पत्नी का सम्मान

काव्या इकलौती संतान थी। बचपन से ही उसे अपना कमरा, अपनी किताबें, अपने कपड़े और अपनी हर एक चीज़ को बेहद सहेज कर रखने की आदत थी। उसकी डिक्शनरी में ‘शेयरिंग’ यानी चीज़ें साझा करने का कोई खास महत्व नहीं था। उसकी शादी सुमित से हुई, जो एक बहुत बड़े और खुशहाल संयुक्त परिवार का हिस्सा था। सुमित का परिवार बनारस में रहता था, जहाँ घर के दरवाज़े हर वक्त रिश्तेदारों और पड़ोसियों के लिए खुले रहते थे। उस घर में किसी की भी चीज़ कोई भी इस्तेमाल कर लेता था।

शादी के कुछ ही दिनों के भीतर काव्या को इस बात का गहरा झटका लगा। एक दिन जब वह नहाकर निकली, तो उसने देखा कि सुमित की छोटी बहन, शिखा, बिना पूछे काव्या का सबसे महंगा परफ्यूम लगा रही थी। एक दिन काव्या की सास ने उसकी एक नई रेशमी शॉल अपनी एक पुरानी सहेली को ओढ़ा दी, जो ठंड से कांप रही थी। काव्या अंदर ही अंदर घुटने लगी। उसे लगने लगा कि इस घर में किसी को भी ‘प्राइवेसी’ या दूसरे के सामान की कोई कद्र नहीं है।

सुमित ने जब काव्या की ये झुंझलाहट देखी, तो उसने मुस्कुराते हुए समझाया, “काव्या, हमारे घर में लोग चीज़ों से ज़्यादा रिश्तों को अहमियत देते हैं। शिखा ने तुम्हारा परफ्यूम इसलिए लगाया क्योंकि वह तुम्हें अपनी बड़ी बहन मानती है। यहाँ लोग इजाज़त नहीं मांगते, क्योंकि अपनों से कैसी इजाज़त?” लेकिन काव्या के लिए यह सब समझना बहुत मुश्किल था। उसके मन में एक कड़वाहट सी घुलने लगी थी।

शादी के रिवाज़ों के अनुसार, यह तय हुआ था कि नई ज़िंदगी की पूरी तरह शुरुआत करने से पहले काव्या और सुमित पूरे परिवार के साथ अपने पैतृक गाँव जाएंगे, जहाँ उनकी कुलदेवी का प्राचीन मंदिर था। वहाँ पूजा करने के बाद ही नई बहू को घर की पूरी ज़िम्मेदारी सौंपी जाती थी। काव्या इस सफर को लेकर बिल्कुल भी उत्साहित नहीं थी। उसे डर था कि गाँव के उस पुराने घर में जहाँ इतने सारे लोग होंगे, वहाँ उसकी बची-खुची प्राइवेसी भी खत्म हो जाएगी।

और हुआ भी बिल्कुल वैसा ही। पैतृक घर बहुत बड़ा था, लेकिन वहाँ सब लोग एक साथ दालान और बड़े कमरों में गद्दे बिछाकर सोते थे। काव्या का लाया हुआ महँगा शैम्पू और लोशन कज़िन बहनों ने कब खत्म कर दिया, उसे पता ही नहीं चला। काव्या गुस्से से भर उठी। उसने सुमित से साफ कह दिया कि पूजा खत्म होते ही वह अगले दिन शहर वापस लौटना चाहती है।

लेकिन किस्मत को शायद काव्या को एक बहुत बड़ा सबक सिखाना था। कुलदेवी की पूजा से एक रात पहले गाँव में मूसलाधार बारिश होने लगी। मौसम में अचानक बहुत ठंडक आ गई। काव्या, जिसे शहर के फिल्टर पानी और एसी कमरों की आदत थी, गाँव की इस अचानक बदलती आबोहवा को झेल नहीं पाई। आधी रात को काव्या को बहुत तेज़ बुखार आ गया। उसका शरीर ठंड से बुरी तरह कांपने लगा। उसने दो-तीन कंबल ओढ़ लिए, लेकिन उसकी कंपकंपी रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

