“बेबी,कल हमें मम्मी के घर जाना है।दो दिन रुकने को बोल रही थी मम्मी।तुमने फोन उठाया ही नहीं।कब से तुम्हें फोन कर रहीं थीं वो।” सौरभ ने मधु को बड़े प्यार से चाय का कप पकड़ाते हुए कहा।
वैसे तो सुरभि(सौरभ की मां)जी और उनके पति(सुधीर) की सहमति से ही सौरभ और मधु की शादी संपन्न हुई थी, पर जैसी बहू की परिकल्पना उन दोनों ने की थी, वैसी लगी नहीं मधु उन्हें।
अंतिम निर्णय सुना दिया था बेटे ने कि शादी यदि करनी है,तो मधु से ही करेगा।सुधीर जी ने हथियार डालते हुए कहा था सुरभि जी से”अब ना -नुकुर करने से कोई फायदा नहीं, अपना बेटा मधु से ही शादी करेगा।हमें बस अपने निर्णय को सहमति देने के लिए बुलाया है।तुम कुछ भी बोलोगी, तो उसे खराब ही लगेगा।
एक ही शहर में रहकर मिलते रहें हैं दोनों।जब बेटे को पसंद है, तो कर देते हैं शादी।हमें कौन सा उनके साथ रहना है? उनकी घर गृहस्थी बसाकर हम अपने घर (भिलाई)चले चलेंगे।तीज त्यौहार में जैसे आता था सौरभ, वैसे ही बहू को भी लेकर आ जाया करेगा।”
सुरभि जी को आज यह बात पूरी तरीके से सच लगी कि आदमी अपनी औलाद से ही हार जाता है।मधु को नापसंद करने का सिर्फ एक ही कारण था उनके पास कि,वह अभी भी बचपने में जी रही थी।
रात-रात भर वीडियो कॉल पर बेटे को उससे बतियाते सुनकर समझ चुकी थीं वो,कि एक नकचढ़ी लड़की है मधु।हर बात में सफाई मांगना उसकी आदत है।सौरभ खुद ही लट्टू बन चुका था।शादी से पहले ही इतना मिलना , परिवार की जड़ कमजोर करता है।
शादी की तारीख़ पक्की कर जल्दी ही शादी भी करवा दी सौरभ की।शादी का पूरा इंतजाम, मधु की पसंद के अनुसार ही किया था सौरभ ने।परंपरा और रीति-रिवाज जरुरत के हिसाब से ही बस माने गए थे। जब-जब मधु से मिलीं सुरभि जी,उसके व्यवहार में संजीदगी दिखी ही नहीं।
हर समय अपनी मां को आवाज़ देती रहती वह।देखकर इतना समझ तो गईं थीं सुरभि जी,कि घर के कामों में तनिक भी रुचि नहीं है उसकी।हर दिन बाहर से खाना आर्डर करना उसका शौक था। दाल-रोटी,चांवल से परहेज़ था उसे।आए दिन सौरभ के साथ क्लब या पब में जाने के लिए उतावली रहती थी
मधु।पति से कहा भी एक दिन उन्होंने सगाई के बाद” ये कैसा प्यार है आजकल की जैनरेशन का,हमेशा लव यू बोलकर जताना पड़ता है।बड़ों का आदर, लिहाज़ कुछ भी नहीं दिखता इस अंधे प्यार को।अभी तो नए-नए शादी शुदा जोड़े हैं तो अच्छा लगता होगा,
