धरोहर – शुभ्रा बैनर्जी

“मां,मैं कल आ रही हूं।रात ग्यारह बजे तक पहुंच जाऊंगी।तुम जगी मत रहना।आज शाम की ट्रेन है।” 

निधि का फोन आते ही सुधा चहक कर बातें करने को व्याकुल हो उठी।निधि ने तीन वाक्य में ही बातें खत्म करते हुए बाय कर दिया तो,सुधा ने टोका”अरे,रुक तो जरा।फ्लाइट में आने वाली थी ना?फिर ट्रेन से क्यों?सोहम जी आ रहें हैं ना साथ?और मुझे सोने के लिए क्यों कह रही है?आते ही गर्म दाल चावल नहीं खाना क्या तुझे निधि?” 

निधि ने हंसकर कहा”उफ्फ मां,तुम भी ना।अब मैं क्या बच्ची हूं,जो इतनी रात में दाल चावल खाऊंगी?तुम आराम से सो जाना।दादा बाहर से लॉक करके स्टेशन आ जाएगा।रखती हूं अभी।पैकिंग नहीं हुई।अभी -अभी लॉग आउट किया है।ठीक है,मां।रखती हूं ना।” सुषमा को आज पहली बार निधि की आवाज में घर आने की पहले जैसी खुशी नदारद मिली।अभी साल भर भी तो नहीं हुए शादी को,और कह रही है कि दाल चावल नहीं खाऊंगी।कुछ तो है मन में उसके,जो वह छिपा रही है।कभी खुलकर अपना दुख बताती भी तो नहीं यह लड़की।सुषमा के अंदर कुछ टूटता सा लगा आज।

बेटे को जब निधि के ट्रेन से आने की बात बताते हुए चिंता जताने लगी ,तो उसने कहा” देखा मां तुमने,कैसे शादी होते ही कंजूसी करने लगी।पहले तो बड़ा चिढ़ाती थी मुझे,कि मैं इतना लंबा सफर ट्रेन में नहीं कर सकती।अब देखो,पति का पैसा लगी बचाने।”सुषमा के गंभीर चेहरे को देखकर वह समझाने लगा” तुम भी ना,अब यदि ट्रेन से आ रही है तुम्हारी बेटी,तो इसमें ऐसी क्या बड़ी बात है? छोटी-छोटी बातों में टेंशन लेने लगोगी,तो कैसे चलेगा मां?उसने कुछ सोचकर ही फैसला लिया होगा।तुम निश्चिन्त रहो।

आने से पहले ही बेकार की चिंता करके अपना मन छोटा मत करो।चलो मैं बाज़ार होकर आता हूं। क्या-क्या लाना है ,बता दो।” भाई को जो साधारण लग रहा था, वह मां के लिए असाधारण और चिंताजनक था।अपनी बेटी की सांसों को तक समझ सकती थी वह।कहीं ना कहीं कुछ तो सही नहीं है।मां की अंतरात्मा कभी ग़लत संदेश नहीं देती।जल्दी कल का दिन गुजरे और रात आए।निधि को देखकर और बातें कर के ही चैन मिलेगा अब।

अगला दिन बड़ा भारी लग रहा था सुषमा को।रात का इंतजार करना असहज सा महसूस हो रहा था।बड़ी मुश्किल से ट्रेन के आने का समय हुआ।बेटा बाहर से लॉक करके जाने लगा तो उसने मना कर दिया। गर्म दाल चावल बनाकर रखा था सुषमा ने।अब बस दस मिनट और, निधि आ जाएगी पति के साथ।पंद्रह बीस मिनट के बाद कार की आवाज सुन बाहर गेट तक दौड़ गई सुषमा।गाड़ी से निधि को अकेली उतरती देख ही माथा ठनका सुषमा का। सोहम (दामाद)के भी आने की बात थी।पूजा के लिए महीने भर पहले ही निमंत्रण दे दिया था सुषमा ने।निधि ने इधर-उधर झांकता देख टोक दिया”मां, मैं अकेली ही आई हूं।बताया तो था तुमको।भूल गई तुम! चलो अब अंदर।बहुत जोर से नींद आ रही है।नहाकर सोऊंगी पहले।कल सुबह बातें करेंगे।चलो अंदर अब।” 

सुषमा ने अपनी चिंता छिपाते हुए कहा “हां-हां,चल नहा ले।मैं खाना लगाती हूं।थोड़ा सा खाकर ही सोना।जानती हूं मैं,कुछ नहीं खाया होगा रास्ते में।” बड़बड़ाती हुई सुषमा ने जैसे ही गर्म दाल और चावल प्लेट में निकालकर दिए, निधि प्लेट पर झुक गई।बोली”बस थोड़ा सा घी दे दो मां।आत्मा तृप्त हो जाएगी।” सुषमा  बेटी के खाने के तरीके से ही समझ गई थी कि  वह बहुत भूखी थी।

