ममता की कोई कीमत नहीं ! – डाॅ संजु झा

रामलाल की नींद आधी रात को अचानक किसी बच्चे के रोने की आवाज से खुल गई।वे एक नजर अपनी सोई हुई पत्नी और नमिता पर डालते हैं और चुपके से दरवाजा खोलकर बाहर निकल जाते हैं।

दिसंबर माह में कड़ाके की ठंढ़ पड़ रही थी। उन्होंने खुद को ऊनी शाॅल से अच्छी तरह लपेटा और आगे आवाज की दिशा में बढ़ चले।पास में ही डस्टबिन में से बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी। उन्होंने जाकर देखा कि ऊनी शाॅल में लिपटी हुई एक बच्ची जार-जार रोऍं जा रही थी।

रामलाल बच्ची को उठाने के लिए तेजी से आगे बढ़ते हैं, फिर तत्काल ही आगे बढ़े हुए हाथ को रोककर पलटकर वापस जाने लगते हैं,पर लगातार तेजी से रोती हुई बच्ची की आवाज उनके कदम रोक लेती है। वे फिर से लौटकर बच्ची को उठाकर अपने शाॅल के अंदर समेट लेते हैं।

बदन के नर्म एहसास और शरीर की गर्मी पाकर बच्ची रोना बंद कर देती है।सुकून पाकर बच्ची अंगूठा चूसने लगती है। रामलाल ज़िन्दगी में पहली बार बाल-सुलभ क्रीड़ा देखकर मुग्ध हो उठते हैं।आज तक  रामलाल ईश्वर की खूबसूरत नेमत संतान से वंचित ही रहें।

इस मासूम जान की कोमल और नर्म स्पर्श ने उनके शरीर के साथ-साथ उनकी आत्मा में भी एक तृप्ति का सुखद एहसास भर दिया।

उन्हें महसूस होता है कि शायद इसी कारण ममता को अनमोल कहा गया है,इन सुखद लम्हों की कोई कीमत नहीं हो सकती है। उन्होंने सिर उठाकर ऊपरवाले से शिकायती लहजे में कहा -” हे ईश्वर!अगर तुझे संतान देनी ही थी तो जवानी में देता।अब बीमार पत्नी और बूढ़े शरीर के साथ इस बच्ची का पालन-पोषण कैसे करुॅंगा?”

रामलाल बच्ची को  बाॅंहों में समेटकर खुद बुदबुदाते हुए सोचते हैं कि अगर रात भर ठंढ़ में बच्ची को छोड़ देता तो निश्चित ही इसके प्राण नहीं बचते।कल सुबह इसके बारे में सोचूॅंगा।वे बच्ची को लेकर धीमे कदमों से घर में घुसते हैं। भगवान का लाख-लाख शुक्र था कि पत्नी सोई हुई थी।वे धीरे से नमिता को जगाते हैं।

कुछ दिनों पूर्व किशोरी  नमिता उन्हें एक पार्क में रोती हुई मिली थी।उसे दुखी और असहाय जानकर घर ले आऍं थे।पहले तो उसे देखकर उनकी पत्नी काफी नाराज़ हुई थी, परन्तु धीरे-धीरे नमिता के अपनेपन और सेवा-भावना से खुश रहने लगी थी। परन्तु इस छोटी बच्ची को देखकर उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी,यह रामलाल की समझ से परे की बात थी?

उन्होंने ज्यादा न सोचते हुए बच्ची को नमिता की गोद में देते हुए कहा -“बेटी!इसे थोड़ा -सा दूध पिला दो, बहुत भूखी है!”

नमिता -“काका!सुबह इसे देखकर तो काकी हंगामा कर देगी!”

रामलाल -“अब कल की कल देखी जाएगी!अभी इसे शांत करो।”

नमिता “अच्छा” कहकर दूध गर्म कर लाती है और बच्ची को दूध पिलाने लगती है। भूखी बच्ची पल भर में सारा दूध पी लेती है और जम्हाई लेने लगती है। नमिता बच्ची को कंधे पर रखकर थपथपाती है ,वह जोर से डकार लेकर सोने लगती है।उसे सीने से लगाए नमिता सोने जाने लगती है। रामलाल उसे रोककर पूछते हैं -” बेटी!तुमने ये सब इतने अच्छे से कहाॅं से सीखा?”