पर बाद में सौरभ को इसकी बहुत बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ेगी।मैं यह नहीं कहती कि सिर्फ मधु को अपना व्यवहार बदलना चाहिए,बल्कि सौरभ को भी मधु की हां में हां मिलाना बंद करना चाहिए।बाहर की रंगीन दुनिया की चकाचौंध,इनकी दुनिया के सारे पक्के रंग ना छीन ले।प्यार को प्रमाणित करने के चक्कर में पैसा धोखा दे देगा।जब पैसा नहीं रहेगा जेब में ,तब कोई देवी नहीं बन जाएगी बेबी।”
सुधीर जी ने पत्नी की बातें सुनकर हंसते हुए कहा”तुम आजकल इतने अच्छे मुहावरे और चुटकुले उपयोग करने लगी हो, तुम्हारा व्याकरण जरूर अच्छा हो जाएगा।और कुछ हो ना हो।”
” अकारण ही मेरे व्याकरण के पीछे ना पड़ो तुम।तुम्हारे साथ पैंतीस सालों से हूं।नौकरी भी की है,घर भी चलाया है।तुम्हें याद है क्या,कभी मैंने नखरे दिखाए हों तुम्हें। सास-ससुर,देवर सभी की समान रूप से देखभाल की है।सबकी पसंद का अलग-अलग खाना बनाकर खिलाया है,
बदले में क्या कभी मांगा है कुछ तुमसे?हम औरतें शादी नहीं करतीं,एक समझौता करती हैं,सभी को खुश रखने का।मैंने तो अपनी जिम्मेदारी सफलता पूर्वक निभाई है,अब बारी मधु की है।उसे भी तो जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए।मैं सास हूं,मैं अगर नहीं समझाऊंगी,तो कौन समझाएगा?तुम?”सुरभि जी ने जब पति से कहा, तो वे निरुत्तर हो गए।
सौरभ को मधु के साथ ससुराल जाना था दो -तीन दिनों के लिए,नियम के अनुसार।उतावला मायके जाने का मधु में होना था,पर यहां तो सौरभ व्याकुल हुए जा रहा था जाने के लिए अपनी पत्नी के मायके।
सुरभि जी ने अपने कमरे की अलमारी से कुछ कपड़ों के पैकेट निकालकर मधु को देने के लिए उनके कमरे में पहुंच ही रही थीं कि ठिठक कर रुकना ही पड़ा बाहर।मधु और सौरभ की बातें छिपकर सुनना पाप है ,मां हैं वह।सुन ही लिया आधा तो अब बाहर से पूरा ही सुन लूं।ऐसा सुरभि जी ने सोचा।
” बेबी देखना,अभी तुम्हारी मां नाटक शुरू कर देंगी बीमार होने का।वो बिल्कुल भी नही चाहतीं कि तुम मेरे मायके में जाकर रुको।मेरी मां तुम्हारी कितनी आवभगत करती है जाने से,इन्हें यह हजम नहीं होता।देखो ,कहीं यह ना कह दें कि बहू जाए अपने मायके,तू क्या करेगा जाकर?
ससुराल है तुम्हारे लिए,पर तुम खुद ही बताओ,कभी तुम्हें वहां परायापन लगा?अरे अब तो वो घर मुझे अपना कम ,तुम्हारा मायका ज्यादा लगता है।मेरी मां तुम्हें अपनी औलाद की तरह ही प्यार करती हैं।जब भी रुकने की बात करती हूं,तुरंत कहती हैं”जा अपने ससुराल,अभी।फिर बाद में आकर रहना।बोलोबेबी मैं सही कह रही हूं ना?
