रोहन जैसे ही थका-हारा दफ्तर से घर लौटा, सोफे पर बैठी उसकी पत्नी रिया का पारा सातवें आसमान पर था। रोहन ने अभी अपने जूतों के फीते खोले ही थे कि रिया की तीखी आवाज पूरे ड्रॉइंग रूम में गूंज उठी, “मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती रोहन! तुम्हारी माँ से एक छोटा सा बच्चा तक नहीं संभाला जाता। मैं आज अपनी सहेलियों के साथ एक जरूरी गेट-टुगेदर में गई थी और इन्हें साफ-साफ हिदायत देकर गई थी कि कबीर को सुला देना और उसे बाहर मत जाने देना। लेकिन जब मैं वापस आई, तो देखा कि कबीर के कपड़े पूरी तरह से मिट्टी में सने हुए थे और वह जोर-जोर से रो रहा था। तुम्हारी माँ आराम से अपने कमरे में बैठी थीं। अगर इनसे एक बच्चा नहीं संभाला जाता तो साफ कह दें, मैं आया (मेड) रख लूंगी, लेकिन मेरे बच्चे की यह दुर्दशा मुझसे नहीं देखी जाती!”
रिया की बातें सुनकर रोहन का दिन भर का तनाव गुस्से में बदल गया। वह बिना कुछ सोचे-समझे सीधे अपनी माँ शांति देवी के कमरे की तरफ बढ़ा। शांति देवी उस वक्त रसोई में थीं। रोहन ने रसोई के दरवाजे पर खड़े होकर ऊँची आवाज में कहा, “माँ, यह मैं क्या सुन रहा हूँ? आप घर में रहते हुए भी कबीर का ध्यान नहीं रख सकतीं? रिया उसे आपके भरोसे छोड़कर गई थी। अगर उसे कुछ हो जाता तो? क्या आप दिन भर में एक छोटा सा काम भी जिम्मेदारी से नहीं कर सकतीं?”
शांति देवी, जो गैस के पास खड़ी कुछ चला रही थीं, अपने बेटे की इस कड़वी बात को सुनकर पल भर के लिए सुन्न रह गईं। उनके माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं और आँखों में एक अजीब सी लाचारी थी। उन्होंने गैस की आंच धीमी की और अपनी सूती साड़ी के पल्लू से पसीना पोंछते हुए बहुत ही शांत, लेकिन भारी आवाज में कहा, “बेटा, जब रिया घर से गई थी, उसके तुरंत बाद मैंने कबीर को नहलाकर साफ कपड़े पहना दिए थे और उसे खाना भी खिला दिया था। लेकिन तुम तो जानते हो कबीर को, वह बहुत चंचल है। खेलते-खेलते वह बालकनी के गमलों की मिट्टी में जा घुसा। मैंने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन बच्चों की जिद के आगे कहाँ किसी की चलती है। उसने अपने कपड़े गंदे कर लिए और जब मैंने उसे दोबारा नहलाने के लिए पकड़ना चाहा, तो वह भागने लगा और इसी जिद में रोने लगा। रिया ठीक उसी वक्त घर लौटी। उसे लगा कि मैंने कबीर को रुलाया है या मैं उसका ध्यान नहीं रख रही हूँ। और जहाँ तक कमरे में बैठने की बात है बेटा, मेरे घुटनों में आज सुबह से बहुत दर्द था, बस दो मिनट के लिए कमर सीधी करने गई थी।”
शांति देवी की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि पीछे से रिया रसोई में आ गई। उसने मुँह बनाते हुए कहा, “रहने दीजिए माँ जी, आप हर बार कोई न कोई बहाना बना ही लेती हैं। वैसे ये रसोई में से किस चीज के जलने की महक आ रही है? क्या बना रही हैं आप? आपसे एक काम ढंग से नहीं होता।”
शांति देवी ने अपनी नम आँखों को छुपाते हुए एक फीकी सी मुस्कान के साथ कहा, “बेटा, रोहन को बचपन से मेरे हाथ की गाजर की खीर बहुत पसंद है। आज सुबह इसने कहा था कि दफ्तर में बहुत काम है, थकावट हो जाती है। इसलिए सोच रही थी कि जब यह घर लौटेगा तो इसे इसकी पसंद की खीर खिलाऊंगी। बस उसी में दूध थोड़ा नीचे लग गया।”
रोहन यह सुनकर कुछ पल के लिए शांत हो गया, लेकिन रिया ने तुरंत बात काटते हुए कहा, “अरे तो इसमें कौन सा बड़ा काम कर दिया? घर में दिन भर और काम ही क्या है आपके पास?” रोहन भी बिना कुछ कहे वहाँ से अपने कमरे में चला गया। शांति देवी फिर से अपनी खीर चलाने लगीं, लेकिन इस बार खीर में मिठास से ज्यादा उनके आंसुओं का खारापन घुल रहा था।
