रिश्तों की गर्माहट

  कल रात ही राधिका की ननद, काव्या, अपने पति और दो छोटे बच्चों के साथ मायके आई थी। घर में मेहमानों के आने से रौनक तो बहुत थी, लेकिन काम भी दोगुना हो गया था। रात को सबको खाना खिलाते, बच्चों को सुलाते और रसोई समेटते-समेटते राधिका को रात के दो बज गए थे। और अब, सुबह के साढ़े पाँच बजे वह फिर से चूल्हे के सामने खड़ी थी, क्योंकि ससुर जी को सुबह छह बजे उनकी बिना शक्कर वाली कड़क चाय चाहिए होती थी, और बच्चों के उठने से पहले नाश्ते की तैयारी भी करनी थी।

राधिका ने गहरी सांस ली और अपने माथे पर आए पसीने को साड़ी के पल्लू से पोंछा। नींद के मारे उसकी आँखें जल रही थीं, पैर दुख रहे थे, लेकिन चेहरे पर शिकन का एक भी निशान नहीं था। वह फटाफट पोहे के लिए प्याज काट ही रही थी कि अचानक पीछे से किसी ने धीरे से उसके हाथ से चाकू ले लिया।

राधिका ने चौंक कर मुड़कर देखा। पीछे काव्या खड़ी थी, चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान लिए और शॉल को कंधों पर लपेटे हुए।

“काव्या? तुम इतनी सुबह क्यों उठ गई? अभी तो छह भी नहीं बजे हैं। रात को सफर से आई हो, थक गई होगी, जाओ जाकर सो जाओ। मैं बस बाऊजी को चाय देकर आती हूँ, फिर तुम्हारे लिए भी गर्मागरम अदरक वाली चाय लाती हूँ।” राधिका ने हड़बड़ाहट में कहा और वापस चाकू लेने की कोशिश की।

लेकिन काव्या ने चाकू पीछे कर लिया और राधिका के कंधे पर हाथ रखते हुए बेहद नरमी से बोली, “भाभी, बस बहुत हो गया। अब आप चुपचाप जाकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठिए। आज की सुबह की चाय और नाश्ता मैं बनाऊंगी।”

राधिका की आँखें आश्चर्य से बड़ी हो गईं। “अरे पागल हो गई हो क्या? तुम मायके आई हो, मेहमान हो हमारी। और तुम काम करोगी? माँ जी होतीं तो क्या सोचतीं? और बाऊजी देखेंगे तो मुझे ही डांटेंगे कि बेटी से काम करवा रही है बहू। जाओ, मुझे मेरा काम करने दो।” राधिका ने पारंपरिक भारतीय बहू की तरह अपनी झिझक जाहिर की, जिसके मन में हमेशा इस बात का डर रहता है कि समाज या परिवार क्या कहेगा।

काव्या ने एक गहरा साँस लिया और राधिका का हाथ पकड़कर उसे रसोई के स्लैब से थोड़ा दूर खड़ा किया। “भाभी, मेरी बात सुनिए। मैं कोई मेहमान नहीं हूँ, इस घर की बेटी हूँ। और जो बेटी अपने मायके में आकर अपनी ही भाभी के हाथ का आराम छीन ले, वो बेटी कैसी? आपको क्या लगता है, मैं अंधी हूँ? कल रात मैंने देखा था कि आप रात के दो बजे तक रसोई साफ कर रही थीं। और अब सुबह फिर से यहाँ खड़ी हैं। मेरी अपनी ससुराल में भी तो मैं यही सब करती हूँ ना? सुबह से लेकर रात तक कोल्हू के बैल की तरह घर-गृहस्थी में जुटी रहती हूँ। वहाँ मुझे कोई ‘मेहमान’ नहीं समझता। तो यहाँ आकर मैं नवाबों की तरह कैसे बैठ सकती हूँ, यह जानते हुए कि मेरी एक बहन जैसी भाभी थकावट से चूर है?”

