दो लिफाफे – लतिका श्रीवास्तव 

हॉस्पिटल से घर लौटने के बाद बड़े बेटे संजीव ने पिता श्रीकांत के हाथ में एक मोटा लिफाफा रख दिया।

“पापा, इसमें पचास हजार रुपये हैं। आगे दवाइयों और ज़रूरतों में काम आएँगे।”

उसी समय छोटे बेटे आशीष ने भी एक छोटा-सा लिफाफा पिता की ओर बढ़ाया।

श्रीकांत दोनों लिफाफों को देर तक देखते रहे। फिर उनकी आँखों में जैसे बरसों पुरानी एक तस्वीर तैर गई…

“बेटा… तुझे बचपन के वो पाँच रुपये याद हैं जो तुम दोनों भाइयों को स्कूल जाते समय मैं देता था और कहता था बेटा जीवन में पैसों का बहुत महत्व है ये ना हों तो कोई रिश्ता ना हो इसका महत्व अभी से समझ लो और तुम्हारी मां हमेशा कह दिया करती थी पैसा कमाना जरूरी है जरूरतें पूरी करने के लिए लेकिन रिश्ते पैसों से नहीं संस्कार से ही कमाए जाते हैं ये याद रखना ….और मैं उसकी बात पर हमेशा हंस दिया करता था।

तुम दोनों स्कूल से जब आते तो तुम्हारी मां रोज एक सवाल जरूर करती तुम दोनों से कि आज पांच रुपए का क्या किया?

संजीव रोज नई नई खाने की चीजों का नाम बताता कभी समोसा कभी बड़ा और मै खुश होता वाह बढ़िया किया और खाना ।

लेकिन पापा ये आशीष रोज एक बूढ़ी अम्मा के पास जाकर बैठ जाता है उसके पास  कुछ बेर कुछ बिही जो वह शायद किसी पेड़ से गिरा हुआ बीन कर ले आती थी उसकी ढेरी लगाती है जो मुझे बेकार का लगता है वही सामान यह रोज खाता है देखना इसका पेट खराब हो जाएगा संजीव ने जैसे ही बताया …

क्यों आशीष तुम ऐसा क्यों करते हो मां पूछ बैठी।

मां पता नहीं मुझे  उस अम्मा से मिलना बहुत अच्छा लगता है वह बहुत गरीब है मां और जब मैं उससे कुछ भी खरीद कर पांच रुपए देता हूं तब वह इतनी खुश हो जाती है कि मैं उसका दमकता चेहरा देखता रह जाता हूं मुझसे बहुत सी बातें भी करती है आशीष बहुत भोलेपन से कहता।

मैं डांट लगाता तू मूरख है रुपए बर्बाद कर रहा है जबकि तेरी मां आशीष की तारीफ करती थी कि रुपए खर्च करने के संस्कार है इसमें।

आशीष अभी तू बहुत छोटा है बच्चा है ये सब संस्कार इंसानियत बहुत बड़े शब्द हैं अभी से इन झमेलों में पड़ने की अभी तेरी उम्र नहीं है।अपनी मनपसंद चीज़ें खरीद कर खाया कर मस्त रह समझा… कुछ सीख अपने संजीव भैया से मैं हमेशा यही समझाइश देता और आशीष पर नाराज होता कैसा बेवकूफ लड़का है । क्या मजा आता है इसे उस बूढ़ी अम्मा के उन बेर और बिही में।

लेकिन तेरी मां हमेशा आशीष के सिर पर दुलार से हाथ फिरा दिया करती थी।

राजा बेटा है ऐसा ही करना कहती।

धीरे धीरे दोनों बेटे बड़े होकर बाहर नौकरी करने चले गए।

बड़ा बेटा संजीव हमेशा रुपए भेजता रहता था ताकि मां पिता की जरुरते पूरी होती रहें किसी पर विवश ना होना पड़े।और छोटा बेटा आशीष रुपयों के साथ नियम बना हर दो महीने घर आता दो चार दिन साथ में रहता घर की साज संवार कर चला जाता।

सारे रिश्तेदार आशीष की ज्यादा तारीफ करते।संजीव के कानों में गाहेबगाहे जब ये तारीफें पड़ती उसे चिढ़ होती।इतने ज्यादा रुपए तो मैं भेजता हूं सारे खर्चे तो मैं संभालता हूं आशीष क्या करता है बस दो चार दिन जाकर हंसी गप्पे कर आता है।

एक बार श्रीकांत जी बहुत बीमार पड़ गए हॉस्पिटल में भर्ती करना पड़ गया।डॉक्टर ने ऑपरेशन करने की सलाह दी।

मां परेशान और व्याकुल हो गईं दोनों बेटों को तुरंत सूचना दे दी।

संजीव ने मां का फोन आते ही वहां के सबसे बड़े अस्पताल में डॉक्टरों से बात की और पांच लाख रुपए तुरंत डिपॉजिट कर दिए ताकि पिता का इलाज अच्छे से हो जाए और मां को बता दिया कि आप चिंता मत करिए इलाज की पूरी व्यवस्था मैने कर दी है।ज्यादा खर्चा आएगा तो मैं और भेज दूंगा आप पिता का ख्याल रखिए।

मां बहुत ज्यादा परेशान थी उसे उस समय किसी सहारे की किसी की उपस्थिति की ,दो सहानुभूति के बोल की सख्त जरूरत थी आंखो में आंसू लिए ठीक है बेटा कह चुप रह गई।

आशीष मां का फोन आते ही चिंतित हो उठा। सारा काम काज छोड़ वह जो भी साधन मिला मां के पास पहुंच गया कांधे पर हाथ रख कर बोला,

