रिश्ते पैसों से नहीं संस्कार से निभाते हैं – तोषिका

हमें इन पैसों की जरूरत नहीं है, क्योंकि हम *रिश्ते पैसों से नहीं संस्कार से निभाते हैं*। शालिनी ने अपने बेटे राघव से बोला।

आपने ही तो मुझे कहा था “घर आ जा, बेटा तेरी बहुत याद आ रही है। तेरे पापा की भी तबियत ठीक नहीं चल रही है।” तो मैं आ गया और अब मैं आपको पैसे दे रहा हू, पापा के इलाज के लिए तो आप ले नहीं रही है।

शालिनी को गुस्सा आ गया, उसने बोला “हमने तुझे बुलाया है इसका मतलब तू ये समझता कि हम तुझे बस पैसों के लिए ही कॉल करते है?”

राघव ने बिना देरी करे और हिचकिचाए बोला “हां, तो आप लोग और किसके लिए मुझे कॉल करेंगे? इस दुनिया में हम दूसरे को तभी याद करते है जब हमें कुछ काम होता है।”

शालिनी ने बोला “बेटा अगर तुझे ऐसा लगता है तो, आगे से यहां आने की कोई जरूरत नहीं है।”

शालिनी कमरे में चली गई और उनके पीछे उनके पति राजेश गए और बोले “रो मत शालिनी” तभी गले लग कर शालिनी बोली “क्या हमारे संस्कारों में कोई कमी रह गई थी या फिर हमारे प्यार में की हमारे बेटे के लिए उसके पैसे ज्यादा जरूरी हो गए है?”

राजेश ने बोला “ये हमारे पिछले जन्मों का ही कोई कर्जा होगा जो हमें ऐसा दिन देखने को मिला।”

उस दिन शाम को घर में पूरा सन्नाटा था। राजेश कमरे में गया और देखा शालिनी सो रही है, तो उसने बड़े आराम से पुरानी फोटो एल्बम निकाली जिसमें राघव की बचपन से लेकर उसके बड़े होने तक सारी तस्वीरें थी। उन सब को देखते देखते उसको वो अपने पुराने दिन याद आ गए जब राघव एक मासूम बच्चा होता था और हमेशा अपनी मां के साथ ही चिपका रहता था। वो सारी यादें जब उसका पहला दांत आया, जब उसने पहली बार चलना सीखा, जिस दिन उसने पहली बार पापा बोला था उसमें वो सब था और राजेश को बस यही ख्याल आ रहा था कि ये सब कहा और कैसे बदला की राघव अब वो पुराना वाला उनका बेटा नहीं रहा।

कुछ दिन ऐसे ही चले फिर राजेश से अपनी पत्नी शालिनी की हालत नहीं देखी जा रही थी तो उन्होंने राघव से बात करने का सोचा पर राघव फोन नहीं उठा रहा था ना ही मैसेज देख रहा था तभी उनके दिमाग में कुछ ऐसा आया जिस से उनके बेटे को समझ आ जाए।

वो अपने बेटे से मिलने उसके घर गए वहां उन्होंने राघव को एक बार घर आने को कहा

पहले तो राघव बोला “आप लोगों ने ही मुझे कहा था आना मत”।

राजेश ने किसी तरह उसको मनाया और राघव आखिरी में मान गया।

अगले दिन राघव आया और उसको बैठा कर पानी दिया और आराम से वही बातें चल रही थी जैसे एक आम घर में चलती है। तभी अचानक से राघव को चक्कर आया और वो बेहोश हो गया।

उसको डॉक्टर के पास ले जाया गया वहा डॉक्टर ने देखने के बाद बोला कि इनकी दोनों किडनी खराब हो गई है, हमें आप में से किसी एक की किडनी चाहिए होगी। 

बिना सोचे समझे शालिनी बोली “आप मेरी ले लीजिए किडनी, चाहे दोनों ले लीजिए बस मेरे बेटे को बचा लीजिए।”

*कुछ घंटों बाद*

राघव को होश आया, तो उसने देखा उसके आगे स्क्रीन ऑन है, उसपर उस समय का नाजरा चल रहा था जब शालिनी ने अपनी परवाह किये बिना अपनी किडनी देने की बात की। ये देखते ही राघव की आँखें भर आई, तभी वहां राजेश आए और राघव ने उनसे पूछा “मां, कहा है पापा? वो ठीक तो है ना?”

राजेश बोला “हां वो ठीक है बस बेहोश है।”

जब शालिनी को होश आया, राघव वही बैठा हुआ था और शालिनी के मुंह से उसने सबसे पहले यही सुना “राघव, राघव ठीक है अब?”

राघव वही पर रो पड़ा और अपनी मां को गले लगाते हुए बोला “मां, मैं ठीक हू, मुझे माफ कर दीजिए।” वहां पर सारे गिले शिकवे मिटे तो राजेश और डॉक्टर साहब का हसना शुरू हो गया। राघव के पूछने पर कि वो हस क्यों रहे है, राजेश ने उनको सब बताया कि किसी को कुछ नहीं हुआ है, और कैसे राघव को सही राह दिखाने के लिए ये नाटक किया था और राघव और शालिनी दोनों को बस बेहोशी का इंजेक्शन दिया था।

इस बात पर सब ही हँसे और एक दूसरे को गले लगा लिया। आखिर में किसी भी मां बाप के संस्कार व्यर्थ नहीं जाते, वो बस बच्चे दुनिया की भाग दौड़ और भीड़ में रास्ते भटक जाते है।

लेखिका

तोषिका

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