“क्या हुआ रोहन? तुम इतने हाइपर क्यों हो रहे हो? मैं यहाँ…”
“मैंने कहा अभी घर आओ! अगर अगले बीस मिनट में तुम घर पर नहीं हुई, तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।” फोन कट गया।
मेघना का दिल बैठ गया। उसने कभी रोहन को इस कदर गुस्से में नहीं देखा था। वह अपना बैग उठाकर बिना किसी से कुछ कहे सीधे बाहर भागी।
शहर के एक आलीशान कैफे में हल्की-हल्की जैज़ म्यूजिक बज रही थी। कॉफी की महक के बीच गपशप का दौर जारी था। सान्या अपनी दोस्त की तरफ देखकर गहरी सांस लेते हुए बोली, “मानना पड़ेगा मेघना, तुम सुपरवुमन हो! तुम्हारे जुड़वां बच्चे अभी सिर्फ सात साल के हैं, फिर भी तुम हमेशा इतनी रिलैक्स रहती हो। तुम्हारा फिगर, तुम्हारा ड्रेसिंग सेंस, तुम्हारा ये नया बुटीक का बिज़नेस… सब कुछ इतना परफेक्ट कैसे है? मेरे तो एक ही बच्चे ने नाक में दम कर रखा है। मुझे तो पार्लर जाने तक की फुर्सत नहीं मिलती।”
मेघना ने अपनी डिज़ाइनर कॉफी का एक सिप लिया और अपने रेशमी बालों को पीछे करते हुए एक विजयी मुस्कान के साथ कहा, “अरे सान्या, इसमें सुपरवुमन वाला कुछ नहीं है। बस थोड़ा सा स्मार्ट वर्क चाहिए। घर के कामों के लिए मेरे पास दो फुल-टाइम मेड हैं। कुक अलग है। और जहाँ तक बात मेरे शैतानों, कबीर और कियारा की है… तो उसका मैंने एक पक्का जुगाड़ निकाल लिया है।”
“क्या जुगाड़? मुझे भी बताओ यार!” सान्या ने उत्सुकता से पूछा।
“टैबलेट! एप्पल के दो नए आईपैड,” मेघना ने गर्व से कहा। “जब भी मुझे अपना काम करना होता है, या दोस्तों के साथ बाहर जाना होता है, या घर पर शांति से वेब सीरीज देखनी होती है, मैं दोनों को उनके रूम में बैठाकर उनके हाथ में टैबलेट थमा देती हूँ। बस! उसके बाद उन्हें न भूख लगती है, न प्यास। उन्हें तो ये भी होश नहीं रहता कि घर में कौन आ रहा है और कौन जा रहा है। घंटों तक वे गेम्स खेलने और वीडियो देखने में खोए रहते हैं। मेरे लिए तो ये टेक्नोलॉजी किसी वरदान से कम नहीं है। मेरी आज़ादी की चाबी है ये।”
कैफे की उस रंगीन रोशनी से दूर, मेघना के घर में एक खामोशी छाई हुई थी। यह शांति सुकून वाली नहीं, बल्कि डराने वाली थी। घर के ड्रॉइंग रूम में बैठी मेघना की सास, सुमित्रा देवी, अपनी माला फेर रही थीं। उनकी नज़रें बार-बार बच्चों के कमरे की तरफ उठ जाती थीं। कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था। कबीर और कियारा बिस्तर पर औंधे मुंह लेटे हुए थे। दोनों के चेहरों पर स्क्रीन की नीली रोशनी पड़ रही थी। उनकी आँखें बिना पलक झपकाए स्क्रीन पर गड़ी थीं। घर में दादी के होने के बावजूद, बच्चों ने पिछले तीन घंटों में एक बार भी उनसे पानी तक नहीं मांगा था।
सुमित्रा देवी के दिल में एक अजीब सी टीस उठती थी। उनके ज़माने में घर बच्चों की किलकारियों, उनकी लड़ाइयों और उनकी मासूम शरारतों से गूंजा करते थे। लेकिन इस घर में तो जैसे बचपन ने इन चमकते हुए चौकोर डिब्बों के सामने घुटने टेक दिए थे। जब भी उन्होंने मेघना को टोकने की कोशिश की, मेघना का एक ही रटा-रटाया जवाब होता, “मम्मी जी, आप पुराने ज़माने की बातें सोचती हैं। आज के बच्चे डिजिटल नेटिव हैं। इसी से तो वो स्मार्ट बनेंगे। आप खामख्वाह चिंता करती हैं।”