नमिता -” काका!पहले मैं अनाथालय में जहाॅं  रहती थी, वहाॅं हमेशा छोटी बच्चियाॅं ही आतीं थीं। मैं ही उन बच्चियों की देखभाल करती थी।”

रामलाल -“बेटी! वहाॅं तो छोटे लड़के भी आते होंगे?”

नमिता -“नहीं काका! हमारे समाज में बेटियाॅं ही बोझ होतीं हैं। बेटों को अकारण कोई नहीं फेंकता!”

रामलाल उन बातों से हतप्रभ हो उठते हैं। फिर बच्ची पर नजर पड़ते ही कहते हैं -“बेटी!बच्ची बहुत नाज़ुक है,इसे अच्छी तरह कंबल में लपेटकर रखना।”

नमिता -“काका! चिन्ता मत करो।इसे मैं रात भर अपने सीने से चिपकाकर रखूॅंगी।”

नमिता बच्ची को सीने से चिपकाए बिस्तर पर आकर लेट जाती है।उसको एहसास होता है कि बच्ची के रूप में उसका ही अतीत मानो आ खड़ा हुआ है।अतीत की यादें बार-बार उफनकर उसके मानस-पटल पर अंकित होने लगतीं हैं।इस बच्ची और उसमें कितनी समानताऍं हैं!

उसे भी तो इसी तरह उसकी जन्मदात्री ने कूड़े के ढ़ेर पर फेंक दिया था।किसी ने उस पर इतना एहसान किया था कि जानवरों का निवाला बनने से पहले एक अनाथालय में पहुॅंचा दिया था। अनाथालय की जिन्दगी जानवरों से भी बदतर थी। खाने-पीने से लेकर सभी चीजों की कमी थी।

वात्सल्य का तो कतरा भर वहाॅं न था। वहाॅं किसी के दिल में उन बच्चियों के लिए न तो ममता थी,न ही कोई दया-दृष्टि।पेट भर खाना जिस दिन नसीब होता,उस दिन किसी अमीर के बच्चे का जन्म दिन होता या और कोई खुशी!सभी बच्चियों की जिंदगी जैसे-तैसे घिसट रही थी।

अनाथाश्रम संचालिका लोगों से चंदे तो बहुत लेती थी, परन्तु अपने भाई के साथ मिलकर सब कुछ डकार जाती थी।वह इन सब बातों से अनजान बन डरे हुए कपोत के समान ऑंखें बंद किए हुए थी।उसने जैसे-तैसे दसवीं की परीक्षा पास कर ली थी, परन्तु जबसे उसके जीवन में यौवन ने दस्तक दिया था,

तब से उसकी जिंदगी दूभर होने लगी थी।उसे चारों तरफ हवस भरी नजरें घूरतीं प्रतीत होती थीं। कभी-कभी उसे उस घुटन भरे माहौल से भाग जाने की इच्छा होती, परन्तु अनाथाश्रम के सिवा उसके पास ठिकाना ही कहाॅं था?इसे अपनी  नियति मानकर वहाॅं रहने को मजबूर थी।

आखिर बकरे की माॅं कब तक खैर मनाती।जिस बात का डर था,वहीं हादसा उसके साथ हो गया।एक रात वह अपने कमरे में सो रही थी। अचानक से दो बलिष्ठ भुजाओं ने उसे दबोच लिया।उसकी चीख दबे हुए मुॅंह में घुटकर रह गई।जैसे किसी शेर की गिरफ्त में आकर मेमना का शरीर छटपटाकर सुन्न हो जाता है,

ठीक वैसी ही छटपटाहट वह महसूस कर रही थी।वह सुन्न पड़ चुकी थी।उसकी इज्जत की अर्थी निकल चुकी थी।उसके बाद बदमाश ने उसे चेतावनी देते हुए कहा -“ऐ लड़की! तुम्हारी भलाई इसी में है कि अपना मुॅंह बंद रखना। मैं कल फिर रात में तुम्हें जन्नत की सैर कराने आऊॅंगा,जरा बन -सॅंवरकर रहना!”

