खामोशी और झंकार: एक अनकहे अहसास की कहानी

रात के करीब आठ बज रहे थे। बाहर बारिश की हल्की फुहारें गिर रही थीं और बालकनी में बैठी अंजलि अपनी पड़ोसन विशाखा के साथ ठहाके लगाकर हंस रही थी। उनकी हंसी की आवाज़ बेडरूम तक आ रही थी, जहाँ समीर अपने लैपटॉप पर ऑफिस का कुछ ज़रूरी काम निपटाने की कोशिश कर रहा था।

समीर स्वभाव से बहुत शांत और अपने आप में रहने वाला इंसान था। उसे ज्यादा बातें करना, लोगों से घुलना-मिलना या घर में मेहमानों का आना-जाना कुछ खास पसंद नहीं था।

इसके ठीक विपरीत, अंजलि एक खुली किताब की तरह थी। वह जहाँ जाती, अपनी मीठी बातों और चुलबुले स्वभाव से लोगों को अपना बना लेती थी। पूरी सोसाइटी में शायद ही कोई ऐसा घर होगा, जहाँ अंजलि का आना-जाना न हो।

बालकनी से आती अंजलि की आवाज़ समीर के कानों में किसी शोर की तरह गूंज रही थी। उसने झल्लाहट में लैपटॉप बंद किया और उठकर बालकनी के दरवाज़े के पास आ गया। उसका मन किया कि अभी जाकर अंजलि को डांट दे और कहे कि क्या उसके पास दुनिया जहान की पंचायत करने के अलावा और कोई काम नहीं है?

लेकिन फिर उसने खुद को रोक लिया। विशाखा के जाने के बाद जब अंजलि कमरे में आई, तो समीर ने अपना गुस्सा दबाते हुए बस इतना कहा, “अंजलि, तुम्हें नहीं लगता कि तुम लोगों से कुछ ज्यादा ही घुलती-मिलती हो? मुझे यह सब पसंद नहीं है। हमारा अपना एक निजी जीवन है, हर किसी को घर में बुलाकर घंटों गप्पे मारना मुझे अजीब लगता है।”

अंजलि की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई। उसने समीर की तरफ देखा और बहुत ही शांत स्वर में बोली, “समीर, मैं सिर्फ बातें ही तो करती हूँ। इंसान आखिर इंसान के ही काम आता है। अगर हम चार लोगों से हंसकर बोल लेंगे, तो इसमें हमारा क्या नुकसान है?” यह कहकर वह रसोई की तरफ चली गई।

समीर वहीं बिस्तर पर बैठ गया। अंजलि की वो बात और उसका उदास चेहरा समीर की आँखों के सामने तैरने लगा। उसने गहरी सांस ली और आंखें बंद कर लीं। तभी उसके अंदर एक आवाज़ सी गूंजी, जैसे उसका अपना ही ज़मीर उससे सवाल कर रहा हो।

सच ही तो कह रही थी अंजलि। उसने कभी मुझे या मेरे माता-पिता को शिकायत का कोई मौका नहीं दिया। वह जितनी मेरी पत्नी है, उससे कहीं ज्यादा वो मेरी माँ की बेटी बन गई है। मुझसे ज्यादा तो वो माँ के करीब है। घर की हर छोटी-बड़ी ज़िम्मेदारी, माँ की दवाइयों से लेकर पिताजी के चश्मे तक, हर चीज़ का वो बिना कहे ध्यान रखती है। फिर मैं क्यों उसके स्वभाव को बदलना चाहता हूँ? जब मेरी कम बोलने की आदत, मेरे चिड़चिड़ेपन और मेरे अंतर्मुखी स्वभाव पर उसने आज तक कोई शिकायत नहीं की, तो फिर मुझे उसका बोलना, लोगों से दोस्ती करना क्यों इतना अखरता है? क्या प्यार का मतलब सिर्फ अपनी शर्तों पर जीना होता है?

