संस्कार – करुणा मलिक 

वाह! हर बार लड़की के ही संस्कारों की परीक्षा होती है, क्या लड़के किसी  विशेष कार्ड को लेकर पैदा होते हैं, मम्मी प्लीज….. आपकी इसी बात को सुनकर मैंने पूरे दो हफ्ते  गुजार दिया कि शायद केशव की मम्मी ने भी कुछ तो संस्कार दिए होंगे। 

दीशू…. इतना आसान नहीं होता सब कुछ, सब आदमी एक से होते हैं, औरत को एडजस्ट करना पड़ता है…. 

नहीं मम्मी….. सब आदमी एक से नहीं होते…. भैया तो ऐसे नहीं है, आपने भी तो संस्कार दिए हैं। अगर भाभी के साथ भैया ऐसा व्यवहार करें तो…..? 

नहीं…. मेरा दक्ष ऐसा हरगिज़ नहीं करेगा……

यही तो मैं आपको समझाने की कोशिश कर रही हूँ मम्मी…. कि ना तो केशव की मम्मी ने संस्कार दिए हैं और ना वे अपनी बहू का साथ देना चाहती हैं…. उन्होंने ये सोचकर शादी की कि बहू अपने आप अपने पति को सुधार लेगी….. क्या आप चाहती हैं कि इतिहास फिर दोहराया जाए और मेरी हालत आप….. 

दिशा का वाक्य पूरा होने से पहले ही शीतल ने उसकी बात काटते हुए कहा–

ठीक है….. तुम अपना फैसला ले सकती हो। 

इतना कहकर वे अंदर अपने कमरे में जाकर लेट गई। लेकिन जिस माँ की बेटी का वैवाहिक जीवन शुरू होने से पहले ही उजड़ने का तैयार था, उसकी आँखों में नींद कैसे हो सकती थी। 

शीतल उन्नीस साल की थी जब उसकी शादी हो गई थी। भरा-पूरा परिवार था। दोनों जेठ  दूसरे शहरों में अपने-अपने परिवार के साथ रहते और नौकरी करते थे। गाँव में अच्छी जमीन जायदाद थी, नौकर-चाकर किसी चीज की कमी नहीं थी । शीतल के मायके वालों ने भी यही सोचकर रिश्ता किया था कि शीतल भी पति के साथ चली जाएगी। 

शीतल को अटपटा तो पहली ही रात लगा था जब पति ने कमरे में पाँव रखते ही कहा था—-

शहर चलने के सपने मत देखना, मैं अपने भाइयों जैसा नहीं कि माता-पिता की सेवा करने की जगह अपना सुख देखूँ…. 

उसी समय सुकोमल युवती के  सपने चकनाचूर हो गए पर वह चुप रही। अगले दिन भाई के साथ मायके आई तो रो- रोकर घर सिर पर उठा लिया —

सासू तो आँखे निकाल कर बोलती है, एक बार भी प्रेम से नहीं बोली…. ससुर से घूँघट करना है तो बात किससे करुँगी, ओर तो कोई नहीं है। 

माँ ने हँसते हुए शीतल से कहा था —

बड़ी बावली छोरी है, ये सब बात तो कहने की होती है…. देख लियो तू, दामाद जी छह महीने भी ना छोड़ेंगे और जो ना भी लेगे तो भी तू बड़ी किस्मत वाली है….. भला ऐसा श्रवण कुमार सा पति सबको ना मिलता, बड़े बढ़िया संस्कार दिए हैं समधन ने….. 

और  सचमुच भोली भाली शीतल माँ की बात सुनकर रीझ उठी थी अपनी किस्मत पर….. 

दो दिन बाद ही पति  मायके से लिवा ले गए। उसी रात पति के मुँह से आती बास और लड़खड़ाते कदमों को देखकर शीतल का मन बुझ गया था पर उसे अपने पडोस में रहने वाली कमला भाभी की कही बात याद आ गई थी–

अरि, मरद जात ऐसी ही है कभी-कभी खुशी में दो घूँट ले लिए तो कोई बुराई नहीं….. 

