘मेरा सबसे बड़ा सपना’। चाक की आवाज़ के साथ ही उन्होंने पीछे मुड़कर देखा और बच्चों से मुखातिब होते हुए बोले, “बच्चों, आज तुम सबको अपने जीवन के सबसे बड़े सपने के बारे में लिखना है। जो बच्चा सबसे अच्छा और सच्चा निबंध लिखेगा, उसे स्कूल समिति की तरफ से पाँच सौ रुपये का नकद इनाम दिया जाएगा।”

पाँच सौ रुपये की बात सुनते ही पूरी कक्षा में एक हलचल सी मच गई। उन दिनों गाँव के बच्चों के लिए यह एक बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी। बच्चों की आँखों में चमक आ गई और वे उत्साह से आपस में फुसफुसाने लगे। कोई सोच रहा था कि वह इस पैसे से रिमोट वाली कार खरीदेगा, किसी के दिमाग में नई चमचमाती साइकिल घूम रही थी, तो कोई शहर जाकर ढेर सारी मिठाइयाँ और नए कपड़े खरीदने के सपने बुनने लगा।

कक्षा के सबसे कोने वाली सीट पर एक दुबला-पतला सा लड़का बैठा था, जिसका नाम समर था। समर ने जो स्वेटर पहना था, उसकी ऊन कई जगह से उधड़ चुकी थी और रंग भी फीका पड़ गया था। ठंड के मारे उसके होंठ नीले पड़ रहे थे, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई और शांति थी। जब पूरी कक्षा ख्याली पुलाव पकाने में व्यस्त थी, समर चुपचाप अपनी स्लेट और पेंसिल निकालकर कुछ सोचने लगा। उसके चेहरे पर बचपन की चंचलता नहीं, बल्कि एक समय से पहले आई परिपक्वता थी। उसने गहरी सांस ली और अपनी पेंसिल से कागज़ पर कुछ उकेरने लगा।

लगभग एक घंटे बाद, मास्टर विद्यानाथ ने सभी बच्चों की कॉपियां इकट्ठा कीं। उन्होंने अपनी कुर्सी पर बैठकर एक-एक करके निबंध पढ़ना शुरू किया। किसी ने डॉक्टर बनने का सपना लिखा था, किसी ने पुलिस अफसर बनने का, तो किसी ने दुनिया घूमने का। मास्टर जी हर कॉपी पढ़ते और हल्की सी मुस्कान के साथ उसे किनारे रख देते। लेकिन जब उनके हाथ में समर की कॉपी आई, तो उनकी नज़रें कागज़ पर ही टिक गईं। जैसे-जैसे वे समर के लिखे हुए शब्दों को पढ़ते गए, उनके चेहरे के भाव बदलते गए। कक्षा में एकदम सन्नाटा छा गया था क्योंकि बच्चे देख रहे थे कि उनके सख्त मास्टर जी की आँखें नम हो गई हैं। उनके हाथ हल्के से कांप रहे थे।

मास्टर विद्यानाथ ने अपना चश्मा उतारा, आँखों के कोरों को रुमाल से पोंछा और अपनी जगह से खड़े हो गए। उन्होंने भारी आवाज़ में कहा, “समर, ज़रा यहाँ आगे आओ।”

समर सहमा हुआ अपनी जगह से उठा और धीरे-धीरे कदमों से चलता हुआ मास्टर जी के सामने आकर खड़ा हो गया। उसे लगा कि शायद उसने कुछ गलत लिख दिया है।

मास्टर जी ने पूरी कक्षा की तरफ देखते हुए कहा, “मैंने तुम सबसे तुम्हारा सपना पूछा था और यह भी पूछा था कि अगर तुम्हें पाँच सौ रुपये मिलें, तो तुम क्या करोगे। किसी ने खिलौने मांगे, किसी ने कपड़े। लेकिन क्या तुम लोग जानना चाहते हो कि इस लड़के ने क्या लिखा है?”

