शादी के कुछ महीनों बाद ही सौम्या को सुमित्रा जी का रहन-सहन, उनकी पुरानी आदतें और उनका आयुष से बात करना खटकने लगा। घर में रोज़-रोज़ क्लेश होने लगे। सौम्या को अपनी ‘प्राइवेसी’ में सास का दखल बिल्कुल पसंद नहीं था। आयुष जो कभी अपनी माँ की एक आह पर रो पड़ता था, अब पत्नी के दबाव और रोज़ की किच-किच के आगे कमजोर पड़ गया था।
शहर के कोलाहल से दूर, ‘शांति कुंज’ वृद्धाश्रम के प्रांगण में एक अजीब सी उदासी छाई हुई थी। कार से उतरते ही पच्चीस साल के आयुष का चेहरा बुरी तरह उतरा हुआ था। उसकी नज़रें ज़मीन में गड़ी थीं और वह अपनी माँ से आँखें मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।
कार की पिछली सीट से उतरती साठ साल की सुमित्रा जी की हालत तो ऐसी थी मानो किसी ने उनके शरीर से प्राण निचोड़ लिए हों। उनके हाथों में एक छोटा सा सूटकेस था, जिसमें उनके चंद कपड़ों से ज्यादा उनकी ज़िंदगी भर की टूटी हुई उम्मीदें भरी थीं।
पास ही खड़ी आयुष की पत्नी, सौम्या, के चेहरे पर एक अजीब सी राहत थी, जैसे कोई बहुत बड़ा बोझ सिर से उतर गया हो। आश्रम के मैनेजर ने जब रजिस्टर में नाम दर्ज करते हुए सुमित्रा जी से पूछा, “माता जी, आपका कोई और रिश्तेदार या घर का नंबर जिसे हम एमरजेंसी में कॉल कर सकें?”
सुमित्रा जी खामोश रहीं। वह भला क्या जवाब देतीं? उनके होंठ सिल गए थे और आँखों का पानी भी जैसे सूख चुका था।
यह वही सुमित्रा जी थीं जिन्होंने पच्चीस साल पहले अपने पति के अचानक गुजर जाने के बाद, दुनिया की जाने कितनी जिल्लतों को सहा था। जब आयुष महज तीन साल का था, तब उनके सिर से पति का साया उठ गया था। मायके और ससुराल, दोनों ने उनसे मुंह फेर लिया था। “मनहूस है, खा गई
अपने पति को,” जैसे ताने उन्हें रोज़ सुनने पड़ते थे। लेकिन सुमित्रा जी ने हार नहीं मानी। उन्होंने लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा किया, रात-रात भर जागकर कपड़े सिले और अपना पेट काटकर आयुष को शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ाया।
उन्हें याद है वो रातें जब आयुष को बुखार होता था, तो वह पूरी रात उसकी छाती से चिपकी बैठी रहती थीं। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में कोई नया शौक नहीं पाला, कोई नई साड़ी नहीं खरीदी, बस इसी उम्मीद पर अपने बेटे को बड़ा किया कि एक दिन वह पढ़-लिख कर बड़ा आदमी बनेगा और उसका अपना एक हंसता-खेलता परिवार होगा। वह सोचती थीं कि जब उनका बेटा अपनी दुल्हन लाएगा, तो उनके जीवन के सारे दुख खत्म हो जाएंगे।
आयुष ने भी उन्हें कभी निराश नहीं किया था। वह पढ़ने में होशियार था, उसे एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई और फिर उसने सौम्या से लव मैरिज कर ली। सुमित्रा जी ने अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी उस शादी में लगा दी। उन्हें लगा था कि उनकी तपस्या अब सफल हो गई है।
लेकिन उन्हें क्या पता था कि जिस घर को उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचा था, वहां उनके लिए ही कोई जगह नहीं बचेगी। शादी के कुछ महीनों बाद ही सौम्या को सुमित्रा जी का रहन-सहन, उनकी पुरानी आदतें और उनका आयुष से बात करना खटकने लगा। घर में रोज़-रोज़ क्लेश होने लगे। सौम्या को अपनी ‘प्राइवेसी’ में सास का दखल बिल्कुल पसंद नहीं था। आयुष जो कभी अपनी माँ की एक आह पर रो पड़ता था, अब पत्नी के दबाव और रोज़ की किच-किच के आगे कमजोर पड़ गया था।
