मनीषा की शादी को अभी 6 महीने ही हुए थे। ससुराल में सास शांति देवी, पति अमन और देवर यकीन थे। शांति देवी मोहल्ले में मशहूर थीं – साफ दिल, थोड़ी कड़क और हिसाब की पक्की।
शादी के पहले ही दिन शांति देवी ने दहेज का सामान देखा – फ्रिज, टीवी, सोना। फिर मनीषा का हाथ पकड़कर बोलीं, “बेटी, ये सब तो दिखावा है। घर पैसे से नहीं, संस्कार और समझदारी से चलता है।”मनीषा ने हाँ में सिर हिला दिया, पर मन में सोचा – “सासें तो ऐसे ही बोलती हैं।”
पहले महीने में ही खटपट शुरू। मनीषा की नौकरी थी, ऑफिस से लेट आती। खाना 10 बजे बनता। शांति देवी ताना मारतीं, “हमारे जमाने में सास उठने से पहले रसोई निपट जाती थी। आजकल की बहुओं को बस फोन और AC चाहिए।” मनीषा भी जवाब देती, “माँ जी, आप भी बस बचत और कमाई की बात करती रहती हो।” अमन बीच-बचाव करता, पर घर का माहौल भारी रहने लगा।
फिर एक झटका आया। अमन के बिजनेस में बड़ा नुकसान हो गया। बैंक का कर्ज, दुकान का किराया, घर का खर्च – सब एक साथ। सैलरी रुक गई। फ्रिज खाली, गैस खत्म। शांति देवी की जमा पूंजी के 2 लाख भी बिजनेस में लग चुके थे।
उस मुश्किल में मनीषा ने अपनी सैलरी से घर चलाना शुरू किया। सुबह 9 से रात 8 ऑफिस, फिर आकर खाना। थक कर चूर हो जाती। एक दिन गैस खत्म हो गई उसने जैसे तैसे मैनेज करके खाना बनाया, तब शांति देवी ने पहली बार उसकी थकी आँखें देखीं। बोलीं, “बेटी, माफ कर दे। मैंने तुझे बहू नहीं, बस दहेज का हिसाब समझा।”
उसी रात लाइट चली गई। गर्मी से हाल बेहाल । शांति देवी ने अपना पुराना टेबल फैन मनीषा के कमरे में भिजवा दिया और खुद बिना पंखे सो गईं। सुबह मनीषा ने देखा तो सास का सिर दर्द से फटा जा रहा था। मनीषा ने मायके से पैसे माँगने के बजाय अपना सोना बेचकर गैस सिलेंडर और दवाई ले आई।
जब शांति देवी को पता चला तो उन्होंने वो सोना वापस कर दिया। आँखें भर आईं। बोलीं, “बेटी, 2 लाख रुपये से ज्यादा कीमती ये है कि तू बुरे वक्त में घर छोड़कर नहीं गई। पैसा तो कल आ जाएगा, पर तेरा साथ अनमोल है। आज समझ आई कि रिश्ते तराजू पर नहीं तौले जाते।”
उस दिन के बाद घर बदल गया। शांति देवी खुद सब्जी काट देतीं, मनीषा को “बेटा” कहकर बुलातीं।मनीषा भी रात को उनके पैर दबा देती। मोहल्ले वाली पूछतीं, “सरोज जी, बहू से पटने लगी?” तो वो हँसकर कहतीं, “पटना क्या, बहू तो सोना थी। मैं ही उसे दहेज के तराजू में तोल रही थी। रिश्ते पैसों से नहीं बनते, परख से बनते हैं।”
6 महीने बाद अमन का काम फिर पटरी पर आ गया। पैसा वापस आ गया। पर जो इज्जत, भरोसा और अपनापन घर में आ गया था, वो नोटों से नहीं खरीदा जा सकता था।
मनीषा ने डायरी में लिखा – “सास नहीं मिली, माँ मिल गई। और माँ वो होती है जो हिसाब नहीं रखती, बस साथ देती है।”
*सीख*: रिश्ते EMI पर नहीं चलते। बुरे वक्त में जो बिना शर्त खड़ा रहे, वही अपना है। पैसों से AC खरीदा जा सकता है, पर चैन की नींद नहीं।
Thanks & Regards,
Ranu Jain