दिन, हफ्ते और महीनों में बदलते गए। मेघना की जिंदगी अपनी रफ्तार से भाग रही थी। किट्टी पार्टीज़, बुटीक के क्लाइंट्स, सोशल मीडिया पर रील्स बनाना—उसकी दुनिया इन सबमें सिमट गई थी। उसे इस बात का आभास ही नहीं हुआ कि उसके बच्चे धीरे-धीरे कितने बदल गए थे। कबीर जो कभी बहुत बातूनी हुआ करता था, अब चुपचाप रहने लगा था। अगर कोई उससे टैबलेट छीनने की कोशिश करता, तो वह बुरी तरह हिंसक हो जाता। कियारा की आँखों के नीचे काले घेरे पड़ने लगे थे और वह अक्सर रात में चौंक कर उठ जाती थी।
मेघना के पति, रोहन ने भी कई बार इस बात पर आपत्ति जताई थी। रोहन एक आईटी कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था और काम के सिलसिले में अक्सर टूर पर रहता था। जब भी वह घर आता, बच्चों को स्क्रीन में डूबा पाता।
“मेघना, ये सही नहीं है,” एक रात रोहन ने गुस्से में कहा था। “तुम बच्चों को इस तरह अनअटेंडेड नहीं छोड़ सकती। इंटरनेट एक बहुत बड़ा जंगल है। तुम्हें पता भी है वो उस स्क्रीन पर क्या देखते हैं?”
मेघना ने अपना मेकअप उतारते हुए लापरवाही से जवाब दिया, “ओह रोहन, प्लीज! मुझे लेक्चर मत दो। मैंने उन पर पैरेंटल कंट्रोल लगा रखा है। वो सिर्फ कार्टून देखते हैं या बच्चों वाले गेम्स खेलते हैं। मैं कोई गैर-ज़िम्मेदार माँ नहीं हूँ। अगर मैं उन्हें फोन न दूँ, तो वो पूरे घर में ऊधम मचाएंगे। मेरे पास इतना स्टैमिना नहीं है कि मैं चौबीस घंटे उनके पीछे भागती रहूँ।”
रोहन ने हार मानकर लंबी सांस ली और करवट बदल कर सो गया। लेकिन उसे क्या पता था कि जिस पैरेंटल कंट्रोल पर मेघना इतना भरोसा कर रही थी, सात साल के बच्चे आजकल उसे बायपास करना अच्छी तरह सीख चुके थे।
एक दिन मेघना अपनी कुछ खास सहेलियों के साथ एक फाइव-स्टार होटल में एक एग्जीबिशन अटेंड करने गई हुई थी। घर पर सुमित्रा देवी थीं जो अपने जोड़ों के दर्द की वजह से दवा खाकर अपने कमरे में सो रही थीं। मेड किचन का काम निपटा कर जा चुकी थी। कबीर और कियारा अपने कमरे में थे, और उनके हाथ में हमेशा की तरह वो ‘जादुई पुड़िया’ थी जिसने उनकी माँ को आज़ादी दे रखी थी।
रोहन ऑफिस में एक अहम मीटिंग में था। अचानक उसके लैपटॉप पर घर के वाई-फाई राउटर का एक सिक्योरिटी अलर्ट पॉप-अप हुआ। रोहन ने कुछ महीने पहले ही घर के नेटवर्क पर एक एडवांस सिक्योरिटी सॉफ्टवेयर इंस्टॉल किया था, जो किसी भी डार्क वेब या हाई-रिस्क साइट के एक्सेस पर सीधा अलर्ट भेजता था। रोहन ने जब उस अलर्ट को खोला, तो उसके माथे पर पसीना आ गया। उसके घर के आईपी एड्रेस से किसी इंटरनेशनल डार्क गेमिंग और चैट सर्वर को एक्सेस किया जा रहा था—एक ऐसा सर्वर जो खतरनाक और हिंसक गतिविधियों के लिए जाना जाता था।
रोहन का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। उसने तुरंत अपनी मीटिंग बीच में छोड़ी। “सॉरी जेंटलमैन, एक फैमिली इमरजेंसी है,” कहते हुए वह सीधा पार्किंग की तरफ भागा। गाड़ी चलाते हुए उसने कई बार घर के लैंडलाइन पर फोन किया, लेकिन किसी ने नहीं उठाया। सुमित्रा देवी गहरी नींद में थीं और बच्चे… बच्चे तो अपनी अलग ही दुनिया में थे।
