रिश्ते पैसों से नहीं संस्कार से निभते है – ऋतु अग्रवाल

शहर के सबसे प्रतिष्ठित उद्योगपति हरिनारायण अग्रवाल सेठ का नाम सम्मान से लिया जाता था। करोड़ों की संपत्ति, कई फैक्ट्रियाँ और आलीशान हवेली… किसी चीज़ की कमी नहीं थी। लेकिन किस्मत ने कई अनहोनी भी कर दी थी पत्नी की देहांत एक लंबी बीमारी के चलते हो गया  था |

इकलौता बेटा धनंजय और उसकी पत्नी माला की एक कार एक्सीडेंट में मौत हो गई |उनके तीन बच्चों की देखभाल ही उनका मकसद रह गया |तीनों को पढ़ाया लिखाया और संस्कारों से सींच कर उन्हें खूब काबिल बनाया  |सबकी शादी कर दी और सब को सेटल कर दिया |

उनके दो  पोते और एक -पोती —आरव, राघव और सिया।

आरव विदेश में सेटल हो गया । हर महीने महंगे उपहार भेज देता, लेकिन वर्षों से दादा के पास बैठकर दो घड़ी बातें करने का समय उसके पास नहीं था।

राघव बिज़नेस संभालता था। हर मुलाकात में दादा की दवाइयों और सेहत का हाल पूछता, मगर बातों का अंत हमेशा फैक्ट्री, शेयर और संपत्ति पर आकर रुक जाता।

सिया जिसके साथ किस्मत अपना खेल खेल गई और कम उम्र में विडो हो गई |आत्मनिर्भर रहना है, इसलिए दादा की या भाइयों की मदद न स्वीकार कर सरकारी टीचर बन गई ,और उसका एक बेटा था जो अभी बस दस साल की ही था|

हरिनारायण जी ने उसकी शादी की तो बड़े खानदान में थी, लेकिन बेटे की मौत का जिम्मेदार सिया को ठहरा कर ससुराल वालों ने उससे पत्ता झाड़ लिया, अब वो एक छोटे घर में रहती है और हर संडे दादाजी के साथ बिताती है और उनके एक हफ्ते  का पूरा टाइम टेबल तैयार करना और सब नौकरों को दादाजी की सब बाते समझना और बताना ,उन्हें रामायण की चौपाई सुनाना सिया खूब खुश होकर करती |हरिनारायण जी को जैसे हर इतवार का इंतजार रहता था |

अब हरिनारायण जी लगभग अस्सी के पड़ाव में आ रहे थे और कुछ बीमार भी रहने लग गए थे| अब भी पूरी संपत्ति उनके नाम पर ही थी और अब वो चिंतित थे कि वो अपनी संपत्ति को कैसे बांटे ? जिससे सबके साथ न्याय भी हो और वो सुरक्षित भी रहे |उन्होंने अपने लड़के के नाम से एक अस्पताल बनवाया था ,पत्नी के नाम से वृद्धाश्रम और बहु के नाम से अनाथालय ,और वो चाहते थे कि उनके बाद वो सब सही हाथों में जाए जिससे उनकी व्यवस्था में कोई विघ्न नहीं आए

एक दिन दादा ने तीनों को बुलाकर कहा, “मैं अपनी वसीयत एक वर्ष बाद लिखूँगा। इस एक वर्ष में मैं तुम सबको ध्यान से देखूँगा।  मेरी गद्दी का कौन सही हकदार है ?

तीनों ने इसे अपने-अपने ढंग से समझा।

आरव ने विदेश से महंगे उपहार भेजने शुरू कर दिए।

राघव ने दादा के कमरे में नई सुविधाएँ लगवा दीं।

लेकिन सिया पहले की तरह हर रविवार आती रही। उसने कभी यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि वसीयत में क्या लिखा जाएगा।

समय बीतता गया।

एक बरसात की रात दादा की तबीयत अचानक बिगड़ गई। तेज़ बारिश के कारण सड़कें बंद थीं। फोन करने पर आरव ने कहा, “दादाजी, मेरी कल बहुत जरूरी मीटिंग है। टिकट मिलते ही आ जाऊँगा।”

