पैसा ही सब कुछ नहीं – बिमला रावत जड़धारी

रिया ने अपने बाबा को फोन किया। “बाबा, रोहन का फोन आया था। वह कह रहा था कि बाबा और मम्मी वसीयत बनाने वाले हैं।”

“हाँ, बेटा। रोहन ठीक ही बोल रहा था। मैं और मम्मी सोच रहे हैं कि अब वसीयत बना दें, पर रोहन मना कर रहा था कि अभी कोई जरूरत नहीं है।”

“हाँ बाबा, अभी तो वैसे कोई जरूरत नहीं है। पर जब भी बनाओगे, एक हिस्सा मेरा भी होना चाहिए। जिस फ्लैट में आप रहते हैं बाबा, वह मेरे घर के पास ही है, वह फ्लैट मुझे दे देना। मुझे सुविधा भी रहेगी की मैं कल को किराए में दे दूंगी और मेरा आना-जाना भी लगा रहेगा।”

बाबा बोले, “जैसे तू अभी बहुत आ रही है हमसे मिलने के लिए।”
“क्या बाबा आप भी। जब समय होता है तब आती तो हूँ बाबा आप लोगों से मिलने के लिए।”
“हाँ बेटा, छह महीने में एक बार आती है। बाकी समय फोन तक नहीं करती, मिलने आना तो दूर की बात है। क्या फ़ायदा तेरे इतना पास रहने का।”

शाम को रिया अपने माँ बाबा से मिलने घर आती है।
“आ गई बेटा,” माँ ने प्यार से कहा।

“हाँ, माँ।” रिया बोली “मुझे तो आना ही था। मैं सोच रही थी कि दो-तीन दिन बाद जाऊंगी, पर मैं आज ही आपसे मिलने आ गई।”

“बेटा, ठीक किया। बहुत अकेलापन लगता है, तुम पास होकर भी बहुत दूर हो।”
“क्या बात कर रही हो माँ। आपको तो पता ही है बच्चों के साथ-साथ मेरी जाॅब, सास- ससुर, सब के साथ कितना काम हो जाता है। मुझे तो टाइम ही नहीं मिल पाता।”

“बेटा मैं सब समझती हूँ। अच्छा बता, क्या खाऐगी? वही बना देती हूँ।”
“कुछ नहीं खाऊँगी, बस एक कप चाय बना दो, फिर बैठ कर बात करते हैं।”

माँ सभी के लिए चाय बना कर ले आयी। रिया ने वसीयत की बात छेड़ी, “बाबा, आप वसीयत बनाने की बात कर रहे थे।”
“हाँ बेटा, पर रोहन मना कर रहा है।”


“बाबा, रोहन तो मना करेगा ही। उसे तो आपने एक फ्लैट दे रखा है जिसमें वह रहता है। उसको वो वाला दे दो, और मुझे ये वाला।”
“पर बेटा, रोहन उस फ्लैट का मुझे किराया देता है। रोहन ने बोला था कि आप बाहर किसी को ये फ्लैट किराए में देने से अच्छा है मुझे ही दे दो, मैं उतना किराया आपको दे दूंगा। रोहन को तो मकान किराए में लेना ही था, और उसका आफिस भी यहां से पास है।”

” बाबा, किराया तो उसे आफिस से मिलता है।”
“हाँ, आफिस से मिलता है पर रोहन मुझे हर महीने उसके ऊपर से और रूपए भी देता है। फिर भी वह पूरा नहीं होता बेटा तुम तो जानती ही हो।” बिमला रावत

“बाबा आप दोनों रोहन के पास ही क्यों नहीं चले जाते रहने के लिए। खर्चा भी कम होगा और आप लोगों की देखभाल भी हो जाएगी।”

“ऐसा है बेटा तुम दोनों भाई बहन एक दिन सलाह करके अपने -अपने परिवार के साथ यहां आना। हम आपस में मिलकर बात करते हैं फिर मैं फैसला लूंगा। तुम दोनों को मंजूर होगा तो फिर उसी समय निर्णय लिया जाएगा और वैसे मैं अभी वसीयत करने के मूड में नहीं हूं।”
“ठीक है बाबा मैं रोहन से बात करती हूं।”

15 दिन बाद रोहन और रिया अपने परिवार के साथ मम्मी बाबा के घर आए। सभी मिलकर आपस में बहुत सी बातें और हंसी मजाक कर रहे थे। पर रिया का दिमाग  वसीयत को लेकर ही उलझा हुआ था। सब ने मिलकर दोपहर का खाना खाया। रीमा की मम्मी ने मीठे में खीर बना रखी थी। खाना खाने के बाद सब खीर खा रहे थे, उसी समय बाबा ने रोहन और रीमा को बोला, “बच्चों को कमरे में खेलने के लिए भेज दो, मुझे तुम दोनों से बात करनी है। दामाद और बहू भी यही बैठेंगे।”
बच्चों के जाने के बाद बाबा बोले, “मैं वसीयत के बारे में सोच रहा था।”

तभी रोहन मना करने लगा, “इतनी जल्दी क्या है बाबा…”
बाबा ने उसकी बात काटते हुए कहा, “बेटा मुझे आज नहीं तो कल वसीयत तो बनानी ही है। इसीलिए तुम लोगों को बुलाया है। बेटा रोहन और रिया, तुम दोनों बहुत अच्छी जॉब में हो और रिया तुम्हारे पति का काम भी अच्छा चल रहा है। इसलिए तुम लोगों को किसी चीज की जरूरत नहीं है। पर मैं यह चाहता हूं कि अपने रहते ही वसीयत बना दूं।