नई नवेली बहु की बोली मीठी थी,सच है,पर अपने मायके का कवच पहनकर ,पति से मनमानी और बचकानी जिद पूरी करतीथी।अब तो सुरभि को पता लग चुका था, कि बहू ससुराल से , पति से कभी जुड़ नहीं पाएगी।और जो लड़कियां शादी के बाद सिर्फ अपने माता-पिता को ही सर्वस्व समझती हैं, एक दिन यही लड़कियां कभी ससुराल को अपना नहीं समझ पातीं।
सुरभि जी ने मन में ठान लिया कि ,अब ,एक नई नीति अपनाना पड़ेगा उन्हें मधु के साथ-साथ,सौरभ को भी रिश्तों की अहमियत समझाने की जिम्मेदारी सुरभि की ही है।गलतियां देखते रहने से ज्यादा अच्छा है, मां का अपने बच्चों की गलतियां सुधारना।
नहा -धोकर ,सुंदर सी साड़ी पहनकर आई मधु बाल बंधवाने(लंबे बाल थे उसके), वास्तव में बहुत सुंदर बाल थे मधु के।सुरभि जी ने एक ढीला सा जूड़ा बना दिया,और पहले से मंगाकर रखा मोगरे का गजरा भी लगा दिया।साथ ले जाने की सारी सामग्री उन्होंने खुद ही अकेले सजाई।
मधु के पैरों में आलता लगाने लगी,तो मधु ने पैर पीछे कर लिए।तब सुरभि जी ने समझाया”जब बहू ससुराल से मायके जाती है,तो सास सजा कर विदा करती है,ताकि इस आलता का रंग फीका पड़ने से पहले बहू वापस ससुराल आ जाए।”बचपना तो था मधु में, झट से बेतुकी बात पूछ बैठी अपनी सास से”तो , सौरभ को क्या निशानी दोगी,
जिससे उसे ससुराल से कब आना है पता चले?” सुरभि जी ने इस प्रश्न का जवाब बड़ी ही सुंदरता से दिया, “बहू, सौरभ का ससुराल है तुम्हारा मायका।जैसे उसका मायका तुम्हारी ससुराल।एक दामाद को स्वयं ही वह गरिमा और अनुशासन बनाकर रखना चाहिए, कि कब , कहां, कितनी देर तक रुकना है?
पता नहीं मधु को कितना समझ आया,थोड़ा गंभीर अवश्य हुई।दोनों उसी शहर में मधु के घर गए।मधु की मां बहुत ही शांत महिला थी।बातें बहुत कम करतीं थीं।सुरभि जी ने सोचा,यह जमाई षष्ठी का व्रत संपन्न हो जाए,फिर समय देखकर उनसे बात करेगी।जैसा कि तय था,तीन दिन बाद दोनों आ गएं अपने घर। नहीं-नहीं,एक मायके और एक ससुराल।
मधु की दिनचर्या में तनिक भी बदलाव नहीं आ रहा था शादी के बाद भी।अधिकतर काम सौरभ ही निपटाता था,सो बेबी खुश रहती थी।दूसरा बेबी अपनी बेबी के लिए हमेशा तैयार रहता ,कभी किसी चीज के लिए “ना” नहीं करता था।आधे से ज्यादा अंगों पर टैटू बने रखें थे।
अब केवल एक महीना ही शेष था सुरभि जी और सुधीर को पुणे में रहने में।फिर दोनों वापस चलें जाएंगे अपने घर(भिलाई)।मधु की मां से मिलकर अकेले में उन्हें कुछ समझाना था।सो शॉपिंग करने के बहाने सुरभि जी और मधु की मम्मी एक कैफे में आए कॉफी पीने।
मधु की मां की सौम्यता बहुत पसंद आई सुरभि जी को।कॉफी पीते-पीते अपने मन के सारे संशय खोलकर रख दिए उन्होंने समधन के सामने। उन्होंने समधन का हांथ पकड़ कर कहा”दोनों बच्चे अपने हैं।नई -नई शादी में जोश ज्यादा होता है,जो होश को दबा देता है।हम जिस चीज के लिए बच्चों को मना करते हैं,वो वहीं चीज जिद में आकर करते ही हैं।बहन जी,एक ही शहर में रहने से आप लोगों का सौरभ के घर जाना,और सौरभ का आपके घर आना ज्यादा होगा ही।मैं एक बात ही बोलूंगी आपसे”,बेटियों को पढ़ाई के साथ-साथ,संबंधों के बारे में भी विस्तार से समझाना चाहिए।हम शायद ठीक से समझा नहीं पाए।”