और इस बार भी शीतल ने पति की बुराई को खुशी से जोड़ कर स्वीकार कर लिया। जब तीन-चार दिन बाद ही पति का सामान बँधने लगा तो उसने डरते-डरते सास से पूछा था –

माँ, अब कब आएँगे….. इतना खाने-पीने का सामान किसके लिए….. 

तेरा आदमी है , तूझे पता होना चाहिए। 

और पति खूब आटा, चावल, दाल, घी, गुड़ लेकर शीतल को बिना कुछ कहे चला गया। इस बात का ताना भी सास ने शीतल को दिया —

जो औरत अपने मरद को अपने वश में ना कर सके….. वो भला कैसी औरत? 

बेचारी शीतल सास की कही इस बात को समझ ही नहीं पाई। पति को गए पूरा महीना हो चुका था, क्या करे….. मोबाइल फोन तो उन दिनों नहीं था, लैंडलाइन ससुर की बैठक में था और वहाँ घर की बहुओं  का प्रवेश निषेध था। सास के सामने मन की बात कहने का अर्थ उनसे ताने सुनना था। तभी एक दिन सुबह शीतल को कै करती देख सास बोली —

दम तो है तुझमें….. बस छोरा जन देना फिर देख, वो पलटकर उसके पास जाने का नाम भी ना लेगा…. 

किसके पास……. 

जवान-जहान है, बच्चे की माँ बनने वाली है, ब्याह के तुरत बाद ब्याहता को छोड़कर जाना….. तुझमें अक्ल की कमी है क्या? 

अब शीतल चक्कर खाकर गिरने वाली थी पर पेट में अंकुर के अहसास ने सास के मन में कहीं करूणा भर दी थी शायद….. इसलिए उसने शारीरिक चोट से बचा लिया पर एक स्त्री के मन की चोट से अनजान बने रहते हुए कहा–

यही मौका है, अपने पति को अपनी मुट्ठी में करने का…. बुलवा देती हूँ हरि को होली के बाद, आगे तू सँभाल ले…. 

शीतल सोचने लगी कि माँ-बाप अपने बेटे के अवैध संबंधों के बारे में जानते थे फिर भी उन्होंने दुनिया के सामने  बेटे की करतूतों पर परदा डालने के लिए झूठा दिखावा किया और मेरा जीवन नष्ट कर दिया। 

तकरीबन दस दिनों के बाद बड़ा भाई होली की रस्म निभाने और उसे लेने आ गया। शीतल ने मन ही मन सोचा था कि वह लौटकर अब इस घर में नहीं आएगी क्योंकि ना पति ही अपना था और ना सास-ससुर….. वह तो केवल बलि का बकरा बनाई गई थी एक साजिश के तहत। 

शीतल ने घर जाकर माँ को सारी बात बताई पर माँ ने उसे समझाते हुए कहा–

देख छोरी, किसी को कुछ बताने की जरूरत ना है, ब्याह से पहले लड़के भटक जाए पर ब्याह की जंजीर बड़ी मजबूत है…. अपनी भाभी के सामने भी जिक्र ना करना, तेरी ही बेइज्जती होगी….. 

माँ…. मैंने तो सोचा था कि तुम मेरी तकलीफ समझोगी और इस रिश्ते को खत्म…… 

पागल है….. दुनिया-समाज क्या कहेगा….. 

