जो तुमको हो पसंद – लतिका श्रीवास्तव

शालू कितनी देर लगाओगी नाश्ता लाने में दुकान से ग्राहक लौट जाएंगे कैलाश जी ने थोड़ा खीज कर कहा तो शालू रसोई से प्लेट लिए भागती आती दिखाई दी।

तुम्हे पता है मेरी दुकान सबसे पहले खुलती है।लेकिन जब मैं ही घर से देर से निकलूंगा तो कैसे खुलेगी… कैलाश जी ने प्लेट में रखा पराठा सब्जी के साथ खाते हुए कहा।

जी सॉरी वो वीनू को चाय देने चली गई थी शालू आहिस्ता से बोल उठी।

वीनू इतनी सुबह उठ गया आज ? कैलाश ने अचरज से पूछा।

आज उसका पेपर है ना आपको नहीं पता शालू ने आश्चर्य व्यक्त किया पति की अनभिज्ञता पर तो कैलाश जी सकुचाने के बजाय आक्रामक हो गए।

क्या क्या पता रखूँ मैं दुकान का काम इतना विकट है दिमाग  बिगड़ जाता है।तुमको क्या आराम से घर में रहती हो किसी बात की कोई चिंता ही नहीं आवाज ऊंची हो गई उनकी।एक दिन दुकान में बैठकर देखो तो समझ आ जाएगा घर के बाहर की दुनिया कैसी है घर के अंदर तो सब हरा हरा ही दिखता है….बोलते बोलते वह खड़े हो गए।

शालू खामोश हो गई।अपराधबोध सा उसके चेहरे पर छा गया।

आज तुम्हारे कारण मुझे देर हो गई।अब कल से बिना खाए ही जाऊंगा कैलाश जी शालू पर बिगड़ते हुए दुकान चले गए।

बहुत बड़ी कपड़े की दुकान थी कैलाश जी की मेन मार्केट में।उनके अथक प्रयासों के कारण ही उनकी दुकान की डिमांड बढ़ती जा रही थी।सुबह से उठकर वह थोड़ा टहलने जाते फिर स्नान ध्यान नाश्ता कर सीधे दुकान रवाना देर रात घर वापिस आते।घर में क्या हो रहा है कौन आ रहा जा रहा

दोनों बच्चों वीनू और टीना की पढ़ाई लिखाई परीक्षा रिजल्ट इन सबसे उन्हें कोई लेना देना नहीं रहता था।शालू सबकी परवाह करती रहती सबका ख्याल रखती।

घर की पूरी चाक चौबंद व्यवस्था  बच्चों की, आने जाने वालो की  रिश्तेदारों की, तीज त्यौहाररो की, बीमारी हारी की, किराना ,सब्जी ,फल सब शालू मुस्तैदी से करती रहती।साल पर साल बीतते चले गए पर शालू के काम बढ़ते ही गए जिस पर किसी का ध्यान कभी गया ही नहीं।

शालू ने भी किसी से कुछ नहीं कहा।वह बढ़ती हुई जिम्मेदारियों के घेरे का कुशलता से निर्वहन करती रही।प्रसन्न रहती और सारे कामों को अपना ही काम समझ कर करती रहती थी।

धीरे से कैलाश जी का बेटा वीनू दुकान संभालने लगा था।बिटिया की भी शादी हो गई थी।धीरे धीरे कैलाश जी की दुकान संभालने की हिम्मत शिथिल हो चली थी।

वीनू ने दुकान को आधुनिक रूप दे दिया था और बहुत अच्छे से दुकान का सारा काम काज संभाल लिया था।कैलाश जी प्रसन्न थे कि बेटे ने घर का बिजनेस अच्छे से समझ लिया है जिम्मेदार हो गया है । वह निश्चिंत हो गए ।

पिता जी आप दिन भर दुकान में क्यों रहते हैं दोपहर में घर चले जाया करिए खाना खा कर आराम करके शाम को थोड़ी देर के लिए आ जाया करिए।

यहां मैं हूं सब संभाल लूंगा।घर पर मां अकेली रहती हैं उन्हें अच्छा लगेगा एक दिन वीनू ने जब उनसे कहा तो  बेटे की बात सुन उन्हें अचानक अपनी जिम्मेदारियों से मुक्ति और पत्नी का ध्यान आया।सो अब वह दोपहर में खाना खाने और आराम करने घर आने लग गए थे।

एक दिन जब वह दोपहर में दुकान से घर आए तो शालू की कोई पुरानी सहेली बैठी हुई थी।दोनों की बातचीत उनके कानों में पड़ी।