पंद्रह मिनट के अंदर रोहन घर पहुँच गया। उसने दरवाज़ा खोला तो घर में अजीब सा सन्नाटा था। वह सीधे बच्चों के कमरे की तरफ भागा। कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद था।
“कबीर! कियारा! दरवाज़ा खोलो!” रोहन ने दरवाज़ा पीटते हुए चिल्लाया।
अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई। रोहन की घबराहट अब दहशत में बदल रही थी। उसने पूरे ज़ोर से एक धक्का मारा और कुंडी टूट गई।
कमरे के अंदर का नज़ारा देखकर रोहन की सांसें गले में अटक गईं। कमरे की बत्तियां बंद थीं। कबीर और कियारा ज़मीन पर बैठे थे। दोनों के हाथ में टैबलेट था। लेकिन वो कोई कार्टून या साधारण गेम नहीं खेल रहे थे। टैबलेट की स्क्रीन पर एक लाइव चैट रूम खुला हुआ था, जहाँ चेहरे पर नकाब पहने एक अजनबी आदमी उन्हें निर्देश दे रहा था। स्क्रीन पर बेहद वीभत्स, डरावने और हिंसक विज़ुअल्स चल रहे थे, जो किसी भी बच्चे के दिमाग को हमेशा के लिए बीमार कर देने के लिए काफी थे।
लेकिन बात सिर्फ विज़ुअल्स तक नहीं थी। कबीर के हाथ में रोहन का शेविंग ब्लेड था, और स्क्रीन पर बैठा वो अजनबी उसे अपनी कलाई पर एक ‘गेम का टास्क’ पूरा करने के लिए उकसा रहा था। कियारा खौफ के मारे कांप रही थी और उसकी आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे, लेकिन वो हिप्नोटाइज़्ड सी उस स्क्रीन को देख रही थी।
“कबीर! ये क्या कर रहे हो!” रोहन एक झपट्टे में आगे बढ़ा और उसने कबीर के हाथ से ब्लेड छीन कर दूर फेंक दिया। उसने तुरंत दोनों टैबलेट खींचे और उन्हें ज़मीन पर पटक कर चकनाचूर कर दिया।
कबीर, जो एक झटके से उस ट्रांस से बाहर आया, ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। कियारा सहम कर कोने में दुबक गई। शोर सुनकर सुमित्रा देवी भी जाग गईं और भागते हुए कमरे में आईं। बच्चों की हालत देखकर उनके मुँह से चीख निकल गई।
रोहन का शरीर गुस्से और खौफ से कांप रहा था। उसने कांपते हाथों से अपना फोन निकाला और मेघना को कॉल किया।
उधर एग्जीबिशन में मेघना अपनी नई डिज़ाइनर साड़ी फ्लॉन्ट करते हुए दोस्तों के साथ सेल्फी ले रही थी। फोन बजा, रोहन का नाम देखकर उसने झिझकते हुए फोन उठाया।
“हेलो…”
“अभी के अभी घर पहुँचो मेघना! इसी वक़्त!” रोहन की आवाज़ में एक ऐसी दहाड़ थी जो मेघना ने अपनी दस साल की शादी में कभी नहीं सुनी थी।
“क्या हुआ रोहन? तुम इतने हाइपर क्यों हो रहे हो? मैं यहाँ…”
“मैंने कहा अभी घर आओ! अगर अगले बीस मिनट में तुम घर पर नहीं हुई, तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।” फोन कट गया।
मेघना का दिल बैठ गया। उसने कभी रोहन को इस कदर गुस्से में नहीं देखा था। वह अपना बैग उठाकर बिना किसी से कुछ कहे सीधे बाहर भागी।