मां आप चिंता मत करो पिता जी जल्दी अच्छे हो जाएंगे।ये लो मंदिर का प्रसाद खाओ आते समय रास्ते में मैने भगवान से प्रार्थना की है।भैया ने रुपए की व्यवस्था कर दी है आप परेशान मत हो बेटे की उपस्थिति ने मां को हिम्मत दी ।

आशीष ने आते ही डॉक्टरों से ऑपरेशन के बारे में विस्तार से चर्चा की पिता को हिम्मत दी।पिता की देखभाल की पूरी जवाबदारी अपने हाथ में ले ली।खुद अपने हाथों से पिता  को दवा खिलाता ,कपड़े बदलता,बातें करता साथ में हमेशा बैठा रहता।मां का ख्याल रखता।

श्रीकांत जी बीमार क्या पड़े अशक्त और मजबूर हो गए।आशीष के सहारे हो गए।आशीष का हाथ पकड़ कर उठते बैठते खाते पीते।जिस आशीष को आज तक वह नासमझ और बेवकूफ समझते थे इस समय उसकी सेवा उसके ख्याल से उनका दिल भर आता था।कितने ममत्व से कितने सम्मान से वह उनके सारे काम करता था अपनी मां को भी नहीं करने देता था।आज उनको छोटे बेटे का स्वभाव और संस्कार समझ आ रहा था।

ऑपरेशन वाले दिन जब बड़ा बेटा संजीव पहुंचा ऑपरेशन शुरू हो चुका था।आशीष विशेष परमिशन से पिता के साथ वाले रूम में था।

संजीव घबराया हुआ था।ऑपरेशन कक्ष के बाहर तेजी से चहल कदमी कर रहा था मां पास ही बैठी ईश्वर की प्रार्थना कर रही थी।

जैसे ही ऑपरेशन कक्ष से डॉक्टर बाहर निकले संजीव लपक कर गया डॉक्टर साहब सब ठीक है ना व्यग्रता से उसने पूछा।

हां ऑपरेशन सफल रहा चिंता की कोई बात नहीं डॉक्टर ने मुस्कुरा कर जैसे ही कहा संजीव ने राहत की सांस ली।उसे महसूस हुआ कि अगर मैं रुपए ना भेजता तो ऑपरेशन ना हुआ होता अच्छा किया मैने तुरंत रुपए भेज दिए थे।

डॉक्टर साहब रुपए तो समय से मिल गए थे ना और कोई बिल या फीस तो पेंडिंग नहीं है जैसे ही उसने कहा डॉक्टर ने जैसे उसके मन के भाव ताड़ लिए।

“संजीव जी इलाज आपके पैसों से हुआ है… लेकिन स्वस्थ होने की इच्छा आपके भाई के साथ ने जगाई है। सच कहूँ तो ऐसे बेटे कम होते हैं। एक बात याद रखिए—कुछ दवाइयाँ मेडिकल स्टोर में नहीं मिलतीं। वे अपनों के साथ, उनके स्पर्श और उनके समय में मिलती हैं। पिछले चार दिनों में आपके छोटे भाई ने आपके पिता को वही दवा दी है कहते हुए डॉक्टर उसे रूम की खिड़की पर ले गए..आप खुद ही देख लीजिए।

संजीव ने कांच से झांक कर देखा आशीष पिता को दवाई पिला रहा है सूप पिला रहा है गले में एप्रन बांध रहा है फिर उनका मुंह गीले कपड़े से साफ कर रहा है .. बातें कर रहा है हंसा रहा है सब कुछ बेहद अपनत्व से और पिता भी बहुत आश्वस्त दिख रहे हैं….. वह देखता ही रह गया उसके भीतर कुछ घुमड़ने लग गया ।

शायद वो भ्रम कि इतनी बड़ी धनराशि भेजकर ही उसने बेटा होने का फर्ज बखूबी निभाया टूटने लगा था।

घर आकर जब लिफाफा पिता के हाथ में थमाया तो पिता ने उसका थाम लिया पिता मुस्कुराए।

“बेटा, पैसे कमाना बहुत ज़रूरी है। लेकिन रिश्ते कमाने के लिए संस्कार चाहिए।#रिश्ते पैसों से नहीं संस्कार से निभते हैं।

“बचपन में पाँच रुपये मैं देता था… लेकिन उन्हें कहाँ खर्च करना है, यह तुम्हारी माँ सिखाती थी। आज समझ आया कि रुपये खर्च करने के भी संस्कार होते हैं।”

मै आशीष को नासमझ कहता था बूढ़ी अम्मा से सामान खरीदना पांच रुपए देने पर नाराज होता था लेकिन “बेटा, संस्कार सिखाने का सही समय बचपन होता है। बड़े होकर तो इंसान सिर्फ़ वही जीता है, जो बचपन में सीखता है।”

हां पापा “बचपन में पाँच रुपये तो दोनों को बराबर मिले थे मां ने सीख भी हर बार बराबर ही दी थी, लेकिन संस्कारों ने तय किया कि बड़े होकर उन रुपयों का मूल्य कौन कैसे समझेगा।”कहते हुए संजीव ने आशीष के साथ पिता को गले से लगा लिया।

उस दिन श्रीकांत जी के हाथों में पकड़े दो लिफाफों का वजन बराबर नहीं था। एक में रुपये थे… दूसरे में संस्कार। और पहली बार संजीव समझ पाया कि रिश्तों की सबसे बड़ी पूँजी पैसा नहीं, अपनापन होता है। 

लतिका श्रीवास्तव 

# वाक्य कहानी रिश्ते पैसों से नहीं संस्कार से निभते हैं

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