रिश्ते पैसों से नहीं संस्कार से निभते हैं | – सुदर्शन सचदेवा

बरसों पुराना वह घर आज भी वैसा ही था। आँगन के बीचों-बीच खड़ा नीम का पेड़, बरामदे में रखी लकड़ी की पुरानी कुर्सी, तुलसी के चौरे पर जलता दीपक… सब कुछ पहले जैसा। यदि कुछ बदल गया था, तो वह था घर का शोर। जहाँ कभी बच्चों की हँसी गूँजती थी, वहाँ अब सन्नाटा अपनी चादर बिछाए बैठा था।

सावित्री देवी अक्सर उसी कुर्सी पर बैठकर पुराने दिनों को याद करतीं। उन्हें याद आता—कैसे चारों बच्चे शाम होते ही दौड़ते हुए घर आते थे। कोई स्कूल की बातें सुनाता, कोई माँ की गोद में सिर रखकर सो जाता। त्योहारों पर पूरा घर महक उठता था। रसोई में पकवान बनते और आँगन में रिश्ते पकते थे।

आज बच्चे बड़े हो गए थे। सब अपने-अपने जीवन में सफल थे। किसी के पास बड़ा कारोबार था, कोई विदेश में नौकरी कर रहा था। बैंक खातों में धन बढ़ता गया, लेकिन मिलने के दिन कम होते गए।

उस दिन सावित्री देवी का सत्तरवाँ जन्मदिन था।

सुबह बड़े बेटे का फोन आया।

“जन्मदिन मुबारक हो, माँ! आपके खाते में दो लाख रुपये भेज दिए हैं। जो मन करे खरीद लेना। इस बार आ नहीं पाऊँगा, एक ज़रूरी प्रोजेक्ट चल रहा है।”

“खुश रहो बेटा…” इतना कहकर उन्होंने फोन रख दिया।

कुछ देर तक वे मोबाइल को देखती रहीं। मन ही मन बोलीं—

“जब तू छोटा था, एक पल मुझे देखे बिना नहीं रहता था। आज मेरे लिए समय नहीं, लेकिन पैसे भेजने का समय मिल गया। शायद यही ज़िंदगी है…”

उनकी आँखें भीग गईं, मगर चेहरे पर वही ममता भरी मुस्कान थी।

तभी दरवाज़े की घंटी बजी।

छोटा बेटा, बहू और दोनों पोते-पोतियाँ खड़े थे।

“दादी… जन्मदिन मुबारक हो!”

पोती ने अपने हाथों से बनाया हुआ एक कार्ड दिया। उस पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था—

“दादी, आप हमारे घर की धड़कन हैं।”

सावित्री देवी ने कार्ड को सीने से लगा लिया। उस कागज़ की कीमत बाज़ार में कुछ भी नहीं थी, लेकिन उनके लिए वह दुनिया का सबसे अनमोल उपहार था।

शाम को सबने मिलकर साधारण-सा भोजन किया। खाने के बाद पोते ने पूछा—

“दादी, आपके बचपन का सबसे अच्छा दिन कौन-सा था?”

सावित्री देवी मुस्कुराईं।

“कोई एक दिन नहीं बेटा… हमारा पूरा बचपन ही अच्छा था। क्योंकि तब घर छोटा था, लेकिन दिल बहुत बड़े थे। रोटियाँ कम होती थीं, पर कोई भूखा नहीं सोता था। कपड़े कम थे, लेकिन रिश्तों में गर्माहट बहुत थी।”

कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।

कुछ दिनों बाद सावित्री देवी अचानक बीमार पड़ गईं।

खबर मिलते ही सभी बच्चे पहुँच गए।

बड़ा बेटा डॉक्टरों और दवाइयों की व्यवस्था में लग गया। छोटा बेटा पूरी रात माँ का हाथ पकड़े बैठा रहा।

रात के सन्नाटे में सावित्री देवी की आँख खुली।

उन्होंने धीरे से बड़े बेटे का हाथ अपने हाथ में लिया और बोलीं—

“बेटा… तुमने मुझे कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी। लेकिन एक कमी हमेशा रही…”

“कौन-सी कमी, माँ?” उसने भर्राए स्वर में पूछा।

“तुम्हारे समय की…”

इतना सुनते ही बड़े बेटे की आँखों से आँसू बह निकले।

उसे याद आने लगा—वह बचपन, जब माँ उसके लिए रात भर जागती थीं। परीक्षा के दिनों में उसके साथ बैठती थीं। बुखार में उसके माथे पर ठंडी पट्टियाँ रखती थीं। उसने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वही माँ उसके साथ बैठने के लिए तरस जाएँगी।

उसने माँ के चरणों में सिर रख दिया।

“माँ… मुझे माफ़ कर दो। मैं घर के लिए कमाता रहा, लेकिन घर को ही समय देना भूल गया।”

सावित्री देवी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

“बेटा, गलती पैसे कमाने की नहीं थी। गलती यह थी कि तुमने समझ लिया था कि पैसा ही रिश्तों की सबसे बड़ी ज़रूरत है। याद रखना, परिवार को सुविधाओं से ज़्यादा अपनेपन की ज़रूरत होती है।”

उस दिन के बाद परिवार ने एक छोटा-सा नियम बनाया।

हर महीने का पहला रविवार केवल परिवार के नाम होगा। न मोबाइल, न ऑफिस, न कोई बहाना। बस सब साथ बैठेंगे, खाना खाएँगे, बातें करेंगे और पुरानी यादों को फिर से जीएँगे।

धीरे-धीरे घर का सन्नाटा फिर से हँसी में बदलने लगा। आँगन का नीम पहले की तरह झूमने लगा। सावित्री देवी अक्सर बरामदे में बैठकर अपने परिवार को देखतीं और मन ही मन ईश्वर का धन्यवाद करतीं।

उन्होंने महसूस किया कि घर की असली समृद्धि तिजोरी में नहीं, एक-दूसरे के दिलों में बसती है।

संदेश

रिश्ते धन से नहीं, मन से चलते हैं।

संस्कार उन्हें जन्म देते हैं, सम्मान उन्हें सींचता है, और अपनापन उन्हें जीवनभर जीवित रखता है।

जिस घर में स्मृतियाँ सँजोई जाती हैं, वहाँ रिश्ते कभी बूढ़े नहीं होते।

सुदर्शन सचदेवा

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