खाकर निधि ड्राइंग रूम में रखे काउच में सोने जाने लगी, तो सुषमा ने डांटते हुए पूछा उससे”यहां क्यों हो रही है? चल तू मेरे कमरे में, बढ़िया ठंडाता है ए सी।तेरे पापा वाला।चल वहीं सोना चल कर।”निधि ने निर्विकार होकर कहा” अरे मम्मी, कितनी बार कहा है मैंने, वह कमरा तुम्हारा और पापा का है।मैं सामने सो जाऊंगी काउच पर।”

सुषमा के मन में अब कोई संदेह नहीं बचा।मन में ठान लिया था सुषमा ने कि बेटी के अंतर्मन की व्यथा तो समझनी ही पड़ेगी।

सुबह से कोशिश करती रही ,पर निधि ने सबकुछ सामान्य है बताया।शाम को पूजा होनी थी।सुषमा ने निधि से तैयार होने को कहा , और खुद भी पूजा की सामग्री तैयार करने लगी।निधि तैयार होकर जब निकली, तो मोहल्ले की सारी औरतें मुंह फाड़कर उसे ही देखने लगी, फिर सुषमा की ओर देखने लगीं।सुषमा भी हकचका गई , निधि को देखकर।पूरे शरीर में गहनों के नाम पर केवल शाखा -पोला थे।माथे में छोटी सी बिंदी, और मांग में भरा हुआ सिंदूर।सबके सामने तो कुछ बोल ना पाई, पर सबके जाने का बेसब्री से इंतजार करने लगी।औरतों के जाते ही सुषमा ने निधि का हाथ लगभग खींचते हुए अपने कमरे में लेकर गई और पूछा “तुझे अपनी मां की कसम है,बता गहने कहां हैं?बेच दिया या गिरवी रखवा दिया,सच-सच बता ना बेटा।” 

निधि ने हंसकर कहा”बचपन से संस्कारों की दुहाई दे-दे क्या सिखाती रही तुम मुझे,याद है?!तुमने तो मुझे कभी कुछ अनुचित बताने भी नहीं दिया।मैंने हमेशा अपने मन को मारकर समझाया है कि संस्कारों की शिक्षा जो मुझे तुमसे मिली है,मैं हर विपरीत परिस्थितियों का मुकाबला कर लूंगी।सब ठीक है मां,तुम जबरन चिंता मत करो।खाना दे दो, बहुत भूख लगी है।” 

सुषमा ने अच्छे से परोसकर उसकी पसंद का प्रसाद परोसा।फिर हांथ पकड़ कर ले आई भगवान जी के मंदिर,और कहा”देख निधि ,यही हमारे पालनहारे हैं।हम तीनों ने सारे दुख और परेशानियों को इनके चरणों में सौंपा है।हल निकाला है जब संकटमोचन ने पहले भी,अब भी निकालेंगे,देखना।अपने सारे अनकहे दर्द अर्पण कर दे इन्हें।मन से निराशा के गरल को निकल जाने दे।मैं जा रही हूं,तुझे जब लगे मुझे बुलाना।तू यहीं इनके चरणों में‌ अर्जी लगा।” 

थोड़ी देर बाद लाल-लाल आंखें लिए निधि ने मां को पुकारा पूजाघर में।सुषमा कहीं गई नहीं थीं।वे दरवाजे के बाहर ही खड़ी रहीं।अंदर जाते ही सुषमा की आधारशिला उसकी बेटी (निधि)मां से लिपटकर दहाड़े मारकर रोने लगी।सुषमा का संदेह निराधार नहीं था।अब निधि पीठ सहलाने जाने से सामान्य हो रही थी।एक सांस में अपनी आपबीती सुनाई डाली उसने।” उस घर के लोगों का रवैया हमारे घर से बिल्कुल भिन्न है।ससुर बात ही नहीं करते कभी।अभी हमारे छोटे फ्लैट में तीन ननदें, सास-ससुर रहने के लिए आएं हैं।मेरी हर चीज में ननदों की नजरें गढ़ी रहती हैं,दे भी देती हूं

अब पापा ने सोहम को नया तीन‌ बेडरूम वाला घर खरीदने के लिए दवाब दे रहें हैं।जब सोहम से पूछी यह बात,तो उन्होंने क्या कहा पता है मां!!!हां तो अपने हिस्से का गहना  दे दो।उन चीजों से कुछ ज्यादा होगा तो नहीं पर,हम सब साथ रह पाएंगे।अभी इस बात को ज्यादा दिन हुए भी नहीं कि,ननद को आगे एम बी ए करने भेजने की बात चलने लगी।फीस निधि से ले लेंगे।दिया ही क्या है घरवालों ने।भूखे-नंगे लोगों से रिश्ता कर के फंस गए,सारे”” “बोलते-बोलते लिपट कर फिर रोने लगी और बोली” मां ,मेरा तो पहले से ही यह सपना था कि भविष्य के लिए उचित संचय करूंगी,मेरी कमाई से।