बेटा तुम तो जानते ही हो कि रिटायरमेंट के बाद जो भी पैसा मिला मैंने उससे वह फ्लैट खरीदा जिसमें रोहन तुम रहते हो। वह फ्लैट मैंने तुम्हारी मां के नाम खरीदा था। अब मेरी पेंशन तो है नहीं। जो तुम फ्लैट का किराया देते हो उसी से हमारा खर्चा चलता है। और ऊपर से तुम हमें और पैसे भी देते हो

खर्च के लिए, परंतु बेटा वह खर्च पूरा नहीं हो पाता है। क्योंकि हमारी बीमारी का खर्चा और रिश्तेदारी निभाने, शादी विवाह, कहीं आना-जाना, वह सब करना होता है। जब तक हम हैं यह सारी रिश्तेदारी हमें ही निभानी है, इसलिए थोड़ा मुश्किल हो रहा है। तो मैं सोच रहा हूं जब वसीयत के दो हिस्से ही करने हैं तो रिया तुम भी हमारा कुछ खर्चा उठाओ।” बिमला रावत

रिया बोली, “बाबा आप ऐसे कैसे बोल सकते हो? रोहन तो दे रहा है आपको खर्चा, और मेरे तो अपने ही इतने खर्चे हैं।”
तभी रीमा का पति सुरेश बोला, “बाबा ठीक बोल रहे हैं रिया, तुम्हें भी घर का खर्चा उठाना चाहिए। जब तुम हिस्सा मांग रही हो तो देना भी चाहिए।”

रिया को अब गुस्सा आ गया, “मैं कोई गलत नहीं मांग रही हूॅं। सरकार भी बोलती है कि बेटियों को हिस्सा दो।”
तभी बाबा बोले, “बेटा मैं

तो हिस्सा दे रहा हूॅं। सरकार हिस्सा देने के लिए बोलती है पर बेटियों को भी अपने मां-बाप के प्रति फर्ज निभाना चाहिए।”
तभी रोहन बोला, “बाबा आपको अगर और पैसों की जरूरत है तो आपने बोला क्यों नहीं। मैं हमेशा आपसे पूछता था कि बाबा और पैसे तो नहीं चाहिए परंतु आप हमेशा मना कर देते थे कि नहीं चाहिए। बाबा मैं इतना सक्षम हूॅं कि आप लोगों का खर्चा आराम से उठा सकता हूॅं। अगर आप चाहो तो मेरे साथ आकर रहो। और यह फ्लैट रिया को दे दो।”

बाबा बोले, “नहीं बेटा, जैसे रिया का परिवार है वैसे ही तुम्हारा भी अपना परिवार है, अपने खर्चे हैं। अभी हम अपना काम स्वयं कर सकते हैं। जब हम बिल्कुल लाचार हो जाएंगे तब हम तुम्हारे पास आकर रहेंगे। तब तक तुम अपना परिवार संभालो। अगर हमें किसी चीज की जरूरत होगी तो हम तुम्हें बोलेंगे।

मैं तो सिर्फ रिया को यह समझना चाहता हूॅं कि यह सब तुम दोनों का ही है, परंतु कुछ जिम्मेदारियां भी होती हैं मां-बाप के प्रति। हम हमेशा यह चाहते हैं कि हमारे बच्चे हमारे पास आए, कुछ पल साथ बिताए, हमसे पूछे किकिसी चीज की जरूरत नहीं है।

“मैं सिर्फ रिया को यह बताना चाहता हूं कि बेटा पैसा ही सब कुछ नहीं है। मिल मिलाप भी जरूरी है। जैसे आज हम सब मिले, तुम लोगों के आने से जीवन में जान आ जाती है।”

रिया की आँखें नम हो जाती हैं, “बाबा मुझे माफ कर दो, मैं स्वार्थी हो गयी थी। अब से हम दोनों भाई बहन परिवार सहित आप लोगों से मिलने आया करेंगे।”

“और बेटा कभी – कभी फोन भी कर दिया करो।”
“हाँ माँ, अब से मैं कभी आप सबको शिकायत का मौका नहीं दूंगी।”
बाबा बोले, “बेटा इस तरह मिलने से तुम भाई – बहन में प्यार बना रहेगा और ये बच्चे भी जो देखेंगे वही सिखेंगे। रिश्तों की कीमत भी इन्हें तभी समझ आएगी।”

“पापा आप सही बोल रहे हो। हम लोग अपने – अपने परिवार में ऐसे उलझ गए थे कभी आप लोगों की तरफ ध्यान ही नहीं गया कि आप लोगों को अकेलापन लगता होगा। हम समझते थे महीने के पैसे दे कर हमने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली। पर अब हमारी जिम्मेदारी है हम आप दोनों को कभी शिकायत का मौका नहीं देंगे और समय – समय पर कभी घर में तो कभी बाहर मिलने का प्रोग्राम बनाते रहेंगे।”

“जुग – जुग जियो बहू। तुम सब ने हमारी दिल की बात समझी। अब हमें किसी से कोई शिकायत नहीं है क्यों रोहन के पापा मैंने सही बोला न।”
“हॉं भई, तुम कभी गलत बोल सकती हो क्या?”
सभी जोर जोर से हंसने लगे…

– बिमला रावत जड़धारी

error: Content is protected !!