रुचि जब भी मैके आती तो मां का पुराना एल्बम निकाल कर पुरानी तस्वीरें देखने बैठ जाती…
उसे उन ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों में जीवन के सारे सुंदर रंग समाहित हुए मिल जाते थे…
मां पापा का यौवन और अपना बचपन उसे बड़ा हीं लुभावना सा लगता था…
उन पुरानी तस्वीरों में जीवन की हर खुशी मिल जाती थी उसे…
हर एक तस्वीर को देखकर अनगिनत प्रश्न किया करती थी वो मां से…
मां ये तस्वीर कब ली गई थी???
इस तस्वीर में आपके साथ कौन है?? हम कहां गए थे तब ये तस्वीर ली गई थी???
मां हंसते हुए जवाब दिया करती – बेटा!! तुम्हें हर बार तो बताती हूं लेकिन तू जाने कैसे भूल जाती है???
बताया तो था कि कौन सी तस्वीर कब ली गई थी…
एल्बम के पन्ने पलटते हुए अचानक से रुचि एक तस्वीर देख कर चीख पड़ी..
क्या बात है मां..
इस तस्वीर में आपकी साड़ी तो कमाल लग रही है..
ये किस रंग की साड़ी थी आपकी??
तस्वीर में तो ब्लैक एंड व्हाइट दिख रही है…
मां पास आकर तस्वीर देखने लगी और अतित की यादें ताजा करते हुए बोली – बेटा ये सिल्क की साड़ी तब की है जब ढाका हमारे देश का हिस्सा हुआ करता था…
तुम्हारे दादाजी उस समय ढाका की सबसे मशहूर सिल्क की साड़ी लाए थे हम सभी बहूओं के लिए….
रुचि बड़े हीं ध्यान से सुन रही थी मां की बातें…
मां ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा – ये सिल्क की साड़ी तब के समय की सबसे महंगी साड़ी हुआ करती थी…
हमारे देश की पहचान…
हर नारी को गर्व से भरने वाला ढाका के सिल्क की साड़ी…
जब ये साड़ी मैं पहन कर मैके गई तो मेरी सहेलियां तो मेरे भाग्य से जल उठीं…
तुम्हारे दादाजी के आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त ये साड़ी मुझे अत्यंत हीं प्रिय हुआ करती थी…
फिरोजी रंग पर रानी गुलाबी रंग का चौड़ा किनारा…
असली सोने के तारों से बना हुआ…
वो सिल्क का साड़ी मेरे लिए महज एक साड़ी नहीं बल्कि किसी ईश्वरीय वरदान की तरह था…
तुम्हारे पापा ने बड़े हीं शौक से इस साड़ी को पहना कर मेरे साथ तस्वीर खिंचवाई थी…
मां अपने पुराने दिनों की यादों में इस कदर खो गई कि उसके चेहरे की रंगत बदल कर गुलाबी हो गई…
ऐसा लगा अभी-अभी उसने वहीं फिरोजी सिल्क की साड़ी पहनी हो और पापा उसका हाथ थामें चल रहे हों…
उसे इस अद्वितीय सिल्क की साड़ी में देख ब्रह्मांड की हर स्त्री उससे ईर्ष्या कर रही हो…
रुचि ने मां को हौले से छूते हुए कहा – मां!! कहां खो गयी आप??
अरूंधति जी लगभग झेंपते हुए बोली – कहीं नहीं बेटा..
कहीं भी तो नहीं….
अरूंधति जी को सिल्क की साड़ी से जुड़ी सारी बातें आज भी याद थी..
कब-कब वो साड़ी पहनी और कहां कहां घुमने गयी…
रुचि के साथ हर बार उन्हें भी पुरानी यादें साझा करने में बड़ा हीं आनंद मिलता था..
रूचि ने जिद पकड़ लिया था कि मां मुझे वो सिल्क की साड़ी देखनी है..
मां प्लीज कैसे भी कर के वो साड़ी ढूंढिए ना…
मुझे देखनी है वो सोने के तारों वाली सुनहरी सिल्क की साड़ी..
अरूंधति जी बोली -बेटा मुझे तो याद भी नहीं कि वो साड़ी कहां रखी है??
अभी तो वो संभव नहीं है ढूंढना…
अगली बार आना तो निकाल कर रखूंगी…
रुचि मन मसोसकर रह गई।
बात आई गई हो गई..
मां भी साड़ी की बात भूल गयी और रूचि भी….
कुछ कारणों से रूचि दो साल मैके ना जा सकी…
एक दिन एक मनहूस सुबह मां के सदा के लिए छोड़ कर जाने का समाचार ले कर आई…
रुचि की तो जैसे दुनिया हीं उजड़ गई..
अभी कल हीं तो मां ने कितनी बातें की थी फोन पर..
आज अचानक!!
वो विश्वास नहीं कर पा रही थी कि मां अब इस दुनिया में नहीं रही…
रोते-बिलखते वो मैके पहुंची…
पिता से लिपट कर किसी नन्हें बच्चे की भांति फूट-फूटकर रो पड़ी….
मां के एलबम से निकाली हुई सिल्क की साड़ी वाली तस्वीर टेबल पर रखते हुए एक बार फिर रो पड़ी…
भराई आवाज में तस्वीर से कहने लगी – मां!! कितनी खुश थी मैं कि जब आपको अपनी सिल्क की साड़ी वाली रंगीन तस्वीर दिखाऊंगी तब आप कितना खुश होंगी…
मुझे नहीं पता था कि आप अपनी ये रंगीन तस्वीर कभी नहीं देख पाएंगी…
मैं हीं पागल थी जो अपनी गृहस्थी के चक्कर में आपसे इतने दिन दूर रह गई…
शायद इसीलिए आप मुझसे हमेशा के लिए दूर चली गई…
रूचि जार-बेजार रोती रही..
और मां उसके दुःख से अनभिज्ञ सिल्क की साड़ी वाली तस्वीर में मुस्कुराती रही….
डोली पाठक
पटना बिहार