बेटी की शादी के कार्ड छप चुके थे और वही कुर्सियों पर बैठा महेश कैलकुलेटर पर जोड़ घटाना कर रहा था। सामने मेज पर रखे पेपर पंखे की हवा से फड़फड़ा कर महेश की दिमाग को और उलझा रहे थे। तभी वंदना ने चाय का कप रखते हुए महेश से कहा देखो महेश भूमिका की शादी अच्छे से होनी चाहिए। चाहे तो बैंक से लोन ले लो और नहीं तो गांव वाला घर बेच दो ,क्योंकि हमें भी अपने स्टेटस का ख्याल रखना पड़ेगा। तुम भी अच्छी पोस्ट पर हो बड़े-बड़े लोग आएंगे । साधारण सी शादी समारोह देखकर लोग बातें बनाएगें।आखिर हम जहां रहते हैं वहां की सोसाइटी का भी ध्यान रखना पड़ेगा ना। बंदना बोले जा रही थी लेकिन महेश कोई जवाब नहीं दे रहा था । महेश कुछ बोलते क्यों नहीं क्या चल रहा है तुम्हारे दिमाग में।
तभी फोन की घंटी बजी और स्क्रीन पर दिनेश का नाम दिखा। हां छोटे बोल भैया मां की थोड़ी तबीयत खराब हो गई थी पर चिंता की कोई बात नहीं है डॉक्टर को दिखा दिया है, कह रहे थे उम्र संबंधी परेशानियां है। अब ठीक है मां। और भैया भूमि बिटिया की शादी की तैयारी कैसी चल रही है। भूमिका की शादी हो रही है लेकिन दुखी इसलिए भी हो रहा हूं कि मैं आपकी कुछ मदद नहीं कर पा रहा हूं। अरे नहीं तू परेशान ना हो मैं सब देख लूंगा । और मां को जल्दी ठीक कर तुझे मां को लेकर शादी में आना है। और बता पैसे तो नहीं चाहिए नहीं भैया अभी तो आपके ऊपर इतने खर्चे हैं। हां है तो खर्चे तो क्या मां का इलाज तो जरूरी है ना ।
और अपने कुछ नए कपड़े बनवा लेना और मां के लिए भी दो साड़ी ले आना, मैं गाड़ी भेज दूंगा इस से आ जाना । और हां पैसे के लिए, वो बात नहीं भैया अपना जो खेत बधाई पर दिया था ना उस पर गेहूं की पैदावार हुई थी उसके थोड़े पैसे आए हैं। गेहूं तो ठीक हुआ था पैसे भी ठीक आए थे लेकिन बधाई पर होने के कारण आधे पैसे बटाई वाला रख लेता है । आप जो कुछ भेज देते हो सब मिलाकर चल जाता है खर्चा। भैया एक बात बोलूं हां बोल मैं भी कुछ मदद करना चाहता हूं भूमि की शादी में। हां हां क्यों नहीं आ जाना मां को लेकर यहां काम धंधे देखना है । काम धंधे तो देखूंगा ही लेकिन मैं पैसे से कुछ मदद करना चाहता हूं।
पैसे पैसे कहां से आए तेरे पास और इस बार बटाई के खेतों के पैसे आए हैं ना मां ने कहा है उसे पैसे को बिटिया की शादी लिए रख लो । अभी हम लोगों को भी तो कुछ मदद करनी चाहिए तो वही है पैसे । और घर खर्च कैसे चलेगा वह माँ मना कर रही थी जो तुमने पहले पैसे भेजे थे उसमें से थोड़े बचे हैं उसी से किसी तरह खर्च चला लेंगे । सुनकर महेश की आंखों में आंसू आ गए । जो भाई कुछ करता नहीं है गांव की थोड़ी सी जमीन है उसी का पैसा आ जाता है। और थोड़ा सा मै भेज देता हूं खर्चा मुश्किल से चलता है वह भी मदद करने को तैयार है । अच्छा-अच्छा देख लूंगा मैं पहले तुम मां की तबीयत ठीक करो शादी में मान को लेकर आना है और फोन कट हो गया
फोन पर बात करके महेश गांव की दुनिया में खो गया। वंदना ने फिर आवाज लगाई अरे कहां खो गए वह मै में क्या कह रही थी गांव वाला घर ,चुप रहो गांव वाला घर क्यों बेच दूं गाँव वाला घर । फिर दिनेश और मां कहां रहेंगे अरे कोई किराए का मकान ले लेना गांव में। मकान बेचने से अच्छे पैसे मिल जाएंगे जिससे भूमिका की शादी अच्छे से निपट जाएगी। अच्छी शादी करनी है ना । अच्छी शादी अच्छी शादी बस तुम्हारी इसी की रट लगाए जा रही हो माँ, भूमिका जो पीछे खडी सरी बातें सुन रही थी । क्यों अपने ऊपर कर्ज का बोझ लाद लूं परेशान कर रही हो महेश बोला। नहीं करनी अच्छी शादी, ये सब दिखावा मुझे पसंद नहीं है भूमिका बोली।