जैसे ही कुछ बोलने की कोशिश करती हूं,सारे लोग वहां के यही समझाते हैं कि धीरज धरो।कल सब ठीक हो जाएगा।तुम्हारी मां ने तुम्हें संस्कार तो सिखाएं होंगे।उन संस्कारों से हमारे परिवार में यदि कोई योगदान ही नहीं हुआ,तो कैसे संस्कार,कैसी शिक्षा।इस घर से तुम्हारे दामाद को लगाव क्यों नहीं है?मेरा फ्लाईट में सफर करना फिजूलखर्ची है।मेरी जासूसी करती हैं सासू मां।गहनों को तक सुधार के पास ले गईं थीं,कितने कैरेट का है जानने।

तब मैं सारे गहने रख ली अपने पास और लाकर में रख दिया।अब मुंह सुजाए हुए हैं सब।तुम्हें बताती तो तुम भी शायद यही कहती,कि संस्कार अच्छे रखो,परिवार की मदद करो।मैं संस्कारों की परीक्षा नहीं दे सकती मां।मैं ससुराल वालों के लिए सब करना चाहती हूं,पर अपनी सैलरी से बचत करना मेरा धर्म है।

मैं उस घर के बड़े -बुजुरगों को जो सम्मान देती हूं,वही सोहम भी तो यहां दे सकता है।दामाद के सौ अपराध माफ,और बहू का एक भी “ना” नाकाबिले माफ़ी।ऐसा क्यूं मां।मैं सिर्फ खाना और सोने को ज़िंदगी नहीं समझती,और ना ही शादी के बंधन को गणित के समीकरण बैलेंस कर सकते हैं।मेरे लिए ये चीजें मेरी मां की निशानी है।बस सुनते ही मेरी संस्कारों की परीक्षा शुरू हो गई।अव्वल कैसे आती मैं।”

सुषमा ने बेटी को गले लगाकर कहा” पागल लड़की,इतनी सारी बातें कैसे छिपा लिया तूने मुझसे।कोई जरूरत नहीं तुझे,अपने संस्कारों की रोज परीक्षा देने की।तेरे संस्कार हमारे परिवार की धरोहर हैं,वो कभी घट ही नहीं सकते।मैंने भी ऐसे बहुत समझौते किए थे जीवन में।ख़ुद की कमाई ज्यादा नहीं  थी,पर कभी अपना आत्मविश्वास गिरवी नहीं रखना।जो अपनी बेटी,पत्नी और मां का सम्मान नहीं करते,वो ससुराल के प्रति कभी 

उत्तरदायी नहीं होते।*सुषमा ने निधि को‌ चुप कराते हुए कहा*तुम आजकल के बच्चे ,अपने मां-बाप से ही बातें छिपातें‌ हो क्यों;, तुम्हारी मदद हम फिर कैसे करें?दोनों मां -बेटी आज मन भर कर रो लीं।

अगले दिन ना तो सोहम का फोन आया ,ना उनकी मां का।निधि अब डर रही थी।वापस जाने पर यदि सोहम ने उसे घर के अंदर घुसने नहीं दिया तो?”सुषमा ने तब बेटी को समझाया” हमने और हमारी पीढ़ी की औरतों ने बहुत समझौते किए।और अपनी धरोहर हंसकर पति और ससुराल वालों को सौंप  दिया।आखिर में हम अस्तित्व हीन होकर भी सु वो चायखी रहने का नाटक बखूबी निभाते हैं।हमने जो गलतियां की,वो हमारी बेटियां कभी नहीं करेंगी अब।संस्कारों‌ की दुहाई देकर एक लड़की से उसकी आर्थिक आजादी छीन नहीं सकते वो।कुछ दिन तुम रुको यहीं,तू अपने घर में अपनी स्वयं की पहचान लेकर जीएगी।संस्कारों की ओट में,बहूएं नहीं मरेंगी अब जीते -जी।तेरा स्त्रीधन‌ तेरी भविष्य निधि है।यदि वहां के लोगों में कोई बदलाव ला ही नहीं सकती तू,तो बेहतर है खुद को बदलने की‌ सोच। “

सुषमा की बातें सुनकर निधि ज़ोर -जोर से रोने लगी।” तब सुषमा ने कहा”मेरे संस्कारों को अपनी ढाल मत बनने देना।आज के जमाने में संस्कार ही हथियार हैं।समय के चक्रव्यूह में फंसना मत।सही को सही और ग़लत कहने का साहस कर।यही है तेरे संस्कारों की शिक्षा।” 

शुभ्रा बैनर्जी 

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