जब मेघना हाँफते हुए घर पहुँची, तो ड्रॉइंग रूम का नज़ारा देखकर उसके कदम ठिठक गए। सुमित्रा देवी सोफे पर बैठी रो रही थीं और कियारा को अपने सीने से लगा रखा था। कबीर सहमा हुआ फर्श पर बैठा था, उसके हाथ पर एक हल्का सा लाल निशान था, जहाँ ब्लेड बस छू ही पाया था। रोहन कमरे के बीचों-बीच खड़ा था, उसकी आँखें लाल थीं। उसके कदमों के पास टैबलेट्स के टूटे हुए टुकड़े बिखरे पड़े थे।
“क्या… क्या हुआ है यहाँ? रोहन, तुमने आईपैड क्यों तोड़ दिए? और कबीर को क्या हुआ?” मेघना की आवाज़ कांप रही थी।
रोहन धीरे से मेघना के पास आया। उसकी आँखों में गुस्सा कम और एक पिता की पीड़ा ज़्यादा थी। “तुम पूछ रही हो क्या हुआ? तुम जो इन्हें ये ‘जादुई पुड़िया’ देकर अपनी आज़ादी मना रही थीं ना मेघना… आज उस आज़ादी ने मेरे बच्चों की जान ले ली होती।”
रोहन ने उसे बताया कि उसने कमरे में क्या देखा। उसने बताया कि कैसे वो सो कॉल्ड ‘पैरेंटल कंट्रोल’ एक छलावा था और कैसे बच्चे एक डार्क वेब के शिकार हो चुके थे जहाँ उन्हें अपनी जान लेने का टास्क दिया जा रहा था।
मेघना के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे लगा जैसे किसी ने उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया हो। उसकी नज़रें कबीर के हाथ पर पड़े उस लाल निशान पर गईं। अगर रोहन पाँच मिनट और लेट हो जाता… मेघना की कल्पना मात्र से उसकी रूह कांप गई।
वह घुटनों के बल ज़मीन पर गिर पड़ी और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। “हे भगवान! ये मैंने क्या कर दिया? मुझे माफ़ कर दो रोहन… मुझे माफ़ कर दो मेरे बच्चों। मैं कैसी माँ हूँ जो अपने शौक के लिए अपने ही बच्चों को इस मौत के कुएं में धकेलती रही।”
मेघना ने कबीर को गले से लगा लिया। कबीर भी अपनी माँ से लिपट कर फूट-फूट कर रोने लगा। सुमित्रा देवी ने अपनी आँखें पोंछीं और भारी आवाज़ में बोलीं, “मशीनें बच्चों को नहीं पालतीं बहू। बच्चों को पालने के लिए वक़्त देना पड़ता है, अपना खून पसीना एक करना पड़ता है। तुमने विज्ञान के इस खिलौने को अपना वरदान समझ लिया था, लेकिन बिना निगरानी के ये कब अभिशाप बन गया, तुम्हें पता ही नहीं चला।”
उस दिन के बाद मेघना की दुनिया बदल गई। उसने अपना सारा घमंड, अपनी वो दिखावटी आज़ादी और वो नकली सोशल लाइफ छोड़ दी। घर में स्मार्टफोन्स और टैबलेट्स का समय और दायरा कड़ाई से तय कर दिया गया। मेघना अब अपने बच्चों के साथ पार्क में खेलने जाती, उनके साथ लूडो खेलती और उन्हें रात को कहानियाँ सुनाकर सुलाती।
उस भयंकर हादसे ने एक झटके में उस परिवार को वो सबक सिखा दिया था, जिसे समझने में शायद कई पीढ़ियां लग जातीं। टेक्नोलॉजी एक सुविधा ज़रूर हो सकती है, लेकिन एक माँ के स्पर्श, उसके समय और उसके प्यार का विकल्प कोई स्क्रीन कभी नहीं बन सकती। मेघना को अपनी भूल का एहसास हो चुका था, लेकिन हर माँ इतनी खुशकिस्मत नहीं होती कि उसे अपनी गलती सुधारने का दूसरा मौका मिल जाए।
क्या आपको भी लगता है कि आजकल माता-पिता बच्चों को समय देने की बजाय उन्हें गैजेट्स पकड़ाकर अपनी ज़िम्मेदारियों से भाग रहे हैं? अपने विचार कमेंट्स में जरूर बताएं।
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लेखिका : आरती देवी