“भाई मैं तेरी तरह स्वार्थी नहीं हूं” – सुनीता मलिक सोलंकी 

बागपत  की एक तंग सी गली में दो भाई रहते थे — बड़ा भाई मुकेश और छोटा अनिल । उम्र में पाँच साल का फासला, पर सोच में ज़मीन-आसमान का। उनके पिता जी की परचून की दुकान थी । पिता के बाद  मुकेश ने दुकान संभाल ली। अनिल पढ़ने में तेज़ था, सो पढ़ाई कर  इंजीनियर बन गया। छोटा था भाई और पिता का प्रेम भी था उस पर।

पिता की मौत के बाद बँटवारा हुआ। मुकेश बोला — “दुकान मेरे नाम कर दे, मैं यहीं रहूँगा, क्यूं मेरी रोजी रोटी तो इस दुकान से ही निकलती है भाई ।और  मकान तू ले ले” अनिल  मान गया।

मकान की कीमत दुकान से दोगुनी थी, पर मुकेश ने कहा — “भाई है तू, हिसाब क्या करना।” अनिल  की आँखें भर आईं, जब तक मेरा घर नहीं बनता , मैं माँ और अपने परिवार के साथ इस मकान में रहता रहूँगा। माँ को भी यहीं अचछा लगता है।

दस साल बीत गए आज अनिल पुणे में सेटल। बीवी, दो बच्चे फ्लैट, गाड़ी सब।  मुकेश वहीं बागपत में। दुकान से दो वक्त की रोटी, माँ की दवाई, बेटी की पढ़ाई। माँ लकवा मारने के  बाद’ से खाट पर थीं। मुकेश की पत्नी मनोरमा दिन-रात सेवा करती। 

फिर एक दिन फोन आया। अनिल  की आवाज़ में घबराहट — “भैया, माँ कैसी है? डॉक्टर ने कहा है, पुणे ले आओ, यहाँ अच्छा इलाज होगा।”

मुकेश चौंका — “पर बेटा, माँ तो हिल भी नहीं सकती। इतनी दूर कैसे…?”

“एम्बुलेंस से भिजवा दो। खर्चा मैं दूँगा। यहाँ माँ को सुकून मिलेगा।”

मुकेश ने मनोरमा से पूछा। वो बोली — “भेज दो। देवर जी ठीक कह रहे हैं। बड़ी जगह, बड़े डॉक्टर।”

माँ को एम्बुलेंस में लिटाया गया। जाते वक्त माँ की आँखों में पानी था। मुकेश का कुर्ता पकड़ लिया — “मुझे नहीं जाना।” 

मुकेश ने हाथ छुड़ा लिया — “माँ, तेरे भले के लिए। अनिल इंतज़ाम कर देगा।”

छह महीने बीत गए। पहले हर हफ्ते फोन आता — “माँ ठीक है।” फिर पंद्रह दिन में। फिर महीने में। मुकेश जब भी पूछता — “माँ से बात करा दे” — जवाब मिलता — “सो रही है, दवाई ली है, कल कराऊँगा।”

एक दिन अनिल का फोन आया। आवाज़ एक दम  साफ  सपाट — “भैया, मकान बेचना है। माँ के नाम है, कागज़ भेज दो, साइन करवा लूँ। यहाँ फ्लैट बड़ा लेना है, माँ के लिए नर्स रखनी है, खर्चा बहुत है।”

मुकेश सन्न। “पर मकान तो… माँ की निशानी है …” अभी कुछ फाल पहले तो  माँ को इसके कागज मिले बैंक से ।।

“भैया इमोशनल मत बनो। ईंट-पत्थर हैं यह ।

भैया  माँ की सेवा ‘जायज़’ है या यह ईंट-पत्थर?”

मुकेश ने फोन रख दिया। रात भर सो नहीं पाया। मनोरमा बोली — “दे दो साइन। आखिर माँ की सेवा ही तो कर रहा है।”

“सेवा?” मुकेश हँसा, कड़वी हँसी। “छह महीने में एक बार माँ की आवाज़ नहीं सुनवाई उसने। माँ खाट पर है,और  वो फ्लैट बड़ा कर रहा है।”

अगली सुबह मुकेश बिना बताए पुणे पहुँच गया। अनिल का पता पूछते-पूछते जब फ्लैट पर पहुँचा, तो दरवाज़ा माँ के लिए रक्खी गई  अटेंडेंट ने खोला। “साहब ऑफिस हैं, और मैडम किटी पार्टी में हैं सर! ।” 

मुकेश भीतर गया। माँ एक कमरे में अकेली । खिड़की बंद, AC चल रहा। बिस्तर पर लेटीं, आँखें छत पर। मुकेश  पास गया — “माँ!” 