राघव शहर से बाहर एक बिज़नेस कॉन्फ्रेंस में था। उसने अस्पताल में पैसे जमा करा दिए और कहा, “इलाज में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।”

लेकिन सिया रातभर अस्पताल की बेंच पर बैठी रही। कभी दादा का माथा सहलाती, कभी डॉक्टर से दवा पूछती। तीन रातों तक उसने ठीक से आँख भी नहीं झपकी।

दादा धीरे-धीरे स्वस्थ हो गए।

उस दिन उन्होंने सिया से पूछा, “बेटी, अगर मेरे पास यह दौलत न होती, तब भी क्या तुम ऐसे ही मेरा ध्यान रखती?”

सिया मुस्कुराई, “दादाजी, आपने बचपन में मुझे सिखाया था कि बड़े बरगद की छाया का मूल्य उसकी जड़ों से होता है, फलों से नहीं। आप मेरे लिए दौलत नहीं, मेरी जड़ हैं।”

दादा की आँखें भर आईं। लेकिन भगवान के घर सब निश्चित है इसलिए कुछ महीनों बाद उनका देहांत हो गया।

पूरा परिवार वकील के कार्यालय में इकट्ठा हुआ। सबकी निगाहें वसीयत पर थीं।

वकील ने पढ़ना शुरू किया—”मेरी चल-अचल संपत्ति का बराबर बँटवारा मेरे तीनों पोते-पोती में किया जाए।”

यह सुनकर सबने राहत की साँस ली।

फिर वकील ने दूसरा लिफाफा खोला।उसमें दादा का हाथ से लिखा पत्र था—

“यदि तुम यह सोच रहे हो कि मेरी वसीयत में सिर्फ धन दौलत ही शामिल है  तो तुम गलत हो– धन बाँटा जा सकता है, —लेकिन संस्कार नहीं और जिसने मेरे संस्कारों को अपनाया वो है मेरी पोती सिया , –यह वसीयत मैने ही बनवाई है–  लेकिन इस पर  हस्ताक्षर करने का अधिकार में सिया को देता हूं ,— यह वसीयत तभी मान्य होगी —जब सिया इस पर बिना किसी दवाब के साइन करेगी –और वो नहीं करती है तो पूरी वसीयत उसके नाम पर हो जाएंगी”

इस वसीयत ने दोनों भाइयों के होश उड़ दिए | सब सिया को देखने लगे और समझ गए कि अब उन दोनों को कुछ नहीं मिलेगा, सिया खामोश थी उसने दादाजी का पत्र अपने हाथ में लिया और सीने से लगा कर रोने लगी

“सिया अब नाटक मत करो –तुमने दादाजी का ब्रेन वॉश किया– और अब रोने का नाटक कर रही हो “दोनों भाइयों ने कहा-

सिया ने कोई जवाब नहीं दिया और वकील के हाथ से वसीयत के पेपर ले लिये और उस पर साइन कर दिया ,दोनों भाई  देखते रह गए, क्योंकि यह वो शायद नहीं कर पाते उनके सर झुक गए फिर वकील ने एक चिट्ठी और सिया को दी

जिसमें लिखा था

“बेटा सिया, अगर यह पत्र तुम पढ़ रही हो –तो तुम वसीयत पर साइन कर चुकी हो– इसलिए मेरे संस्कारों की तुम हकदार हो –तुम्हारे ऊपर मेरे नाम को आगे बढ़ाने का दायित्व है –मेरे दोनों पोते मेरे संस्कारों के जाल से मुक्त होते है– अब वो अपना हिस्सा लेकर जा सकते है –मेरा घर जो मेरी सबसे प्यारी पूंजी है वो तुम्हारा है —और मेरे जितने भी अच्छे काम जैसे अनाथालय, वृद्धाश्रम और अस्पताल सब तुम्हारे जिम्मे है “

कई साल बीतने के बाद आरव और राघव को तो लोग भूल गए ,लेकिन सिया का नाम हरिनारायण के साथ जुड़ गया सामजिक सेवा केसाथ सिया के संस्कारों ने उसे अब अनगिनत रिश्ते दे दिए थे और उसका परिवार बहुत बड़ा हो गया

समाप्त

 ऋतु अग्रवाल 

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