ए शालू इस बार मैं तेरा कोई बहाना नहीं सुनूंगी तुझे मेरी बेटी के संगीत में आना ही है शादी में तो आएगी ही और हां इस बार अपना लिखा कोई गीत गाकर सुनाना पड़ेगा समझी बरसों हो गए तू और तेरे गीत तो खो गए हैं!! सहेली रमा बहुत अधिकार से शालू से जिद कर रही थी।

नहीं रमा संगीत में नहीं आ पाऊंगी।दोपहर का समय तो भोजन का रहता है।ये भी घर आते हैं खाना खाने और आराम करने…और गीत लिखना गाना ये तो पिछले जन्म की बातें लगती हैं अब कहां ..!! शालू की आवाज में छिपी एक अव्यक्त वेदना और जिम्मेदारी का दबाव अचानक ही कैलाश जी के दिल को छू गया ।

अपनी घनिष्ठ सहेली की बेटी के संगीत में जाने का समय नहीं निकाल पा रही है मेरी पत्नी।अपने ही पति की तीमारदारी करने में।कितनी विवश और काम के दबाव में रहती है।इसकी इच्छा शौक कोई मायने ही नहीं रखे जाते घर में।क्या ये घर इसका भी उतना ही नहीं जितना मेरा या वीनू का है।

हम दोनों तो दिन भर अपने मन का करते है कहीं भी आना जाना हो कभी भी इसको बिना बताए चले जाते हैं पूरे अधिकार से।और ये सालों साल से सबसे पूछ कर बता कर अपने सारे काम करती है। कहीं जाना हो तो बिना मेरी परमिशन के जा ही नहीं सकती।

मुझे तो आज पहली बार पता लगा कि मेरी पत्नी कुछ लिखती भी है गाती भी है।उन्हें अचानक याद आया शादी के बाद महिला संगीत में शालू ने बहुत मधुर गीत गाया था सबने बहुत तारीफ की थी लेकिन उन्होंने एक शब्द नहीं कहा था बल्कि ये गाना वाना मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है कह उसकी उपेक्षा ही की थी।

इसने तब भी कुछ नहीं कहा था।उस दिन के बाद से मैने इसे कभी गुनगुनाते भी नहीं सुना।मेरी पसंद बच्चों की पसंद में इसने अपनी पसंद मिला दिया।मुझे तो पता ही नहीं चला कब बच्चे बड़े हो गए स्कूल कॉलेज की पढ़ाई उनका करियर सब शालू ही देखती रही।आज तक इसने कोई शिकवा कोई जिद नहीं की। मैं ही हमेशा इस पर हुक्म चलाता रहा इसके सीधे पन के कारण!!

कैलाश जी के भीतर कुछ चुभता चला गया।शालू के बरसों बरस उनकी आंखों के सामने से घूम गए।

अरे भाईसाब नमस्ते आपको भी इस बार शालू के साथ शादी में आना है नई न्योता देने आई हूं इस बार कोई व्यस्तता का बहाना नहीं सुनूंगी मै रमा ने उन्हें दरवाजे से आते देख झट से न्योता दे दिया।

शालू सकुचा सी गई।

नहीं नहीं हम लोग नहीं आ पाएंगे। मैं इसे यही समझा रही थी शालू ने अपराधी भाव से पति की तरफ देखते हुए कहा तो कैलाश जी ग्लानि भाव से भर गए।

हां हां इस बार हम लोग आयेंगे ही आप पक्का समझिए बहुत उत्साह और खुशी से आगे बढ़ शालू के साथ खड़े होते हुए उन्होंने कहा तो शालू विस्मित हो उनका मुंह देखने लगी और रमा खुश हो गई।

देखा शालू तेरे पति कितने अच्छे हैं।तुझे संगीत में भी आना है और गीत भी सुनाना है समझी रमा ने दोनों की तरफ देखते हुए कहा तो शालू के कुछ बोलने से पहले ही कैलाश जी बोल उठे हां बिल्कुल शालू हर कार्यक्रम में आपके घर आएगी ही और रह गई गीत गाने की बात तो ये बात तो मुझे भी आज ही पता लगी है शालू ने कभी बताया ही नहीं क्यों शालू जी उन्होंने शरारत से मुस्कुराते हुए कहा तो रमा ने तुरत दहला मारा अच्छा जी आपने भी तो कभी पूछा ही नहीं .. तो सब हंसने लगे।