माँ ने गरदन घुमाई। पहचानने में दो पल लगे। फिर होंठ हिले। बोल नहीं पाईं, बस आँख से ढलक गया पानी। 

तभी अनिल  आ गया। भाई को देखकर सकपकाया — ” भाई आप … आप यहाँ? बताया नहीं?”

“बताता तो क्या माँ से मिलने देता?” मुकेश की आवाज़ काँप रही थी। “कागज़ लाया हूँ। साइन चाहिए ना तुझे?” 

उसने बैग से स्टाम्प पेपर निकाला। अनिल  के हाथ में दिया। “ले, साइन कर दे।”

अनिल चौंका — “मैं क्यों साइन करूँ? मकान माँ के नाम है।”

“हाँ। पर मैं माँ को ले जा रहा हूँ। वापस बागपत  ।

  तू साइन कर दे कि तुझे माँ नहीं चाहिए। तुझे सिर्फ उसका मकान चाहिए। लिख दे — ‘मैं माँ की जिम्मेदारी से मुक्त होता हूँ, मकान के बदले’।”

अनिल तिलमिला गया — “ये क्या बकवास है भैया? आपकी नजर में, मैं स्वार्थी हूँ? मैं ही तो इलाज करा रहा हूँ!”

मुकेश ने माँ का सूखा हाथ अपने हाथ में लिया। “इलाज? माँ को AC नहीं, ‘आँगन’ चाहिए था। नर्स नहीं, ‘अपनों ‘ का हाथ चाहिए था। तूने माँ को रखा, पर ‘सहेजा’ नहीं। फ्लैट बड़ा कर रहा है माँ के नाम पर, पर माँ की साँस छोटी हो रही है।”

कमरे में सन्नाटा। नर्स सिर झुकाए खड़ी। अनिल की पत्नी दरवाज़े पर आकर ठिठक गई।

मुकेश ने अनिल की आँखों में आँख डालकर कहा — शब्द साफ, धार जैसे थे — “भाई, मैं तेरी तरह स्वार्थी नहीं हूँ।। मुझे माँ चाहिए, उसका मकान नहीं। तू कागज़ रख ले, फ्लैट खरीद ले। पर याद रख — माँ के साइन से मकान बिक जाएगा, पर बेटे के साइन से ‘जन्नत’ नहीं मिलती।”

उसने माँ को पलंग से उठाया। हल्की फुलकी हो गई थीं, जैसे रुई, माँ अब अधिक दिन की नहीं है अनिल! 

 अनिल  कुछ नहीं बोला। बस देखता रहा। 

स्टेशन पर गाड़ी का इंतज़ार करते हुए माँ ने पहली बार उँगली उठाई। मुकेश झुका। माँ के होंठ हिले — बहुत धीरे से निकला — “घर… तुलसी…”

मुकेश रो पड़ा। “हाँ माँ, घर चल रहे हैं। तेरी तुलसी वहीं है। सूखी नहीं, हरी। रोज़ पानी देती है मनोरमा ।”

उसके बाद मुकेश माँ को बागपत ले आया। मनोरमा ने देहरी पर आरती उतारी सास की । माँ ने आँगन की मिट्टी को छुआ और आँख मूँद लीं। डॉक्टर बोला — “अब कुछ घंटे की मेहमान हैं ।”

माँ ने मुकेश का हाथ पकड़ा। कुछ कहना चाहती थीं। मुकेश कान पास ले गया। माँ फुसफुसाईं — “स्वार्थी… वो नहीं… तू… अच्छा…”

मुकेश समझ गया। माँ उसे ‘स्वार्थी’ कह रही थी — क्योंकि उसने माँ को ‘माँगा’, दुनिया से लड़कर।

अनिल माँ के क्रियाकर्म पर आया। मकान के कागज़ मुकेश को पकड़ा गया — “भैया, रख लो। माँ तो चली गई। अब ईंट-पत्थर किस काम के।”

मुकेश ने कागज़ माँ के बिस्तर के नीचे रख दिए। “माँ की निशानी यहीं रहेगी। जहाँ उसकी साँस आखिरी बार आई थी।”

हर कहानी कुछ सीख देती है –

स्वार्थ वो नहीं जो ‘माँगे’। स्वार्थ वो है जो ‘देने’ के नाम पर ‘छीन’ ले।  

कुछ लोग रिश्तों को ‘ATM’ समझते हैं — जरूरत पर कोड डालो, पैसा निकालो।  पर माँ-बाप ‘ATM’ नहीं, ‘खाता’ होते हैं — जिसमें सिर्फ ‘जमा’ करना होता है,और जिसका  ब्याज ईश्वर देता है।

@सुनीता मलिक सोलंकी  मुजफ्फरनगर उप्र

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