सुमित घबरा गया और उसने अपनी माँ को आवाज़ दी। रात के दो बज रहे थे। कुछ ही मिनटों में पूरा घर जाग गया।

सुमित की दादी, जो अपनी चीज़ों को लेकर बहुत सख्त थीं और किसी को अपने कमरे के पुराने संदूक को हाथ तक नहीं लगाने देती थीं, उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपना वह संदूक खोला। उसमें से उन्होंने अपनी शादी के समय की एक बेहद कीमती, शुद्ध पश्मीना और रुई से बनी रज़ाई निकाली, जिसे उन्होंने आज तक किसी को इस्तेमाल नहीं करने दिया था। दादी ने वह रज़ाई काव्या को ओढ़ा दी।

शिखा, जिस पर काव्या सबसे ज़्यादा चिढ़ती थी कि वह बिना पूछे उसका सामान ले लेती है, वह पूरी रात एक पल के लिए भी नहीं सोई। वह ठंडे पानी की पट्टियां काव्या के तपते हुए माथे पर रखती रही। काव्या की सास ने रात के उस पहर में रसोई में जाकर चूल्हा जलाया और कई जड़ी-बूटियों को उबालकर काव्या के लिए गरमागरम काढ़ा तैयार किया।

काव्या आधी बेहोशी में यह सब देख रही थी। सुबह जब काव्या ने अपनी आँखें खोलीं, तो उसका बुखार पूरी तरह से उतर चुका था। उसने देखा कि शिखा फर्श पर ही बिस्तर से टेक लगाकर सो रही थी और दादी की वह सबसे अनमोल रज़ाई काव्या के ऊपर थी।

काव्या का गला रुंध गया। उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बहने लगे। उसने मन ही मन सोचा, “मैं कितनी स्वार्थी थी। मैं एक मामूली से परफ्यूम और लोशन के लिए इन लोगों से नफरत कर रही थी। लेकिन इन लोगों ने तो मुझसे बिना पूछे अपनी रातों की नींद, अपना आराम और अपनी सबसे कीमती चीज़ें मुझ पर न्योछावर कर दीं। इस घर में लोग सिर्फ दूसरों की चीज़ें लेते नहीं हैं, बल्कि बिना मांगे अपना सब कुछ दे भी देते हैं।”

काव्या को समझ आ गया था कि जहाँ सच्चा अपनापन होता है, वहाँ ‘मेरा’ और ‘तुम्हारा’ जैसे शब्द बेमानी हो जाते हैं। उस दिन जब कुलदेवी की पूजा का समय आया, तो काव्या ने लाल रंग की खूबसूरत बनारसी साड़ी पहनी। शिखा दौड़कर आई और काव्या को तैयार करने लगी।

तभी काव्या ने अपना जेवर का डिब्बा खोला। उसने अपनी सबसे पसंदीदा और कीमती सोने की चूड़ियाँ निकालीं, जिन्हें वह किसी को छूने तक नहीं देती थी। काव्या ने बहुत प्यार से शिखा के हाथों को पकड़ा और वे चूड़ियाँ उसे पहना दीं।

शिखा हैरान रह गई, “अरे भाभी! ये तो आपकी सबसे पसंदीदा चूड़ियाँ हैं। मैं इन्हें कैसे पहन सकती हूँ?”

काव्या ने नम आँखों से मुस्कुराते हुए शिखा को गले लगा लिया और कहा, “इस घर में ‘मेरा’ कुछ नहीं है शिखा, जो मेरा है, वो तुम्हारा भी तो है। अपनों से पूछकर थोड़ी न कुछ पहना जाता है।”

सुमित दरवाज़े पर खड़ा यह सब देख रहा था। उसकी आँखों में अपनी पत्नी के लिए एक गहरा सम्मान और प्यार छलक आया था। उस दिन कुलदेवी की पूजा सिर्फ एक रस्म नहीं थी, बल्कि काव्या के दिल में इस परिवार के लिए एक सच्चे और अटूट रिश्ते की शुरुआत थी।

क्या आपको भी लगता है कि संयुक्त परिवार में चीज़ें भले ही बँट जाती हैं, लेकिन प्यार और अपनापन हमेशा सौ गुना बढ़ जाता है? अपने विचार हमें ज़रूर बताएं।

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