रमा के जाते ही कैलाश जी ने रसोई की तरफ बढ़ती शालू के हाथ थाम लिए।

शालू सुनो तो आज से जो तुमको पसंद हो वही घर में होगा।आधी जिंदगी तो तुमने बिता दी मेरी और घर की सेवा टहल में अपनी इच्छाओं की तिलांजलि देते हुए। मेरी पसंद को अपनी पसंद बनाया कभी कोई शिकायत तक नहीं की कोई फरमाइश भी नहीं की हाथ पकड़ आर्द्र स्वर में कह उठे कैलाश जी ।

कैसी बातें कर रहे हैं आप।ये सब मुझे भी तो पसंद है।ये सब मेरे ही काम तो हैं शालू ने उन्हें परे हटाती हुई फिर रसोई की राह पर जाने को उद्धत हो गई।

सुनो शालू अब हमारी जिंदगी की दूसरी पारी शुरू हो चुकी है।जिसका एक एक पल मै तुम्हारी पसंद के नाम करना चाहता हूं अभी से सबसे पहले आज रसोई में तुम्हारी पसंद की कोई चीज बनेगी और बनाऊंगा मैं अपने इन अनाड़ी और निकम्मे हाथों से जिन्हें बस तुम्हारी सजाई थाली से खाना ही आता है कभी खिलाना नहीं आया।आओ आज मै तुम्हे खिलाऊंगा और तुम मुझे एक गीत सुनाओगी कैलाश जी बहुत भावुक हो गए थे एक अपराध भाव उनके चेहरे पर छाया था जैसा अक्सर शालू के चेहरे पर रहा करता था।

शालू जड़ खड़ी अपने इस बदले बदले पति को देख रही थी जो उसके लिए थाली सजा रहे थे।

चलो शालू थाली लग गई लेकिन प्लीज़ आज वही गीत सुना दो ना जो तुमने शादी के बाद के महिला संगीत में गाया था आज मैं तुम्हारा बह गीत दिल लगा कर सुनना चाहता हूं तुम्हारी उस गाती हुई खुशआवाज को अपने भीतर महसूस करना चाहता हूं जी भर कर तुम्हारे सामने तुम्हारी तारीफ करना चाहता हूं …इतना अनुनय भरा स्वर था उनका कि  शालू चाह कर भी मना नहीं कर सकी।

बहुत संकोच से बड़ी मुश्किल से गला खखार कर उसने गाना शुरू किया… तो गाती ही चली गई सालों के बाद उसके दबे स्वर आज जो फूटे तो किसी नदी की तरह बह निकले … एक एक शब्द एक एक सुर मानो घर की बेजान दीवारों को सांसे दे रहा था कैलाश जी मंत्रमुग्ध से अपनी पत्नी के सामने बैठे किसी भक्त के भाव से उसके उजले चमकते चेहरे को निहार रहे थे ।जिंदगी में पहली बार जिंदगी से मुलाकात हो रही है उन्हें ऐसा महसूस हो रहा था।ये शालू का असली रूप कितना मोहक है किसी ताजे खिले फूल की तरह जो आज ही खिला है।अब यह फूल हमेशा यूं ही खिला रहेगा मन ही मन संकल्पित हो उठे थे वह।शालू का गाना खत्म हुआ और कैलाश जी की जोरदार तालियों के साथ ही एक और ताली बजने की आवाज सुनाई दी।

पलट कर देखा तो पुत्र वीनू खड़ा जोर जोर से तालियां बज रहा था।

वाह मां आप तो छुपे रुस्तम हो इस बार मेरे जन्मदिन की पार्टी में यही वाला गीत आप गाओगी उत्साह से बोल उठा वह।

नहीं ये वाला नहीं अब कोई नया गीत लिखना शालू जो तुमको पसंद हो वही वाला कैलाश जी ने जोर देकर प्यार से कहा तो शालू उनकी तरफ देख लाजवंती सी हो गई।

नहीं जो तुमको पसंद हो वह वाला कह कैलाश जी के पास आ गई।

वीनू ने पास आकर दोनों को गले से लगा लिया।आहा मां आज का दिन कितना मीठा है उसने कहा तो कैलाश जी ने तुरंत समर्थन किया कि हां आज से इस दूसरी पारी की जिंदगी का हर दिन होगा बिल्कुल तेरी मां की मीठी आवाज के समान मीठा…!!

लतिका श्रीवास्तव 

ज़िंदगी की दूसरी पारी# कहानी प्रतियोगिता 

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