समीर यादों के झरोखे में चला गया। उसे आज से छह महीने पहले का वो वक़्त याद आ गया, जब उसकी दुनिया अचानक से पलट गई थी। समीर की माँ को अचानक दिल का दौरा पड़ा था। समीर उस वक्त ऑफिस के एक ज़रूरी टूर पर शहर से बाहर था। वह खबर सुनते ही बुरी तरह घबरा गया था। लेकिन अंजलि ने उस मुश्किल घड़ी में जिस तरह सब कुछ संभाला, वो कोई मामूली बात नहीं थी। अंजलि ने ही पड़ोसियों की मदद से माँ को तुरंत अस्पताल पहुँचाया था। जब समीर वापस लौटा, तो माँ आईसीयू में थीं और अंजलि अस्पताल के बाहर एक कुर्सी पर बैठी प्रार्थना कर रही थी।

माँ की हालत गंभीर थी और उन्हें करीब बीस दिन अस्पताल में रहना पड़ा। अंजलि ने घर और अस्पताल के बीच ऐसी दौड़ लगाई कि उसने अपनी परवाह ही छोड़ दी। वो दिन-रात माँ के पास अस्पताल में रुकती। समीर को तो दिन में ऑफिस भी जाना पड़ता था, क्योंकि नया प्रोजेक्ट सिर पर था और छुट्टियां मिलना मुश्किल था।

समीर को याद आया कि उन बीस दिनों में जब वो अकेला घर आता था, तो घर एकदम सूना और डरावना लगता था। समीर को बाहर का खाना बिल्कुल पसंद नहीं था। उसे बाहर के तेल-मसाले वाले खाने से तुरंत एलर्जी और पेट की समस्या हो जाती थी। उस वक्त जब अंजलि अस्पताल में थी, तो समीर के खाने का क्या होता? यह सोचकर ही समीर का दिल आज भी भर आता है।

उन बीस दिनों तक, समीर को एक दिन भी बाहर का खाना नहीं खाना पड़ा था। क्यों? क्योंकि अंजलि की वही सहेलियां, वही पड़ोस की औरतें, जिनसे अंजलि घंटों बालकनी में खड़े होकर बातें करती थी, जिन्हें समीर ‘गॉसिप करने वाली भीड़’ समझता था, उन्होंने समीर का पूरा ध्यान रखा था। कभी विशाखा भाभी अपने घर से ताज़ा रोटियां और दाल ले आतीं, तो कभी शर्मा आंटी सुबह-सुबह नाश्ता टिफिन में पैक करके दे जातीं। नीलम दीदी ने तो कई बार समीर के कपड़े तक प्रेस करके रख दिए थे ताकि उसे सुबह ऑफिस जाने में कोई परेशानी न हो।

ये वही लोग थे, जिनका घर में आना समीर को अखरता था। लेकिन अंजलि के बनाए उन रिश्तों ने, अंजलि की उन ‘फालतू की बातों’ ने उस मुश्किल वक्त में समीर के लिए एक ऐसे परिवार का काम किया था, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। अंजलि ने अस्पताल के बिस्तर के पास बैठकर न सिर्फ माँ की जान बचाई थी, बल्कि अपने मिलनसार स्वभाव की बदौलत समीर को भी अकेला नहीं पड़ने दिया था।

समीर की आँखें नम हो गईं। उसे खुद पर बहुत शर्म आ रही थी। वह कितना स्वार्थी था। वह चाहता था कि अंजलि बिल्कुल उसके जैसी बन जाए, एक मशीन की तरह, जो सिर्फ काम करे और चुपचाप रहे। वह यह समझ ही नहीं पाया कि अंजलि की वो चहचहाहट ही तो इस घर की जान है। अंजलि की वो दोस्तियां ही तो समाज में उनके परिवार की जड़ें मज़बूत कर रही थीं। जिस स्वभाव को वह अंजलि की कमजोरी और बेवकूफी समझता था, असल में वही उसकी सबसे बड़ी ताकत थी। एक पेड़ जितना ज़मीन के अंदर अपनी जड़ें फैलाता है, तूफ़ान आने पर वह उतना ही मजबूती से खड़ा रहता है। अंजलि भी वही कर रही थी, वह रिश्तों की जड़ें फैला रही थी।

समीर तुरंत उठा। वह सीधे रसोई में गया। अंजलि गैस पर दूध उबाल रही थी और उसका चेहरा अभी भी थोड़ा उतरा हुआ था। समीर पीछे से गया और अंजलि के कंधे पर हाथ रख दिया। अंजलि ने चौंककर पीछे देखा।

