“नहले पे दहला ” – कमलेश आहूजा

रमा बहुत क्रोधी और झगड़ालू स्वभाव की महिला थी।हर समय अपनी बहु से झगड़ा करती रहती थी,कभी काम को लेकर तो कभी दहेज को लेकर ताने देती रहती।बहु बेचारी बहुत सीधी थी कुछ नहीं बोलती और चुपचाप अपना काम करती रहती।रमा के पति रमेश जी बहुत सज्जन इंसान थे

उन्हें रमा का इस तरह से बहु के साथ बुरा व्यवहार करना अच्छा नहीं लगता था,वो रमा को समझाने की कोशिश करते तो वो उनसे ही झगड़ने लगती।घर में क्लेश का वातावरण हो जाता।घर में शांति रहे इसलिए रमेश जी ने आखिरकार अपनी हार मान ली और रमा से कोई बहस नहीं करते,चुप रहते।

रमा के दो बेटे थे,बड़ा वाला बेटा भी बहुत सीधा था उसकी भी अपनी मां के सामने बोलती बंद हो जाती थी।पर अपनी पत्नी से वो बहुत प्रेम करता था,जब वो सास की बातों से आहत होती तो उसे प्यार से समझाता।

वो कहते हैं ना, कुदरत या वक्त एक न एक दिन ऐसा ‘नहला पे दहला’ मारती है कि इंसान जमीन पर आ ही जाता है । 

रमा के छोटे बेटे की शादी हुई।छोटी बहु नेहा वैसे तो पढ़ी लिखी थी और उसका स्वभाव भी बहुत अच्छा था पर वो किसी के साथ या अपने साथ गलत होते नहीं देख सकती थी।

एक दिन नेहा और उसका पति आपस में हँसी मजाक कर रहे थे..रमा से ये सहन नहीं हुआ,अच्छे भले माहौल को खराब करते हुए नेहा से बोली -“बहु तेरे मायके वालों पे ये कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है,कि हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और।”

नेहा आश्चर्य से बोली -“मां जी इसका क्या मतलब?”

“उन्होंने रिश्ता तय होने से पहले बड़ी बड़ी बातें की थीं पर शादी में कुछ नहीं दिया।”रमा हाथ मटकाते हुए बोली।

नेहा समझदार थी इसलिए गुस्सा करने की बजाय,मुस्कुराते हुए बोली-“माँ,जी वो इसलिए कि उन्हें भी आप लोगों को देखकर ये कहावत समझ आ गई थी,कि जैसा मुंह हो वैसा टीका लगाना चाहिए।” रमा ने सोचा नहीं था

कि नेहा उसे ऐसा जवाब देगी क्योंकि उसकी बड़ी बहु तो उसके ताने सुनकर चुप रह जाती थी।खिसिआते हुए अपने छोटे बेटे से बोली,देख तेरी बहु की जुबान कैसे चलती है?इसे बड़े छोटे का कोई लिहाज नहीं।बेटा कुछ नहीं बोला तो रमा गुस्से से तमतमाते हुए वहां से चली गई।

अब रमा का ध्यान बड़ी बहु से हटकर छोटी बहु पे ज्यादा रहने लगा।वो कोई ना कोई बहाना नेहा से उलझने का ढूंढ ही लेती थी।एक दिन नेहा अपनी माँ से फोन पर बात कर रही थी,तभी रमा आ गई नेहा ने फोन रख दिया।कहते हैं ना जब अपने मन में चोर हो तो सभी गलत दिखाई देते हैं, रमा ने पूरी बात सुनी भी नहीं और नेहा से झगड़ना शुरू कर दिया -” बहु तुम्हारी ये झूठ बोलने की आदत कब जाएगी?

जब देखो अपनी माँ से फोन पे कहती रहती हो,कि मेरी सास तो कुछ काम नहीं करती सारा काम मुझे ही करना पड़ता है।”रमा को लगा उसकी झूठी बात सुनकर नेहा गुस्सा करेगी और अपनी सफाई में कुछ बोलेगी पर ये क्या वो तो बिल्कुल सामान्य रही और चेहरे पे मुस्कान लाते हुए बोली-“मेरी माँ ने बोला था,

कि अपनी सास के पद चिन्हों पे चलना जैसा वो करें वैसा ही तुम करना।जिस दिन आप झूठ बोलना छोड़ देंगी बस उस दिन से मैं भी झूठ नहीं बोलूंगी।” 

“मैंने कब झूठ बोला?”रमा तेवर दिखाते हुए बोली।

“आप उस दिन दीदी (नंद)से फोन पे बोल रही थीं ना,कि बहु कुछ काम नहीं करती सारा काम मुझे ही करना पड़ता है?”

इससे पहले की नेहा रमा के और झूठ गिनवाती…वो वहां से नौ दो ग्यारह हो गई।वहां खड़े रमेश जी ने आज पहली बार रमा को मैदान छोड़कर भागते देखा।वो मन ही मन बहुत खुश हो रहे थे,कि रमा को नहले पे दहला मिल ही गया..! उस दिन के बाद रमा ने बहुओं से झगड़ना छोड़ दिया।क्योंकि उसे समझ आ गया था,

कि अब उसकी दाल नहीं गलने वाली।चुप रहने में ही भलाई है वरना छोटी बहु उसके बखिए उधेड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी।घर में अब शांति का माहौल रहने लगा।सब तो खुश थे ही पर बड़ी बहु कुछ ज्यादा ही खुश थी क्योंकि इतने साल उसने जो जिल्लत की जिंदगी जी अब जाकर उसे उससे निजात मिली।उसने नेहा का बहुत शुक्रिया अदा किया क्योंकि वो हमेशा उसके साथ खड़ी रही।

अड़ोसी पड़ोसी भी रमा का बदला हुआ व्यवहार देखकर दंग थे।रमेश जी ने एक दिन नेहा को अपने पास बिठाया और बोले -“बेटा,जो काम मैं इतने सालों से नहीं कर सका वो तूने कुछ ही महीनों में कर दिया।तूने ना गुस्से से ना ही लड़ झगड़कर बल्कि अपनी समझदारी से रमा को बदलने पर विवश कर दिया।क्योंकि वो तो झगड़ालू थी ही और अगर तू भी उसके साथ वैसा ही व्यवहार करती,उसकी बातों का बतमीजी से जवाब देती तो शायद झगड़े कभी खत्म ही नहीं होते।मगर तूने ऐसा नहीं किया,मर्यादा में रहकर उसको सबक सिखाया।

सच तेरा मैं जितना शुक्रिया करूं उतना कम है।”रमेश जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा तो नेहा बोली-“पापा,आप ऐसा कहकर मुझे शर्मिंदा ना करें।बहु होने के नाते ये तो मेरा फर्ज था,कि घर में कोई अगर गलत है तो उसको सही रास्ते पर लाना चाहिए ताकि हम सब घुट घुटकर नहीं खुलकर जिएं तभी तो परिवार में खुशियां आएंगी।”पति और बहु की बातें सुनकर रमा को अपनी गलती का एहसास हुआ।उसे लगा,बहु सही तो कह रही है परिवार में खुशियां तभी आएंगी

जब घर का माहौल अच्छा होगा सब प्रेम प्यार से रहेंगे।रमा के बदले व्यवहार से सब खुश थे,और रमेश जी ये सोचने पे मजबूर हो गए..सच एक बहु की समझदारी ने रमा जैसी क्रोधी झगड़ालू सास को भी बदलने पे मजबूर कर दिया।

कमलेश आहूजा

#एक बहु की समझदारी

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