पूरी कक्षा शांत थी। मास्टर जी ने समर की कॉपी से पढ़ना शुरू किया, “मेरे पिताजी अब इस दुनिया में नहीं हैं। मेरी माँ दिन भर खेतों में काम करती है और रात को दीये और मिट्टी के बर्तन बनाती है ताकि मुझे पढ़ा सके। ठंड के मौसम में गीली मिट्टी का काम करने की वजह से मेरी माँ के हाथों की त्वचा फट गई है और उनमें से खून रिसता रहता है। फिर भी वह रात-रात भर जागकर काम करती है ताकि मेरे स्कूल की फीस भर सके। अगर मुझे पाँच सौ रुपये मिले, तो मैं अपने लिए कोई खिलौना या साइकिल नहीं खरीदूंगा। मैं अपनी माँ के लिए ऊन के दो मोटे दस्ताने, घाव भरने वाली एक अच्छी सी मरहम और एक गर्म शॉल खरीदूंगा, ताकि जब वह रात को काम करे तो उसे ठंड न लगे और उसके हाथों से खून न बहे। मेरा सबसे बड़ा सपना है कि मैं एक दिन इतना बड़ा आदमी बनूँ कि मेरी माँ को कभी मिट्टी न गूंथनी पड़े।”

यह सुनकर पूरी कक्षा में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे समय रुक गया हो। बच्चों के मासूम चेहरों पर भी एक अजीब सी उदासी छा गई। मास्टर विद्यानाथ, जिन्होंने अपने जीवन में अनगिनत बच्चों को पढ़ाया था, आज एक दस साल के बच्चे की सोच के आगे नतमस्तक महसूस कर रहे थे।

उन्होंने समर के कंधे पर हाथ रखा और अपने आंसुओं को रोकते हुए कहा, “बेटा, तुम्हारी सोच ही तुम्हारी सबसे बड़ी दौलत है। तुमने सिर्फ एक निबंध नहीं लिखा है, तुमने अपने दिल का वो दर्द कागज़ पर उतारा है जो बड़े-बड़े ज्ञानी भी नहीं समझ पाते।”

मास्टर जी ने अपनी दराज़ खोली और उसमें से पाँच सौ रुपये का एक कड़क नोट निकाला। फिर उन्होंने अपना बटुआ निकाला और उसमें से पाँच सौ रुपये और निकाले। उन्होंने वे हज़ार रुपये समर के छोटे-छोटे हाथों में रख दिए।

“ये पाँच सौ रुपये तुम्हारे इनाम के हैं,” मास्टर जी ने कहा, “और ये बाकी के पाँच सौ रुपये मेरी तरफ से तुम्हें उधार हैं। मैं चाहता हूँ कि तुम अपनी माँ के लिए वो सब खरीदो जो तुमने लिखा है। और हाँ, यह मेरा उधार है। जिस दिन तुम एक बड़े और कामयाब इंसान बन जाओगे, उस दिन आकर मुझे मेरा यह उधार लौटा देना। मेरी दुआ है कि तुम जीवन में इतनी ऊंचाइयों को छुओ कि तुम्हारी माँ के सारे कष्ट हमेशा के लिए मिट जाएँ।”

समर ने अपनी नम आँखों से मास्टर जी को देखा, उनके पैर छुए और उन पैसों को अपनी मुट्ठी में कसकर पकड़ लिया। उस दिन उसने सिर्फ पैसे नहीं, बल्कि एक संकल्प भी अपने घर ले गया था।

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। दिन महीनों में और महीने सालों में बदलते गए। गाँव का वह छोटा सा स्कूल अब थोड़ा बड़ा हो गया था, लेकिन गाँव की मिट्टी की खुशबू आज भी वही थी। पच्चीस साल बीत चुके थे। मास्टर विद्यानाथ अब रिटायर हो चुके थे। उम्र के साथ उनका शरीर कमज़ोर हो गया था, बाल पूरी तरह सफेद हो चुके थे और आँखों की रोशनी भी कम हो गई थी। वे अपना ज्यादातर समय अपने घर के दालान में एक पुरानी आराम कुर्सी पर बैठकर बिताते थे।

एक दिन गाँव में अचानक से हलचल मच गई। खबर फैली कि देश का एक बहुत बड़ा और मशहूर हार्ट सर्जन (हृदय रोग विशेषज्ञ) उनके गाँव में एक मुफ्त चिकित्सा शिविर लगाने आ रहा है। गाँव वालों के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। पंचायत भवन के सामने एक बड़ा सा टेंट लगाया गया। चारों तरफ पुलिस और अधिकारियों की गाड़ियां दौड़ रही थीं। पूरा गाँव उस महान डॉक्टर को देखने के लिए इकट्ठा हो गया था।

दोपहर के करीब, लाल बत्ती लगी हुई एक बड़ी सी सफेद गाड़ी आकर टेंट के सामने रुकी। गाड़ी का दरवाज़ा खुला और उसमें से एक सूट-बूट पहने, प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला व्यक्ति बाहर निकला। यह डॉ. समर प्रताप सिंह थे। उनके चेहरे पर एक गंभीर लेकिन शांत भाव था। गाँव के सरपंच और अन्य अधिकारी उनके स्वागत के लिए मालाएं लेकर आगे बढ़े।

