लाल सिल्क की साड़ी –  सुनीता माथुर 

सुष्मिता एकांत कमरे में बैठी हुई अपने बचपन के ख्यालों में खो जाती है कैसे अपनी मां से लाल “सिल्क की साड़ी” की मांग करती रहती थी! बचपन से ही सुष्मिता को अपनी मां की लाल “सिल्क की साड़ी” जिस पर सिल्वर की लेस लगी हुई थी बहुत ही प्यारी लगती थी और वह हमेशा मां से कहती थी……

मां यह साड़ी तो मुझे दे देना मैं पहनूंगी! तब मां हंसते हुए कहतीं बेटा तू बड़ी तो हो जा पढ़- लिख जा जब तेरी शादी होगी तो यह साड़ी में तुझे ही दूंगी! 

देखते-देखते सुष्मिता बड़ी हो जाती है पढ़- लिख जाती है और नौकरी भी उसकी लग जाती है और एक दिन उसकी शादी भी हो जाती है……. अब पहली बार जब सुष्मिता मायके आती है तो………….

अपनी मां से कहती है मां अब तो लाल “सिल्क की साड़ी” मुझे दे देना मां कहती हैं हां बेटा मैं साड़ी तुझे ही दूंगी! बात गई- आई हो जाती है वह अपने मायके से जब ससुराल जाती है तो वह साड़ी ले जाना भूल जाती है………

और फिर अपनी घर गृहस्ती में उलझ जाती है दो बच्चों की मां भी बन जाती है काफी टाइम मां से मिले हुए हो जाता है अब सुष्मिता अपनी घर गृहस्थी और बच्चों के मारे ज्यादा मायके नहीं जा पाती।

2 साल बाद जब मां से मिलने मायके जाती है तो सुष्मिता के माता-पिता सुष्मिता और उसके बच्चों से मिलकर और अपने दामाद आदित्य से मिलकर बहुत खुश होते हैं। 

आदित्य सुष्मिता को मायके में छोड़कर अपने घर चले जाते हैं और सुष्मिता से बोलते हैं……… तुम कुछ दिन मायके में आराम से रहो फिर मैं लेने आ जाऊंगा! सुष्मिता भी बेफिक्री से अपने मायके में रहती है लेकिन फिर से उसे अपनी  मां की लाल “सिल्क की साड़ी” की याद आ जाती है! 

मां आपने मुझे…… अपनी  लाल “सिल्क की साड़ी” अभी तक नहीं दी और मुझे बचपन से उस साड़ी को पहनने की बहुत इच्छा थी मां उसकी बात सुनकर सोच में पड़ जाती हैं……. वह मां से बार-बार पूछती है मां क्या हुआ? आप इतनी चुप क्यों हो गईं ? आपने तो मुझसे बोला था कि.. मैं तुम्हें अपनी यह लाल “सिल्क की साड़ी” जब तुम्हारी शादी होगी तब दूंगी और आप तो देना भूल गईं अब तो दे दो…….. उसकी बात सुनकर मां कहती हैं बेटा मैं तुझे दूसरी सिल्क की साड़ी दिला दूंगी!… क्यों मां ऐसी क्या बात है……. आप देना नहीं चाहतीं नहीं बेटा मैं तुम्हें देना चाहती हूं लेकिन….. ‌…… लेकिन क्या मां? 

बेटा तुम 2 साल से मायके नहीं आईं थीं तब तुम्हारी बड़ी दीदी आई तो मैंने उन्हें यह लाल सिल्क की साड़ी दे दी थी उसका भी मन था यह सुनकर सुष्मिता रोने लगती है मां में तो बचपन से बड़ी हो गई……. और आपकी उस लाल “सिल्क की साड़ी” की मेरी पहनने की बहुत इच्छा थी

आपने बिना देर किए बड़ी दीदी को दे दी और मैं इतना इंतजार करती रही तो अब भी मुझे नहीं दे पाईं? मां को अपनी गलती महसूस होती है और बोलती हैं बेटा मैंने पहले भी तेरे को देने की सोची थी लेकिन तू जल्दी में ससुराल चली गई और…… उसके बाद तू 2 साल मेरे पास नहीं आ पाई और तेरी बात भी मुझे याद नहीं रही यह सोचकर मां  दुःखी हो जाती हैं!

अब क्या कर सकते हैं? उसके बाद मां ने कई “सिल्क की साड़ियां” मुझे दिलाईं लेकिन….. सुष्मिता को मन में वही मां की लाल “सिल्क की साड़ी” घूमती रहती थी और उसको कोई भी सिल्क की साड़ी अच्छी नहीं लगती थी मन में यही सोचते हुए वह अपने ससुराल वापस फिर चली जाती है। 

राखी का त्यौहार था मां रक्षाबंधन के त्योहार पर अपनी दोनों बेटियों को घर बुलाती हैं जब सुष्मिता को अपनी बड़ी दीदी सुरभि मिलती हैं तो सुष्मिता अपनी बड़ी दीदी को मां की “सिल्क की साड़ी” की सारी बात बताती है! बड़ी दीदी बोलती हैं वह “सिल्क की साड़ी” तो मैंने अपनी बेटी को शादी में दे दी यह सुनकर सुष्मिता को लगता है कि अब तो साड़ी मुझसे कोसों दूर चली गई……

आज ना मां है ना मां की लाल सिल्क की साड़ी बस……इच्छाएं ही मन में रह गईं! सुष्मिता अपने ख्यालों में खोई हुई थी इतने में उसके पति आदित्य आजाते हैं अरे सुष्मिता तुम किन ख्यालों में खोई हुई हो? 

सुष्मिता और उसके पति दोनों ही घर में अकेले थे बच्चे और बहू नौकरी के कारण बाहर चले गए थे सुष्मिता अपने पति से कहती है………. आज मैं अपनी बचपन की यादों में खो गई थी! मुझे मां की वो लाल “सिल्क की साड़ी” याद आती रहती है उसके आगे कुछ अच्छा नहीं लगता! 

सुष्मिता के पति कहते हैं देखो सुष्मिता “जीवन चलने का नाम” होता है! आज मां ही नहीं रहीं! जब इंसान ही चला जाता है तो तुम उस लाल “सिल्क की साड़ी” का क्या गम कर रही हो………….. साड़ी तो दूसरी आ जाएगी लेकिन इंसान कभी लौट कर नहीं आता यह सुनकर सुष्मिता को मन में शांति मिलती है और वह अपने पति के साथ नई लाल”सिल्क की साड़ी” लेने चली जाती है। 

                  सुनीता माथुर 

                 अप्रकाशित रचना 

                  पुणे महाराष्ट्र

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