हां बेटी तुम सही कह रही हो ,तेरी मां गांव का घर बेचने की जीद कर रही है । अब तू बता दे मैं कैसे वह घर बेच दूं जहाँ मेरा बचपन बीता वहाँ की गलियों में खेल कर मैं बड़ा हुआ, मां पिताजी के साथ 20 साल तक रहा, इतने सपने देखे थे हम सब ने उसके लिए कितनी परेशानियां झेली है पापा ने कि मैं पढ लिखजाऊं । यह बात अलग थी कि तेरे चाचा नहीं पढ़ पाए । उनका मन नहीं लगता था पढ़ने में वह गांव में रह गए मां पापा की देखभाल करने ।
मुझे पढाने को मां ने अपने गहने बेचे रेखीय सूखी गाकर पापा ने मुझे पढाया पर अब अच्छी नौकरी करता हूं तो गांव का घर बेच दूं पिताजी तो अब नहीं है माँ है इस उम्र में उनकी आत्मा बसती है उस घर मे।अब मैं अपने स्वार्थ के लिए घर से बेघर कर दूं इस उम्र में मुझसे नहीं हो पाएगा। नहीं पता नहीं है यह फालतू का दिखावा मैं तो खुद चाहती हूं कि एक सिंपल सी शादी हो भूमिका बोली।पापा आप मत परेशान हो मैं माँ को समझाऊंगी।
आज भूमिका की शादी थी बहुत भव्य तो नहीं लेकिन सिंपल सी भी नहीं थी। शादी में आए सभी मेहमान मेहमान नमाजी से खुश होकर जा रहे थे । खाने से भी सभी संतुष्टि थे।भूमिका की विदाई के समय झुर्रियों भरे हाथों से दादी ने भूमिका को आशीर्वाद दिया और कुछ पैसों का एक लिफाफा उसको पकड़ा दिया। ए क्या है दादी कुछ नहीं बेटा एक छोटा सा आशीर्वाद है । दादा दादी तो पता नहीं पोती पोतियों के लिए क्या क्या करते है, मै तो कुछ भी न कर पाई। बस एक छोटा सा शगुन दे रही हूँ।मैं हमेशा इसको संभाल कर रखूंगी दादी और भूमिका नये घर की ओर चल दी।
शादी के बाद महेश मां और छोटू को लेकर गाँव गया छोड़ने वहां घर में घुसते ही दिखा ,घर की हालत ठीक नहीं थी घर की दीवारों की जगह-जगह से प्लास्टर उखड रहे थे दरवाजे टूट रहे थे । लेकिन साफ सुथरा घर था।महेश ने अचानक पूछा दिनेश तुम्हें बुरा नहीं लगता है किस बात का भैया की, तुम गांव में रह गए और मैं शहर चला गया। दिनेश आप नहीं जाते तो पिताजी का सपना कैसे पूरा होता ।
आपकी पढ़ाई के किए थे इसलिए आपने मेहनत की और आगे बढे, मेरा मन पढ़ाई में नहीं लगता तो घर संभालना था। और मैं भी चला जाता तो क्या होता । गांव का घर बेच दे तो ,मां का हाथ रुक गया कोई जवाब नहीं दिया । दिनेश बोला इस घर में आपका भी हिस्सा तो है तो बेच सकते है।उसकी आवाज में कोई शिकायत नहीं थी, यही बात महेश को भीतर तक भेद गई भाई को किसी बात पर कोई शिकायत नहीं।
लौटने के बाद वंदना ने पूछा क्या हुआ गांव के घर का।कुछ नहीं
आज अगर मैं दिखावे के लिए अपना घर बेच दूं तो मैं जिंदगी भर खुद को अपनी नजरों से गिर जाऊंगा तुम्हें लगता है मेरी सफलता के पीछे सिर्फ मेरी मेहनत थी नहीं, थी मेरे मां की अधूरी इच्छाएं दिनेश के अधूरे सपने, पिता का दृढविश्वास । और उस घर की दीवारें है । वंदना घर सिर्फ ईटं पत्थरों से नहीं बनता है ,घर उन लोगों से बनता है जहां लोग एक दूसरे का हिस्सा बनकर जीते हैं। बाहर ऊंचे ऊंचे बड़े-बड़े पेड़ लहरा रहे थे मानो वह गवाही दे रहे हैं कि जिन रिश्तों को जड त्याग और सम्मान से बनी हो उन्हें कोई आंधी कभी गिरा नहीं सकती। क्योंकि विरासत सिर्फ जमीन जायदाद नहीं होती विरासत वह प्रेम होता है जो एक पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी की हवेलीयों में रख देती है।
मंजू ओमर
झांसी उत्तर प्रदेश
11 जून, 26