” क्यों,क्या हुआ दीदी?मधु ने आपका अपमान किया क्या?बड़ी मुंहफट है वह बचपन से।आप निश्चिंत रहिए,अच्छे से समझा दूंगी मैं उसे।”मधु की मां ने सफाई दी।
दोनों अपने -अपने घर गए।मधु की मां को अपनी बेटी का बचकानापन पता था।कब क्या बोल देगी किसी को,कुछ पता नहीं।जरूर समधन जी को कुछ कहा होगा,तभी वो ऐसे बोल रही थीं।अभी ससुराल वापस गए,एक हफ्ता ही बीता था, और मधु को फिर मायके आना था।मां से फोन पर कहा उसने आने की बात।मधु की मां को समधन की सलाह याद आ गई।बहाना बनाते हुए कहा उन्होंने “कल तो पापा को हॉस्पिटल लेकर जाना है, टेस्ट करवाने हैं।अगले दिन फिर रिपोर्ट दिखाने जाना होगा।दो दिन तो तेरे ऐसे ही बर्बाद हो जाएंगे।इससे अच्छा तू, अगले हफ्ते आ जा एक दिन।” फोन काटते ही सौरभ ने फोन लगाया”मम्मी, हम लोग आ रहें हैं।पापा को दिखाने हम भी साथ चलेंगे ना।मधु का मन घबरा रहा है।सामने से देखेगी पापा को, तो राहत मिलेगी उसे।हम आ रहें हैं।”
अब मधु की मां ,समधन की सलाह अपनाना चाहती थी।आधे घंटे के अंदर दोनों आ गए।मधु की मां को उतनी खुशी नहीं हुई इस बार
रात में खाना खाकर सोने की तैयारी हो ही रही थी,कि सौरभ की मां का फोन आया”बेटा सौरभ,जल्दी से आ जा।तेरे पापा को स्ट्रोक हुआ है।पास के हास्पिटल ले जाना पड़ेगा।”
सौरभ अपने माता पिता का इकलौता बेटा था।अब उसे अपने माता-पिता के स्वास्थ्य को लेकर चिंता होने लगी ।बहुत दिन हो गए कम्पलीट ब्लड टेस्ट करवा नहीं पाया था।सौरभ जाने के लिए तैयार होने लगा ,तो मधु ने कहा”,मैं चलूं क्या,?वैसे उससे फायदा तो कुछ होगा नहीं।मुझसे अस्पताल में मरीज़ की सेवा तो होगी नहीं।तुम जाओ,शाम को सीधा यहीं आ जाना।”,
अब सौरभ भी मधु के रवैये से चिढ़ने लगा था।कुछ कहा नहीं उसने ,और जाने लगा।
मधु की मां दरवाजे पर “दूर्गा -दूरगा बोलने के लिए खड़ी हुई जाते हुए दामाद से बस इतना ही कहा उन्होंने” देखो सौरभ,तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे प्रथम पूज्य हैं।उन्हें तकलीफ देकर ,जीवन में सुखी नहीं रहा जा सकता।लड़की(बहू) को जब पूछा जाता है कि”तुम्हारा मायका ससुराल से बड़ा है क्या? तो बहू भले हां ना बोले मुंह से, पर उसके लिए यही सच होता है।
तो यह सच एक दामाद के लिए भी होना चाहिये ना। तुम्हारे माता-पिता,तुम्हारा घर यानि कि तुम्हारा मायका ससुराल से सदा बढ़ा होना चाहिए।तुम यदि यह सम्मान अपने माता-पिता को नहीं दोगे,तो मेरी बेटी भी उन्हें यह सम्मान कभी नहीं दे पाएगी।अब शादी के बाद तुम दोनों को मिलकर यह तय करना है कि कहां किसकी ज्यादा जरूरत है?तुम समझ गए ना सौरभ।मधु से कुछ कहूंगी,तो हमेशा की तरह मुंह फुला लेगी।अपने पापा के पास उसे भी लेकर जाना होगा तुम्हें,एक पति के अधिकार से।”
शुभ्रा बैनर्जी
#तुम्हारा मायका तुम्हारे ससुराल से बढ़कर है क्या