पर दुनिया-समाज मुझे क्यों कुछ कहेगा, मैंने क्या गलती की है…. जिसने गलती की उसे तो कोई कुछ नहीं कह रहा। 

#बेटी ये तेरे संस्कारों की परीक्षा है, सब्र से काम ले , बाल-बच्चे हो जाएँगे…. सब ठीक हो जाएगा। 

शीतल ने सोचा कि माँ को जीवन का अनुभव है, शायद एक दिन सब ठीक हो जाएगा। होली के बाद चैत्र नवरात्रे शुरू हुए और पति उसे लेने आ गया। माँ के कहे अनुसार शीतल अपनी ससुराल लौट आई। वह जितना पति का  ख्याल रखने  की कोशिश करती, वह उतनी ही रुखाई से शीतल की बेइज्जती करता…… 

तीसरे दिन पति ने फिर सामान समेटा और चला गया। शीतल को हैरानी थी कि  एक बार भी सास-ससुर बेटे को समझाने या बहू के पक्ष की बात नहीं कहते थे। 

खैर….. शीतल ने निश्चित समय पर बेटे को जन्म दिया और सास-ससुर का लक्ष्य पूरा हो गया। माँ ने भी धेवते के रूप में शीतल के सुखद भविष्य की कल्पना करके सारी रस्में खूब जी जान से निभाई। 

शीतल ने कई बार अपनी सास से पति को सूचना देने के बारे में पूछा पर हर बार उसका वही जवाब होता–

बहू, ठंड रख…. कर देंगे फोन भी, तेरा जापा निकालूँ या आए- गए की रोटी थापूँ…. कुआँ पूजन तीन महीने बाद होगा, दोनों बड़े भी बाल-बच्चे के साथ तभी आवेंगे तभी हरि को बुला लेंगे…. 

शीतल कहे भी तो किसे? अब तो भाई भी कुआँ पूजन पर ही आएगा। हाँ…. एक बात थी कि सास ने शीतल की देखभाल के लिए एक औरत का बंदोबस्त कर दिया था जो उसके खाने-पीने और मालिश आदि का बहुत ध्यान रखती थी। अब शीतल की छोटी सी अलग दुनिया बन चुकी थी पर अंदर ही अंदर कहीं घुटन थी। हफ्ता दस दिन में मायके से फोन आता तो ससुर की उपस्थिति में मात्र राजी खुशी की बातचीत ही होती। 

ढाई महीने बीते और कुआँ पूजन की तैयारियाँ शुरू हो गई। सास-ससुर खूब बढ़िया लेन-देन और दावत करके लोगों को अपना पैसा दिखाने के अवसर को गँवाना नहीं चाहते थे। दो दिन पहले मेहमानों से घर भर गया, ढोलक बजने लगी और जच्चा गाई जाने लगी। 

शीतल का पति हवन में साथ तो बैठा था पर उसे आए हुए पूरे दो दिन हो चुके थे, उसने ना तो बच्चे को गोद में उठाया था और ना शीतल का हालचाल पूछा था….. हाँ अपने विशेष पति धर्म को निभाना नहीं भूला था। 

सारी रस्मों-रिवाजों के बाद शीतल ने भाई के साथ जाने की जिद पकड़ ली क्योंकि मेहमानों के साथ-साथ पति ने भी सामान बाँध लिया था। 

मायके में आए उसे दस दिन ही हुए थे कि ससुराल से लौटने का तक़ाज़ा होने लगा। बड़ी मुश्किल से महीना पूरा किया तो पता चला कि पति अपना विशेष धर्म निभाकर दूसरा बच्चा उसकी कोख में डाल गया है। वह इतनी जल्दी दूसरा बच्चा नहीं चाहती थी पर जिस स्त्री का पति ही अपना ना हो, वो किससे मन की बात कहती। 

आखिर जब एक दिन उसका सब्र टूट गया तो उसने चीखते हुए कहा–

तुम जानते थे कि तुम्हारा बेटा किसी ओर के साथ रहता है तो मेरी जिंदगी बरबाद क्यों की…. मैं क्या बच्चे पैदा करने की मशीन हूँ…. जब उसे मेरे सुख-दुख की कोई परवाह नहीं…. 