डॉ. समर ने मुस्कुराकर सबका अभिवादन स्वीकार किया, लेकिन उनकी नज़रें भीड़ में किसी को बेताबी से ढूंढ रही थीं। वे मंच की तरफ बढ़ने ही वाले थे कि अचानक उनकी नज़र भीड़ के पीछे लाठी के सहारे खड़े एक बुजुर्ग पर पड़ी। बुजुर्ग ने पुराने और घिसे हुए कपड़े पहने थे और उनकी आँखों पर मोटा चश्मा था।

डॉ. समर के कदम वहीं रुक गए। उनके पीछे चल रहे अधिकारी और सरपंच हैरान रह गए कि डॉक्टर साहब अचानक क्यों रुक गए। डॉ. समर ने बिना किसी की परवाह किए भीड़ को चीरते हुए उस बुजुर्ग की तरफ दौड़ लगा दी।

गाँव वाले स्तब्ध होकर देख रहे थे। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि देश का इतना बड़ा डॉक्टर एक साधारण से बूढ़े आदमी की तरफ क्यों भाग रहा है।

डॉ. समर सीधा मास्टर विद्यानाथ के पास पहुँचे और बिना एक पल की देरी किए, उस धूल भरी ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गए और मास्टर जी के दोनों पैर कसकर पकड़ लिए।

मास्टर विद्यानाथ थोड़ा घबरा गए। उन्होंने अपनी कमज़ोर आँखों से डॉक्टर को पहचानने की कोशिश की। “कौन हो बेटा? उठो, तुम इतने बड़े आदमी हो, मेरे पैर क्यों छू रहे हो?”

डॉ. समर ने जब अपना सिर उठाया तो उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। उन्होंने रुंधे हुए गले से कहा, “मास्टर जी… आपने मुझे पहचाना नहीं? मैं आपका वही उधारी वाला छात्र, समर हूँ। मैं आपके वो पाँच सौ रुपये का उधार लौटाने आया हूँ, जो आपने मुझे पच्चीस साल पहले मेरी माँ के दस्तानों के लिए दिए थे।”

यह सुनते ही मास्टर विद्यानाथ के हाथ से लाठी छूटकर ज़मीन पर गिर गई। उनके कांपते हुए हाथ डॉ. समर के सिर पर आ गए। “समर… मेरा समर,” उनके मुंह से बस इतना ही निकला और वे फूट-फूट कर रो पड़े।

डॉ. समर भी अपने मास्टर जी के गले लगकर किसी छोटे बच्चे की तरह रोने लगे। पूरी भीड़, अधिकारी, सरपंच—सब एकदम खामोश थे। वहाँ मौजूद हर इंसान की आँखों में आंसू थे। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि सफलता के इस शिखर पर पहुँचने के बाद भी कोई इंसान अपनी जड़ों और अपने गुरु के ऋण को इस तरह याद रख सकता है।

कुछ देर बाद खुद को संभालते हुए डॉ. समर ने अपने बैग से एक बहुत ही सुंदर और गर्म कश्मीरी शॉल निकाला और उसे अपने हाथों से मास्टर जी के कंधों पर ओढ़ा दिया। फिर उन्होंने एक लिफाफा मास्टर जी के हाथों में रखते हुए कहा, “मास्टर जी, आपकी दी हुई उस हिम्मत और उधार की वजह से मेरी माँ के हाथ तो ठीक हो गए थे, लेकिन उस दिन आपने मेरे दिल में जो बीज बोया था, आज वह एक पेड़ बन गया है। मेरी माँ अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके जाने से पहले मैंने उन्हें दुनिया की हर खुशी दी। और यह सब सिर्फ आपके उस दिन के विश्वास की वजह से मुमकिन हो पाया।”

मास्टर जी ने लिफाफे को वापस समर के हाथों में थमाते हुए कहा, “बेटा, गुरु का दिया उधार पैसों से नहीं चुकाया जाता। तुमने आज मेरे पैर छूकर और इतने लोगों की जान बचाकर मेरा वो उधार ब्याज सहित चुका दिया है। आज मेरी छाती गर्व से चौड़ी हो गई है।”

दोस्तों, ज़िंदगी में हम कितनी भी ऊंचाइयों पर क्यों न पहुँच जाएँ, हमें उन लोगों को कभी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने हमारे मुश्किल वक्त में हमारा हाथ थामा था। सफलता तभी सार्थक होती है जब उसमें विनम्रता और कृतज्ञता शामिल हो।

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लेखक : मुकेश पटेल

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