जीना सीखे – कंचन श्रीवास्तव आरज़ू

आज ब्रेकरी की दुकान पर अचानक की मुलाकात ने रोमा का भ्रम दूर कर दिया ।रेखा की बातें सुनकर लगा कि इंसान की हिम्मत,साहस और धैर्य उसके जीवन को बदल सकता है ।उसका सोचना गलत था कि हम सफ़र के गुजरने के बाद उम्र बोझ लगने लगती है सब कुछ होने के बावजूद भी जिंदगी विरान और मन उदास रहता है ।

किसी काम में मन नही लगता पर आज इन्होंने जो कुछ कहा वो आज के परिवेश में रहकर अपने दम पर एक नई दुनिया बनाकर जीना काबिले तारीफ है उन्होंने बताया कि भगवान का दिया सब कुछ है भरा पुरा परिवार, रूपया पैसा धन दौलत कुल मिला के किसी चीज़ की कमी नही है पर जीवन साथी के अभाव ने इन सारी चीज़ों को बेमायने कर दिया है ।

अरे घर तो इतना बड़ा कि चार किरायेदार रख लो खाली लगे ।सही ही कहा है बड़े बुजुर्गों ने कि दाम्पत्य जीवन में अगर किसी एक का साथ छूट जाये चाहे पति हो या पत्नी तो एक के आभाव में दूसरे का जीवन कठिन हो जाता है की। क्योंकि उसका स्थान कोई वू जो नही सकता है आज सब कुछ होते हुए भी एक अजीब सा खालीपन महसूस होता है,

हो भी क्यों ना बच्चे जब तक छोटे थे तमाम जरूरतों के चलते हर वक़्त आगे पीछे घूमते थे जब से अपनी अपनी जिंदगी में व्यस्त हुए है पास बैठने की फुर्सत ही नही मिलती यही हाल बेटियों का भी है जब से घर गृहस्थी में मशरूफ हुई हैं आना तो छोड़ो फोन भी कम करती है और करती भी हैं तो हाल चाल तक ही रह जाती है।

कभी ऐसा नही होता कि वो अपने मन की चार बातें कहें और हमारे मन की सुने ऐसे में मुझे वो औरत याद आई जो कभी पति के समय मेरे घर आया जाया करती थी पर बच्चों के रूखे व्यवहार के चलते बंद कर दिया।

आज जब मैंने फोन मिलाता तो पता चला अब वो इस दुनिया में नही रही।

ये सुन मुझे अफ़सोस भी हुआ और धक्का भी लगा। अफ़सोस इस बात का कि मुझे पता ही नही चला और धक्का इस बात का कि उसके अंतिम दिनों में वो मैं उसके साथ नही थी।पर दूसरे ही पल अपने आप को संभालते हुए सोचने लगी कि दुनिया तो आनी जानी है इसी का नाम जिंदगानी है अब और मैं अकेले नही रह सकती मुझे कुछ करना होगा

वरना अभी तो थोड़ा बीमार हूँ कुछ समय बाद और भी बीमारियां पकड़ लेगी और जैसे ही और बीमारियां पकड़ेगी एक गिलास पानी को मोहताज हो जाऊंगी। अब रहना तो इन्हीं के साथ है तो ढालना भी खुद को इन्हीं के अनुसार होगा ,कुछ तो करना पड़ेगा तभी जीवन में सुकून आयेगा वरना बची हुई जिंदगी जिल्लत और तनहाइयों भरी होगी।

दिन भर कोई रहता नही कोई शाम को आता है तो कोई रात को आता है।किसी का कोई फिक्स समय नही।ऐसे में मेरा समय कैसे पास समझ नही आता और सबसे बड़ी बात ये कि किसी चीज़ की जरूरत हो तो किससे कहें।

फिर मैंने सोचा क्यों ना घर पर ही छोटे छोटे बच्चों को बुला कर पढ़ाना शुरू करूं। यकीन मानों बहन मैंने तो एक दो को बुला कर पढ़ाना शुरू किया था पर यहां तो लाइन लग गई बच्चों की हलाकि इसका विरोध बहुत किया सबसे पर बाद में सभी को समझ में आ गया कि पैसे के लिए नही बल्कि अकेलापन दूर करने के लिए ऐसा कर रही हूं

तो सब ने रज़ामंदी दे दी।फिर क्या मैं धीरे धीरे खुद को उन सबके साथ व्यस्त रखने लगी इस तरह हमारा समय भी बीत जाता और अकेलापन भी दूर हो जाता ।

आज उसी का परिणाम है कि मैं इतनी खुश रहती हूँ और मेरा स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है ।अब तो पूरे कालोनी भी मेरी चर्चा होती है। लोगों के लिए प्रेरणा बन गई हूं मैं।

लोग कहते हैं कि देखो घर के सभी लोग जब व्यस्त हो तो घर के बुज़ुर्ग खुद को कैसे व्यस्त करें ।अब वो बात अलग है कि वो पढ़ाती है पर सबके पास कुछ ना कुछ हुनर है सो बांटो इससे दो फायदा होगा ,पहला तो ये कि लोगों को कुछ सीखने को मिलेगा और दूसरी ये कि अपना हुनर सामने आयेगा।

इस तरह तुम्हारा समय भी बीत जायेगा और किसी से कोई शिकायत भी नही रहेगी।सच में भाई मेरा तो कहना है कि खुद में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो उम्र कोई मायने नही रखती।कहती हुई अपने इंतज़ार करते बच्चों के पास चली गईं और रोमा उनके जज्बे को सलाम कर उन्हें जाते हुए देखती रह गई।

कंचन श्रीवास्तव आरज़ू प्रयागराज

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