राधिका के होंठ कांपे, लेकिन वह कुछ बोल नहीं पाई। काव्या की बातों में इतनी सच्चाई और अपनापन था कि राधिका की आँखों में हल्की सी नमी तैर गई।

“और रही बात ‘लोग क्या कहेंगे’ की,” काव्या ने गैस का बर्नर ऑन करते हुए कहा, “तो लोग तो तब भी कहते हैं जब बहुएं बीमार होने पर एक दिन काम नहीं करतीं। भाभी, ससुराल में औरत की सबसे बड़ी दुश्मन औरत ही होती है, यह सब कहते हैं। लेकिन मैं चाहती हूँ कि इस घर में औरत ही औरत की सबसे बड़ी ताकत बने। आप रोज पूरे परिवार को गरमागरम खाना परोसती हैं, खुद सबसे आखिर में ठंडी रोटियां खाती हैं। क्या एक दिन आपको यह हक नहीं कि कोई और आपको प्यार से गरमागरम नाश्ता बनाकर खिलाए? आज का नाश्ता आपकी यह ननद बनाएगी, और आपको हिलने भी नहीं देगी।”

राधिका बस अवाक खड़ी अपनी ननद को देख रही थी। वह काव्या, जिसे उसने शादी करके विदा किया था, आज कितनी बड़ी और समझदार हो गई थी। राधिका का मन भर आया। वह कुछ कहती, इससे पहले ही रसोई के दरवाजे पर ससुर जी, रामनाथ जी की भारी भरकम आवाज गूंजी।

“बिल्कुल सही कह रही है मेरी बच्ची!”

दोनों चौंक कर पलटीं। दरवाजे पर रामनाथ जी खड़े थे। उनके चेहरे पर एक अजीब सा संतोष और गर्व था।

राधिका हड़बड़ा गई, “बाऊजी, वो… मैंने इसे बहुत मना किया, पर ये…”

रामनाथ जी ने हाथ उठाकर राधिका को चुप कराया और धीमे कदमों से अंदर आते हुए बोले, “बहू, इसमें घबराने की क्या बात है? काव्या जो कर रही है, वही तो असली धर्म है। हमने हमेशा यही तो सुना है कि बेटियां मायके में राज करने आती हैं, लेकिन असल राज तो तब है जब उस घर की दो औरतें एक-दूसरे का दर्द समझें। बहू, तुम जबसे इस घर में आई हो, तुमने इस घर की हर ईंट को अपने पसीने और प्यार से सींचा है। मेरी पत्नी के जाने के बाद, तुमने मुझे कभी महसूस नहीं होने दिया कि इस घर की अन्नपूर्णा चली गई है। लेकिन इंसान हो, मशीन नहीं। आज अगर मेरी बेटी ने अपनी भाभी का दर्द समझ कर उसे आराम देने का फैसला किया है, तो मुझे आज अहसास हो रहा है कि मैंने अपनी बेटी को कितने अच्छे संस्कार दिए हैं।”

रामनाथ जी ने अपनी बेटी काव्या के सिर पर हाथ फेरा और फिर राधिका की तरफ मुड़कर बोले, “जाओ बहू, आज तुम डाइनिंग टेबल पर बैठो। और आज सिर्फ तुम नहीं, आज घर के बाकी लोग भी रसोई का काम देखेंगे। मैं जाकर पोहे के लिए धनिया और हरी मिर्च धो कर लाता हूँ।”

राधिका की आँखों से अब आँसू छलक पड़े थे। ये दुःख के नहीं, बल्कि उस अथाह सम्मान और प्रेम के आँसू थे, जिसके लिए हर लड़की शादी के बाद तरसती है। काव्या ने मुस्कुराते हुए राधिका के आंसू पोंछे और उसे धकेलते हुए रसोई से बाहर ले गई।

इन सब बातों से बेखबर, राधिका का पति और काव्या का बड़ा भाई, समीर, अपने बेडरूम के बाहर बालकनी में खड़ा सब कुछ सुन रहा था। वह सुबह पानी पीने के लिए उठा था और रसोई से आती आवाजों ने उसके कदम वहीं रोक दिए थे।

