गलती या महापाप – रिंकी अग्रवाल ‘प्राची’

अम्मा मुझसे अब नहीं चला जाता हांडा लेकर। बारातों में बहुत-बहुत दूर चलना पड़ता है। नाचने गाने में ही लगे रहते हैं रिश्तेदार। आगे ही नहीं बढ़ने देते। पांचवा महीना चल रहा है मेरा। इतना तेज संगीत और कानफोडू डीजे। मुझे तो डर लगता है कही बच्चों को कुछ नुकसान ना हो जाए।

गर्भवती पिंकी ने अपनी सास से कहा। पिंकी ब्याह शादी में लाइट वाला हांडा लेकर चलती थी अपनी अन्य साथी बहनों के साथ। सही रुपए मिल जाते थे इस काम के। लेकिन गर्भावस्था के चलते अब उसे दिक्कत महसूस हो रही थी। दिक्कत तो पहले भी थी क्योंकि शराब पीकर बहुत लोग गलत निगाह से भी देखते थे उसे।

जिसे उसकी नज़रें भाप लेती थी। विरोध भी तो नहीं कर सकती थी किसी का। क्योंकि उसे तो 1 मिनट में ही काम से निकाल दिया जाएगा। हम लोग हमेशा मानसिक रूप से दास ही तो होते हैं। चाहे कोई छोटे पद पर हो या बड़े पद पर। हर किसी को डर हमेशा ही बना रहता है।

उसकी सास उत्तर देते हुए बोली अगर काम नहीं करेगी तो रोटी कहां से बनेंगी। तेरा मर्द तो सुबह शाम पीकर ही पड़ा रहता है। काम तो करना ही पड़ेगा। मर्द करे या औरत। बैठकर कौन खिला देगा भला तुझे।

वह जानती थी कि अब उसका कोई सहारा नहीं है। अच्छे भले घर की लड़की थी। लेकिन घर से भाग कर उसने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल कर ली। इतनी बड़ी भूल की जिसकी कोई माफी न थी। उसकी सजा उसे हर रोज मिलती। प्यार का भूत तो यहां आते ही उतर गया। अपने बाप के घर पैसे की अहमियत समझी ही नहीं उसने। यहां उसे पैसा देखने को ही नहीं मिला।

उसके घर से भाग जाने के बाद उसके मायके में इतनी बदनामी हुई की पिता तो सदमा बर्दाश्त कर ही नहीं पाए और दुनियां छोड़ गए। माँ तो उसकी पहले से ही नहीं थी। भैया भाभी और सभी रिश्तेदारों ने उससे बिल्कुल बाय काट कर ली। क्योंकि उसने सभी के आत्मसम्मान और परिवार पर धब्बा जो लगा दिया था।

जिसके संग उसने अपनी सपनों की दुनियां सजाई थी वह तो एक नंबर का नकारा, शराबी किस्म का आदमी था। जिसे वह पहचान ही नहीं पाई।

उसकी स्कूल बैन का ड्राइवर ही तो था। कच्ची उम्र और शारीरिक आकर्षण को प्यार समझ बैठी। पूरे घर से बगावत कर ली। इतना शराबी निकला कि ड्राइविंग लाइसेंस भी कैंसिल हो गया। काम भी नहीं मिलता कोई उसे। यहां आकर उसे पता चला कि उसकी तो पहली पत्नी है और दो बच्चे भी हैं।

शुरू में तो अलग रही लेकिन पैसे ना होने के कारण अब उसे यही नरक की जिंदगी जीनी पड़ती। सौतन और उसके बच्चे उसके पूर्णतः दुश्मन थे। या यों कहो कि वह दुश्मन थी उनके घर संसार में आग लगाने की।

खाने तक के लाले पड़ रहे थे इसलिए ही उसे काम पर जाना पड़ता है। खूब सोचती कि निकल जाऊं इस दलदल से। पर जाए तो जाए कहां। सभी दरवाजे बंद थे। क्यूंकि #रिश्तो_की_जमा_पूंजी तो वह पहले ही लूटा चुकी थी।

जहां जाती गलत निगाहें चीरती उसे। पढ़ी-लिखी नहीं थी ज्यादा, कच्ची उम्र। कहीं भी उसे काम नहीं मिलता सही तरीके से। अपनी सोच विचार में लगी थी तभी उसकी तंत्रा टूटी, आवाज सुनकर।

पिंकी जल्दी चल बारात में हांडा उठाने वाली अन्य महिलाएं उसे बुलाने के लिए आई और वो चल दी धीरे-धीरे उनके साथ क्योंकि सवाल अब भूख का था। अपनी भी और होने वाले बच्चें की भी।

एक प्रश्न विचारणीय है। कच्ची उम्र में इस तरीके के प्रेम प्रसंग महज शारीरिक आकर्षण होते हैं। जो वासना पूर्ति के साथ समाप्त हो जाते हैं लेकिन दर्द जीवन भर का बन जाते हैं। साथ ही ऐसे रिश्तों में उत्पन्न बच्चे भी शिकार होते हैं दर्द का, उपेक्षा का। 

फिर जिन्होंने खुद अपने परिवार का मान नहीं रखा, वह अपनी उत्पन्न होने वाली संतानों से कैसे उम्मीद कर सकते हैं कुछ अच्छा होने की।

 रिंकी अग्रवाल ‘प्राची’ 

स्वतंत्र लेखिका एवं कवियत्री 

खुर्जा बुलंदशहर उत्तर प्रदेश 

# रिश्तो की जमा पूंजी 

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