कल रात ही तो आयुष ने अपनी माँ के कमरे में आकर नज़रें चुराते हुए कहा था, “माँ, सौम्या यहाँ खुश नहीं है। हमारे बीच रोज़ झगड़े होते हैं। मैंने तुम्हारे लिए शहर के सबसे अच्छे ओल्ड ऐज होम में बात कर ली है। वहां तुम्हें हर सुविधा मिलेगी। मैं वीकेंड पर तुमसे मिलने आता रहूंगा।”
आयुष के वो शब्द सुमित्रा जी के सीने में किसी खंजर की तरह उतरे थे। उन्होंने कोई विरोध नहीं किया, कोई आंसू नहीं बहाया, बस एक गहरी सांस ली और अपना सूटकेस पैक कर लिया।
और आज, वह उसी वृद्धाश्रम की चौखट पर खड़ी थीं। मैनेजर का सवाल अभी भी हवा में तैर रहा था। सुमित्रा जी का दिल अंदर ही अंदर चीत्कार कर रहा था। जीवन के अंतिम क्षणों में एक इंसान क्या चाहता है? बस यही न कि उसकी मौत अपनों के बीच हो। सुमित्रा जी ने कितनी ही बार ईश्वर से प्रार्थना की थी कि जब भी उनका अंतिम समय आए, तो उनका सिर आयुष की गोद में हो।
हर माँ की तरह उनका भी यह सपना था कि जीवन के अंतिम क्षणों में उनकी अर्थी को कंधा देने वाला उनका अपना बेटा हो। लेकिन आज, उनका अपना बेटा उन्हें जीते जी इस अनाथालय में छोड़कर जा रहा था। सुमित्रा जी सोच रही थीं कि जब वह मरेंगी, तो क्या आयुष उन्हें कंधा देने आएगा? या इस अनाथालय के चार अजनबी ही उनकी अर्थी उठाएंगे? जिस बेटे को उन्होंने चलना सिखाया था, आज वही बेटा उन्हें हमेशा के लिए अकेला छोड़कर अपने रास्ते पर वापस लौट रहा था।
आयुष ने आगे बढ़कर सुमित्रा जी के पैर छुए। “माँ, अपना ख्याल रखना। मैं आता रहूंगा,” उसकी आवाज़ में अपराधबोध था।
सुमित्रा जी ने अपने कांपते हाथों से उसके सिर पर हाथ रखा। एक माँ का दिल ऐसा ही होता है, जो टूटने के बाद भी अपनी औलाद को सिर्फ दुआएं ही देता है। “खुश रहना बेटा,” उन्होंने बहुत ही धीमी आवाज़ में कहा।
आयुष और सौम्या कार में बैठे और कार वहां से धूल उड़ाती हुई निकल गई। सुमित्रा जी तब तक उस कार को देखती रहीं, जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो गई। उनके हाथ में पकड़ा सूटकेस अब उन्हें अपनी पूरी ज़िंदगी के बोझ से भी भारी लग रहा था। उन्होंने एक लंबी और ठंडी सांस ली और आश्रम के उस लंबे, खामोश और अंधेरे गलियारे की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए, जहाँ उनके जैसी और भी कई बेबस माताएं अपनी मौत का इंतज़ार कर रही थीं। रिश्ते, प्यार, और अपनापन, सब कुछ आज उस वृद्धाश्रम के लोहे के गेट के बाहर ही दम तोड़ चुका था।
दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि आज के दौर में इंसान अपनी सहूलियत के लिए अपने जन्मदाताओं को ही भूलता जा रहा है? क्या आयुष का अपनी पत्नी की खुशी के लिए अपनी उस माँ को घर से निकाल देना सही था जिसने उसके लिए अपनी पूरी ज़िंदगी कुर्बान कर दी? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।
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लेखिका : सविता गर्ग