“बेटियाँ घर की रौनक होती हैं” — यह बात शर्मा जी अक्सर कहा करते थे। उनकी इकलौती बेटी अन्वी उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशी थी। घर में उसकी हँसी गूंजती तो लगता जैसे हर कोना मुस्कुरा उठा हो।
अन्वी बचपन से ही बहुत चंचल थी। सुबह उठते ही सबसे पहले माँ के गले लगती और फिर पापा की गोद में चढ़ जाती। पिता उसे स्कूल छोड़ने जाते और लौटते समय उसकी पसंद की टॉफी जरूर लेकर आते। माँ उसके लिए हर दिन कुछ नया बनाने की कोशिश करतीं।
एक दिन स्कूल में शिक्षक ने बच्चों से पूछा, “दुनिया में सबसे अच्छा दोस्त कौन होता है?”
किसी ने कहा उसका मित्र, किसी ने कहा उसका भाई। लेकिन अन्वी ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “मेरे मम्मी-पापा।”
शिक्षक भी उसकी बात सुनकर भावुक हो गए।
समय बीतता गया। अन्वी बड़ी होती गई। अब उसकी पढ़ाई का दबाव बढ़ गया था। देर रात तक पढ़ना, परीक्षाओं की चिंता और भविष्य की योजनाएँ—सब कुछ उसके जीवन का हिस्सा बन गया।
लेकिन एक चीज कभी नहीं बदली—माता-पिता का साथ।
जब भी वह परेशान होती, माँ उसके सिर पर हाथ फेरकर कहतीं, “हर समस्या का हल होता है, बस हिम्मत मत हारना।”
और पिता कहते, “असफलता रास्ता बदल सकती है, मंजिल नहीं।”
इन्हीं शब्दों ने अन्वी को हमेशा आगे बढ़ने की ताकत दी।
बारहवीं की परीक्षा में उसने पूरे जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया। पूरे घर में खुशी का माहौल था। लोग बधाई देने आ रहे थे।
सब उसकी सफलता की तारीफ कर रहे थे, लेकिन अन्वी जानती थी कि यह केवल उसकी नहीं, उसके माता-पिता की मेहनत का भी परिणाम था।
उसने सबसे पहले अपने माता-पिता के चरण छुए और कहा, “यह सफलता आपकी है।”
माँ की आँखें भर आईं और पिता ने गर्व से उसे गले लगा लिया।
कुछ वर्षों बाद अन्वी को दूसरे शहर में नौकरी मिल गई।
जिस दिन वह घर छोड़कर जा रही थी, माँ बार-बार उसके कपड़े ठीक कर रही थीं। पिता बार-बार समझा रहे थे कि अपना ध्यान रखना, समय पर खाना खाना।
स्टेशन पर ट्रेन चलने लगी।
अन्वी ने खिड़की से बाहर देखा। माँ आँसू छिपाने की कोशिश कर रही थीं और पिता मुस्कुरा रहे थे, लेकिन उनकी आँखें भी नम थीं।
उस दिन पहली बार अन्वी ने महसूस किया कि बच्चों के बड़े होने की खुशी जितनी होती है, उनसे दूर होने का दर्द भी उतना ही होता है।
नए शहर में नौकरी शुरू हो गई। जीवन की भागदौड़ बढ़ गई। कभी-कभी पूरा दिन निकल जाता और माता-पिता से बात नहीं हो पाती।
एक शाम ऑफिस से लौटते समय उसने देखा कि एक छोटी बच्ची अपने पिता का हाथ पकड़कर सड़क पार कर रही थी। वह दृश्य देखकर उसे अपना बचपन याद आ गया।
उसने तुरंत घर फोन लगाया।
माँ ने फोन उठाते ही पूछा, “बेटा, खाना खा लिया?”
अन्वी मुस्कुरा दी।
उसे एहसास हुआ कि चाहे उम्र कितनी भी बढ़ जाए, माता-पिता के लिए उनकी संतान हमेशा बच्ची ही रहती है।
कुछ महीनों बाद वह छुट्टियों में घर आई।
दरवाजा खुलते ही माँ ने उसे गले लगा लिया। पिता दूर खड़े मुस्कुरा रहे थे।
उसने गौर किया कि पिता के बाल अब पहले से अधिक सफेद हो चुके थे और माँ के चेहरे पर भी उम्र की हल्की रेखाएँ दिखाई देने लगी थीं।
उसे अचानक समझ आया कि जिन हाथों ने उसे चलना सिखाया था, उन्हें अब उसके सहारे की जरूरत है।
उस रात तीनों छत पर बैठे थे। ठंडी हवा चल रही थी।
पिता ने आसमान की ओर देखते हुए कहा, “समय कितनी जल्दी बीत जाता है। कल तक जो हमारी उंगली पकड़कर चलती थी, आज अपने पैरों पर खड़ी है।”
माँ मुस्कुराईं और बोलीं, “लेकिन हमारे लिए तो वह आज भी वही छोटी-सी बेटी है।”
अन्वी की आँखें नम हो गईं।
उसने दोनों का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा, “आज मैं जो कुछ भी हूँ, आपकी वजह से हूँ। आपने मुझे चलना सिखाया, गिरकर उठना सिखाया, और हर परिस्थिति में मुस्कुराना सिखाया।”
उस क्षण तीनों की आँखों में आँसू थे, लेकिन वे खुशी के आँसू थे।
अन्वी समझ चुकी थी कि दुनिया की सबसे बड़ी दौलत पैसा, पद या सफलता नहीं होती। सबसे बड़ी दौलत वे माता-पिता होते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के अपनी पूरी जिंदगी अपने बच्चों की खुशियों के नाम कर देते हैं।

माता-पिता और बेटी का रिश्ता प्रेम, विश्वास, त्याग और अपनापन का ऐसा बंधन है जिसकी कीमत किसी तराजू में नहीं तौली जा सकती। यह रिश्ता जीवनभर दिल को संबल देता है और हर मुश्किल में शक्ति बनकर साथ खड़ा रहता है।
सुदर्शन सचदेवा