*घर ईंटों से नहीं, दिलों से बनता है* – तोषिका

“*घर ईंटों से नहीं, दिलों से बनता है* समझा तू। जो तू मुझे पैसों का बोल रहा है ना, मैं सब जानती हू। मुझे ना तेरी सलाह की कोई जरूरत नहीं है।” मिहिर का सामान बाहर फेंकते हुए उसकी मां रानी बोली और अपने घर का दरवाज़ा बंद कर दिया।

बस उस बंद कमरे की दीवारों को ही पता था कि एक मां ने कितनी आस और कितने आंसू बहाए थे, अपने बेटे की एक झलक देखने के लिए।

*कुछ साल पहले*

“मां मुझे बाहर विदेश में पढ़ना है”, मिहिर ने जिद्द करते हुए बोला।

रानी थोड़ा हिचकिचाई क्योंकि मिहिर के पिता जी के जाने के बाद सब कुछ उसी ने संभाला था, मिहिर की पढ़ाई से लेकर घर और बाहर के सारे काम तक और अपने एकलौटे बेटे को विदेश भेजना उसके लिए आसान नहीं था लेकिन फिर भी उसने अपने बेटे को खुशी के लिए उसने बोला “बेटा, मैं कैसे भी करके पैसों का इंतजाम करती हू, तू बस अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे।”

मिहिर ने अपनी मां को गले लगाते हुए बोला “धन्यवाद मां, देखना मैं एक दिन इतना बड़ा आदमी बनूंगा कि तुम्हे भी अपने साथ विदेश ले जाऊंगा”।

रानी ने उधर दिन रात एक कर दिया और उसने कैसे भी करके पैसों का बंदोबस कर दिया था।

मिहिर भी अपने आगे की पढ़ाई करने के लिए विदेश चला गया था।

विदेश जाने के बाद पहले मिहिर और रानी की रोज़ बात होती थी, फिर वो बात कुछ घंटों से मिनटो में बदली और फिर दिन में एक और कुछ समय बाद वो हफ्ते में एक बार बात होती थी।

जब उसकी मां पूछती थी तो मिहिर बस यही कहता था कि “मां मैं पढ़ाई करने में व्यस्त हू, बात करने का समय नहीं मिलता।” रानी को अपने बेटे पर पूरा विश्वास था इसीलिए वो भी ये मान जाती थी।

लेकिन असल में बात कुछ और ही थी। विदेश जाकर मिहिर ने गलत संगति में रहना शुरू कर दिया था और फिर धीरे धीरे वो पैसे उड़ाने लग गया था और अपनी क्लास भी नहीं लेता था। जिसके चलते वो कक्षा में फेल होता रहा और उसके ऊपर कर्ज़ा बढ़ता रहा। उसने सोचा कि वो अपना घर भी बेज देगा, उस से अपने पैसे चुका देगा।

कुछ समय बाद मिहिर घर आया और पहले तो उसकी मां उसको देख कर बहुत खुश क्योंकि इतने समय के बाद वो अपने बेटे का चेहरा देख रही थी।

एक हफ्ता होगया था उसको घर रहते हुए, उधर रानी भी खुश थी लेकिन उसकी खुशी कुछ पल ही टिकी।

रानी कमरे की साफ सफाई करने के लिए मिहिर के कमरे में गई, और वो चद्दर साफ कर रही थी कि उसका फोन बजा, रानी ने मिहिर को बुलाया पर उसने जवाब ही नहीं दिया, तो उसने खुद ही फोन उठा लिए बताने के लिए कि मिहिर अभी नहा रहा है पर इससे पहले वो कुछ बोले उधर से एक भारी आवाज़ आई “घर बेज दिया?, पैसों का इंतजाम जल्दी कर वरना हम सड़क पर आ जाएंगे।”

रानी ने जैसे ही ये सुना उसके पैरों तले जमीन खिसक सी गई, दिल थम सा गया और आंखे भर सी आई जैसे कही बरसात के साथ बिजली गिर गई हो।

जब मिहिर नहा कर आया तो रानी ने उस से पूछा, घर के बारे में तो मिहिर एक दम से भड़क गया और चिल्लाते हुए बोला “मेरा फोन क्यों उठाया आपने?” उधर रानी चिल्ला कर बोली “मैने जो पूछा है, उसका जवाब दे।” मिहिर बोला “हां मैं घर बेजने ही आया था क्योंकि मेरे पास पैसा खत्म होगया है और मुझे अपना कर्जा उतरना है।” रानी अपनी आंखों में आंसू लिए और अपने माथे को पकड़ते हुए बोली “तुझे इतने सारे पैसे दिये थे, सारे उड़ा दिए? तुझे वहाँ पढ़ने भेजा था, आवारागर्दी करने नहीं।”

मिहिर गुस्से में बोला “मेरा थोड़ा खर्च करने का मन कर गया तो क्या हो गया, सब करते है, तुम बस मुझे बताओ कि तुम मेरी मदद करोगी कि नहीं?”

रानी के आंसू बह गये और वो रुकने का नाम नहीं ले रहे थे पर फिर भी वो बोली “ये मेरी अब तक की सारी कमाई और मेरे गहने सब ले जा लेकिन मैं ये घर तुझे नहीं बेज ने नहीं दूंगी।”

मिहिर ने बोला “घर ईंटों का ही बना है, इसमें क्या है। कोई नया घर ढूंढ लेना।”

रानी से अब सहन नहीं हुआ और वो बोली “घर ईंटों से नहीं, दिलों से बनता है समझा तू। जो तू मुझे पैसों का बोल रहा है ना, मैं सब जानती हू। मुझे ना तेरी सलाह की कोई जरूरत नहीं है। इस घर में तेरे पापा की यादें है और उनकी महक है, इस घर में उनकी जान बस्ती थी और अपने जीते जी मैं ऐसा नहीं होने दूंगी”।

रानी ने उसका सारा सामान बाहर फेंक दिया और रोने लगी और सोचने लगी कि उसके प्यार में कौन सी कमी रह गई थी कि उसको आज ये दिन देखने को मिला।

लेखिका

तोषिका

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