समीर ने बालकनी की रेलिंग को मजबूती से पकड़ा और उसकी आँखों में भी एक चमक सी आ गई। उसे अचानक अपनी माँ की याद आ गई। बचपन में उसने देखा था कि कैसे उसकी बुआ जब भी घर आती थीं, तो पूरा घर उनके आगे-पीछे घूमता था और उसकी माँ दिन-रात रसोई में खटती रहती थीं। किसी ने कभी उसकी माँ से नहीं पूछा था कि उनके पैर दर्द करते हैं या नहीं। समीर को हमेशा लगता था कि यही दुनिया का दस्तूर है। जब राधिका घर में आई, तो उसने अनजाने में राधिका से भी वही उम्मीदें पाल ली थीं। वह कभी-कभी राधिका के चिड़चिड़ेपन पर नाराज भी हो जाता था, यह सोचे बिना कि उस चिड़चिड़ेपन के पीछे कितनी रातों की अधूरी नींद और कितनी शारीरिक थकान छुपी है।

लेकिन आज, अपनी छोटी बहन काव्या की बातें सुनकर समीर के अंदर का पुरुषवादी अहंकार और अज्ञानता जैसे एक झटके में टूट गई।

“तुम सच में बहुत बड़ी हो गई हो काव्या,” समीर ने मन ही मन बुदबुदाया। “तुमने आज मुझे वो सिखा दिया जो मैं इतने सालों में अपनी पत्नी के साथ रहकर भी नहीं सीख पाया। मैं कितना बड़ा बेवकूफ था जो सोचता था कि घर का सारा काम राधिका की ही ‘ड्यूटी’ है। प्यार से रिश्ते जीते जाते हैं, हक जताकर नहीं। और आज तुमने अपनी भाभी का दिल हमेशा के लिए जीत लिया है।”

समीर मुस्कुराया और उसने भी तय किया कि अब वह भी पुरानी परिपाटियों का मूक दर्शक बनकर नहीं रहेगा। वह सीधे रसोई की तरफ बढ़ा।

रसोई में काव्या पोहा छौंक रही थी और रामनाथ जी चाय के कप निकाल रहे थे। राधिका बाहर कुर्सी पर बैठी भावुक नजरों से यह सब देख रही थी। समीर ने रसोई में घुसते ही कहा, “वाह! आज तो रसोई में बड़ी भारी हलचल है। लगता है आज मुझे भी कोई ड्यूटी मिलनी चाहिए। काव्या, तू पोहा बना, मैं प्लेटें लगाता हूँ। और हाँ, आज अपनी भाभी के लिए वो स्पेशल वाली इलायची की चाय मैं खुद बनाऊंगा।”

राधिका ने हैरानी से समीर की तरफ देखा। जो पति कभी पानी का गिलास खुद उठकर नहीं पीता था, वो आज चाय बनाने की जिद कर रहा था।

काव्या खिलखिला कर हँस पड़ी। “अरे वाह भैया! क्या बात है! भाभी, देखा आपने? आज तो आपके अच्छे दिन आ गए। चलिए, जल्दी से बैठिए, आज आपका ये नवाब पति आपको चाय बनाकर पिलाएगा।”

पूरा घर ठहाकों से गूंज उठा। वो सुबह उस घर के लिए एक नई शुरुआत थी। उस दिन नाश्ते की मेज पर कोई ऊंच-नीच नहीं थी, कोई ‘मेहमान’ और ‘काम करने वाली बहू’ का भेद नहीं था। सब एक समान थे—एक परिवार, जो एक-दूसरे की परवाह करता था। राधिका ने जब समीर के हाथ की बनी चाय का पहला घूंट लिया, तो उसे लगा जैसे वह दुनिया की सबसे स्वादिष्ट चाय थी। उसमें सिर्फ चायपत्ती और चीनी नहीं थी, बल्कि उसमें सम्मान था, एक ननद का प्यार था, एक ससुर का आशीर्वाद था और एक पति का अहसास था।

उस दिन राधिका को समझ आ गया कि परिवार सिर्फ खून के रिश्तों से नहीं बनता, बल्कि एक-दूसरे की थकान बाँटने, एक-दूसरे के आँसू पोंछने और बिना कहे एक-दूसरे की पीड़ा समझ लेने से बनता है। काव्या ने आज सिर्फ रसोई का काम नहीं संभाला था, बल्कि उसने एक नई परंपरा की नींव रखी थी—एक ऐसी परंपरा जहाँ औरत का सम्मान औरत के ही हाथों महफूज था।

और दूर आसमान में सूरज की किरणें उस घर के आँगन में कुछ ज्यादा ही सुनहरी और चमकीली होकर पड़ रही थीं, मानों वे भी इस नए बदलाव को अपना आशीर्वाद दे रही हों।

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