“क्या हुआ समीर? कुछ चाहिए?” अंजलि ने धीमी आवाज़ में पूछा।

समीर ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने गैस बंद की और अंजलि का हाथ पकड़कर उसे डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बिठाया। फिर उसने खुद चायदानी उठाई और दो कप चाय बनाने लगा। अंजलि हैरान थी क्योंकि समीर ने शादी के इन तीन सालों में शायद ही कभी रसोई में कदम रखा हो।

“समीर, तुम क्या कर रहे हो? मुझे बताओ, मैं बना देती हूँ,” अंजलि उठने लगी।

“नहीं अंजलि, आज तुम बैठो,” समीर ने मुस्कुराते हुए कहा। उसने दो कप चाय बनाई और एक कप अंजलि के सामने रखकर खुद दूसरी कुर्सी पर बैठ गया।

“मुझे माफ कर दो, अंजलि,” समीर ने अंजलि की आँखों में देखते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कशिश और गहराई थी।

अंजलि घबरा गई, “अरे, इसमें माफी कैसी? मैंने कुछ कहा क्या?”

“नहीं, तुमने कुछ नहीं कहा। और यही मेरी सबसे बड़ी गलती है। तुम हमेशा चुपचाप मेरी हर कड़वी बात सुन लेती हो। मैं तुम्हारे चुलबुलेपन, तुम्हारी दोस्तियों और तुम्हारे ज्यादा बोलने से चिढ़ता रहा। लेकिन आज मुझे एहसास हुआ कि मैं कितना गलत था। अगर तुम वैसी न होती जैसी तुम हो, तो शायद हम कब के टूट चुके होते। माँ की बीमारी के वक्त तुम्हारे उन्हीं दोस्तों ने मेरा ध्यान रखा जिन्हें मैं पसंद नहीं करता था। तुमने मेरी हर कमी को, मेरी इस खामोशी को बिना किसी शिकायत के अपनाया है। फिर मैं क्यों तुम्हारी इस प्यारी सी झंकार को खामोश करना चाहता हूँ? तुम जैसी हो, बहुत अच्छी हो। मुझे तुम्हारा यह मिलनसार स्वभाव ही इस घर को घर बनाता है।”

अंजलि की आँखों से आँसू छलक पड़े। ये खुशी के आँसू थे। एक पत्नी के लिए इससे बड़ी खुशी क्या हो सकती है कि उसका पति न सिर्फ उसकी भावनाओं को समझे, बल्कि उसकी उस पहचान को भी सम्मान दे जो उसकी आत्मा है।

अंजलि ने मुस्कुराते हुए अपने आंसू पोंछे और चाय का घूंट लेते हुए बोली, “तो इसका मतलब, कल शाम को मेरी जो किटी पार्टी घर पर होने वाली है, उसमें तुम मुझे नहीं रोकोगे?”

समीर ज़ोर से हंस पड़ा। घर की उन दीवारों ने बहुत दिनों बाद समीर की इतनी खुली हंसी सुनी थी। “बिल्कुल नहीं रोकूंगा। बल्कि मैं खुद आऊंगा और तुम्हारी सहेलियों के लिए अपने हाथ से पकोड़े बनाऊंगा।”

अंजलि भी खिलखिला उठी। बाहर बारिश अब भी हो रही थी, लेकिन घर के अंदर का मौसम हमेशा के लिए सुहाना हो चुका था। दो विपरीत दिशाओं में बहने वाली हवाएं आज एक साथ मिलकर एक मीठा संगीत पैदा कर रही थीं। रिश्ते किसी एक के सांचे में ढलने का नाम नहीं है, बल्कि एक-दूसरे के अलग-अलग रंगों को मिलाकर एक खूबसूरत तस्वीर बनाने का नाम है।

क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा है जिसके स्वभाव से आप कभी परेशान होते थे, लेकिन बाद में उसी स्वभाव ने आपको किसी बड़ी मुश्किल से निकाला हो? क्या आपने कभी किसी रिश्ते में इस तरह का बदलाव महसूस किया है? अपने अनुभव और अपने विचार हमारे साथ कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें। आपके विचार हमें और भी बेहतर कहानियाँ लिखने के लिए प्रेरित करते हैं।

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