शांति देवी के पति, दीनानाथ जी के निधन को अब तीन साल बीत चुके थे। दीनानाथ जी के रहते शांति देवी इस घर की मालकिन हुआ करती थीं। घर का हर छोटा-बड़ा फैसला उनकी मर्जी से होता था। लेकिन उनके जाने के बाद, मानों शांति देवी का इस घर में रुतबा एक कामवाली बाई से ज्यादा कुछ नहीं रह गया था। रोहन और रिया दोनों ही अपने करियर और अपनी सोशल लाइफ में इतने मशगूल रहते थे कि घर की पूरी जिम्मेदारी शांति देवी के बूढ़े कंधों पर आ गई थी।
सुबह पांच बजे उठकर दोनों के लिए नाश्ता बनाना, टिफिन पैक करना, उनके जाने के बाद पूरे घर की साफ-सफाई देखना, और फिर कबीर के स्कूल से आने के बाद उसकी पूरी देखभाल करना—यह शांति देवी की दिनचर्या बन चुकी थी। रिया अक्सर वीकेंड्स पर अपनी सहेलियों के साथ शॉपिंग या किटी पार्टी में निकल जाती और रोहन अपने दोस्तों के साथ। उन्हें लगता था कि वे हफ्ते भर काम करके थक जाते हैं, इसलिए वीकेंड पर एन्जॉय करना उनका हक है। लेकिन वे यह भूल जाते थे कि साठ साल की उम्र पार कर चुकी उनकी माँ का कोई ‘वीकेंड’ नहीं होता था।
अगर शांति देवी कभी बीमार भी पड़ जातीं, तो रिया बस इतना कहकर पल्ला झाड़ लेती, “माँ जी, आपने जरूर कोई ठंडी चीज खा ली होगी, दवा ले लीजिए और आराम कीजिए।” लेकिन आराम मिलता कहाँ था? घर के काम तो जस के तस पड़े रहते थे। बेटे और बहू की नजरों में शांति देवी अब एक ऐसी इंसान बन चुकी थीं जिनका काम सिर्फ उनकी सहूलियत के लिए घर को सुचारू रूप से चलाना था। उन्हें लगता था कि उन्होंने अपनी माँ को अपने साथ एक आलीशान फ्लैट में रखा है, हर महीने उनके हाथ में खर्च के लिए कुछ पैसे रख देते हैं, तो उन्होंने अपना सारा फर्ज निभा दिया।
लेकिन वे यह कभी नहीं समझ पाए कि एक माँ को बुढ़ापे में पैसों या आलीशान छत से ज्यादा अपने बच्चों के वक्त, उनके प्यार और दो मीठे बोल की जरूरत होती है। शांति देवी दिन भर घर में एक चक्करघिन्नी की तरह घूमती रहतीं, कबीर के पीछे भागतीं, रसोई में पसीना बहातीं और रात को जब बिस्तर पर लेटतीं, तो उनके शरीर का पोर-पोर दर्द से कराह रहा होता। लेकिन उनके मुँह से कभी उफ़ तक नहीं निकलती, क्योंकि उन्हें लगता कि अगर उन्होंने शिकायत की, तो कहीं बेटा-बहू उन्हें वृद्धाश्रम का रास्ता न दिखा दें। अपने पोते कबीर से उन्हें जो थोड़ा बहुत लगाव और प्यार मिलता, वही उनके जीने का एकमात्र सहारा था।
उस रात गाजर की खीर डाइनिंग टेबल पर रखी रही, लेकिन किसी ने उसे छुआ तक नहीं। रिया ने बाहर से पिज्जा ऑर्डर कर लिया था और रोहन बिना कुछ खाए सो गया था। शांति देवी ने चुपचाप वह खीर उठाई और फ्रिज में रख दी। उन्होंने अपने हिस्से का खाना भी नहीं खाया। रसोई की लाइट बंद करते हुए उन्होंने दीनानाथ जी की तस्वीर की तरफ देखा और बुदबुदाईं, “आप चले गए और मुझे इस घर में अजनबी बनाकर छोड़ गए।”
अगली सुबह फिर वही भागदौड़, फिर वही ताने और फिर वही खामोशी। यह सिर्फ शांति देवी की कहानी नहीं है, बल्कि आज के आधुनिक समाज में अनगिनत घरों की यही कड़वी सच्चाई है। जहाँ हम अपनी जिंदगी की रफ्तार में इतने अंधे हो जाते हैं कि हमें वह सीढ़ियां नजर ही नहीं आतीं, जिन पर पैर रखकर हम यहाँ तक पहुँचे हैं।
क्या आपको नहीं लगता कि आज के दौर में हम अपने बुजुर्गों को सिर्फ एक जिम्मेदारी समझ कर उनके एहसानों को भूलते जा रहे हैं? अगर आप शांति देवी की जगह होते या आपके आस-पास कोई शांति देवी है, तो आप उनके लिए क्या करते? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आपके विचार किसी की सोच बदल सकते हैं।
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लेखिका : नेहा पटेल