सास उसका मुँह बंद करके घसीटते हुए अंदर ले गई कि कहीं कोई पड़ोसी बहू की आवाज न सुन ले। सास ने आँखे निकालते हुए कहा था —

किसी भूल में मत रहना, बच्चे रखके तुझे ऐसी जगह छोड़ आएँगे कि अपना नाम भी भूल जाएगी। लानत है तुझ पर, जो अपने पति को खुश रखना नहीं जानती। 

उसी वक्त शीतल ने कसम खा ली थी कि वह अपने बच्चों को लेकर बहुत दूर चली जाएगी। अब उसके पास भाई का इंतजार करने के सिवा कोई चारा नहीं था  । अपनी फौज की नौकरी से भाई कभी साल में एक बार आ पाता था तो कभी दो बार। 

समय बीता और शीतल ने एक बेटी को जन्म दिया। जब उसकी बेटी दो महीने की हो गई तो भाई उससे मिलने आया। इस बार शीतल ने जिद से नहीं, दिमाग से काम लेते हुए सास-ससुर से प्रार्थना की कि उसे मायके में दो-ढाई महीने रहने दें क्योंकि वह बहुत दिनों बाद जा रही थी। 

शीतल ने घर पहुँचकर अपने भाई को सारी आपबीती सुनाई। दस-पंद्रह दिन बाद ही दिनेश ने अपनी बहन शीतल और उसके दोनों बच्चों को अपने एक दोस्त के साथ उडीसा भेज दिया और घर में कह दिया कि वह शीतल को ससुराल छोड़ आया है क्योंकि उन्होंने इतने ही दिनों के लिए भेजा था और फिर अपनी नौकरी पर चला गया। 

वहीं उड़ीसा में शीतल ने ब्यूटी पार्लर का काम सीखा और मुंहबोले भाई-भाभी की सहायता से फौजी अफसरों के छोटे बच्चों को टयूशन पढ़ाने लगी। इस तरह धीरे-धीरे बच्चे पलते गए और शीतल ने फौजी अफसरों की पत्नियों की मदद से अपना पार्लर खोल लिया। 

उधर दो महीनों के बाद भाई ने ससुराल वालों के खिलाफ बहन की गुमशुदगी और अगवा करने का मुकदमा दायर कर दिया और ससुराल वालों ने मायक़े वालों पर धोखाधड़ी का आरोप लगा दिया। 

इन सब से दूर शीतल ने अपने दोनों बच्चों को अच्छे संस्कार और उच्च शिक्षा दिलाई। जब नौकरी के दौरान दक्ष और विधि की मित्रता प्रेम में बदल गई तो शीतल ने समाज की परवाह ना करके अपने बेटे की खुशी को सर्वोच्च रखा लेकिन आज जब बेटी दिशा शादी की पहली रात से ही केशव को लेकर आशंकाएँ प्रकट कर रही है तो वह क्यों संस्कारों की दुहाई दे रही थी ? 

तभी अचानक शीतल को दिशा की कही उस बात पर हँसी आ गई —

मम्मी, केशव बोला कि मैं अपनी लाइफ में किसी तरह की दखलंदाजी पसंद नहीं करता इसलिए तुम मुझसे कभी कोई सवाल नहीं पूछोगी , यहाँ तक कि अगर मैं अपनी किसी फ्रैंड के पास भी जाऊँ तो… 

तो मैंने भी बेड से उठकर अपना तकिया उठाते हुए कह दिया–

मि० केशव, वैसे तो ये सारी बातें शादी से पहले बतानी चाहिए थी पर चलो…. दो-चार दिन में पति की जिम्मेदारियों के बारे में जान लो और अगर तुम नहीं निभा सकते तो फैसला कर लो….. और मम्मी मैं तो बाहर दूसरे कमरे में आकर सो गई थी। 

अब शीतल की आँखे उनींदी हो गई। दामाद का चुनाव करने में तो गलती हो गई पर वह दिशा के फैसले में कोई रोड़ा नहीं अटकाएगी — और निश्चिन्त होकर शीतल करवट लेकर लेट गई। 

करुणा मलिक 

error: Content is protected !!