बदमाश की हिम्मत और शब्दों को सुनकर नमिता पाषाण की भाॅंति भावविहीन हो उठी।

उसकी ऑंखों के सामने ही उसकी मय्यत निकल चुकी थी।उसे समझते हुए जरा सी भी देर न लगी कि वह बदमाश अनाश्रम संचालिका का कामी भाई ही था।उसे समझ में नहीं आ रहा था कि अपनी फरियाद लेकर वह कहाॅं जाऍं?

अगली सुबह उसने अपनी सहेली को आपबीती सुनाई।सहेली ने उसे ही समझाते हुए कहा -“नमिता!मुॅंह बंद रखने में ही हमारी भलाई है!जल में रहकर मगर से बैर नहीं किया जाता है।हमारा कौन-सा परिवार है,जो साथ देगा? हमारी जिंदगी तो कीड़ों -मकोड़ों से भी बदतर है। हमें इसी नर्क में जीना और मरना पड़ेगा।”

नमिता को ऐसी जिंदगी जीने से मर जाना ही मंजूर था।अगली सुबह वह धुॅंधलके में चुपचाप अनाथाश्रम से निकल गई।जान देने का सोचकर निकली थी, परन्तु काफी भटकने के बाद भी जान देने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। आखिरकार थक हारकर एक पार्क के कोने में बैठकर रोने लगी।उसे अपने चारों ओर दुख का उफनता सागर नजर आ रहा था,

जिसका कहीं दूर-दूर तक कोई किनारा नजर नहीं आ रहा था।उसी समय किसी देवदूत की भाॅंति रामलाल का अपनत्व भरा स्पर्श उसके कंधे पर पड़ा। रामलाल की ओर देखते हुए उसकी उदास और निष्प्रभ ऑंखों में विषाद घनीभूत हो उठा। रामलाल ने उसे शुभचिंतक होने का विश्वास दिलाया।

रामलाल का अपनत्व पाकर उसका हृदय द्रवित हो उठा।जिस प्रकार बाॅंध ढ़ह जाने से पानी का बहाव अत्यधिक तेज हो जाता है,

उसी प्रकार रामलाल की सहानुभूति पाते ही उसके सब्र का बाॅंध ढ़ह पड़ा।उसने अपनी दुख भरी गाथा रामलाल को सुना डाली। रामलाल उसके दुख से मर्माहत हो उसे अपने घर ले आऍं।अतीत में विचरण करते-करते बच्ची को सीने से लगाए नमिता कब नींद की आगोश में चली गई,उसे पता ही नहीं चला!

अगली सुबह रामलाल की पत्नी(जिसे वह काकी कहती थी) के चिल्लाने से उसकी नींद खुल गई।काकी ने अपने पति पर चिल्लाते हुए कहा -“आपने इस घर को अनाथालय बना डाला है?जब ईश्वर ने हमें संतानें नहीं दी,तो हम दूसरों के बच्चों से क्यों प्रेम करें?आप अभी इन दोनों को मेरे घर से निकालो।”

रामलाल अपनी पत्नी की मन:स्थिति को भलीभाॅंति समझते थे।एक संतान के अभाव में बेचारी जिंदगी भर लोगों के ताने सुन-सुनकर काॅंटों की शय्या पर लोटती रही है। ममता क्या होती है,इसका उसे एहसास ही नहीं हुआ है! ममता की तड़प ने उसके हृदय को शुष्क और वात्सल्यविहीन कर दिया है।इसी कारण उसकी तबीयत भी खराब रहने लगी है।चिड़चिड़ी -सी रहने लगी है, परन्तु दिल की बुरी नहीं है।

रामलाल ने बच्ची को नमिता की गोद से ले लिया और कहा -“बेटी! पहले तुम अपनी काकी को शांत करो।हाॅं!उससे पहले मुझे कटोरे में थोड़ा -सा दूध दे‌ दो। मैं दूध पिलाने की कोशिश करता हूॅं।”

नमिता दूध की कटोरी रामलाल के हाथों में पकड़ाकर काकी की देख-भाल में लग जाती है। काकी को चाय-नाश्ता देकर दवा खिलाती है।कुछ देरी बाद मालिश करने के बाद नहला-धुलाकर आराम करने भेज देती है।काकी के कामों से फुर्सत पाकर वह दौड़कर बच्ची को अपने सीने से लगा लेती है।

एक रात में ही इस मासूम बच्ची ने उसे अपना सब दुख  भूलने पर मजबूर कर दिया है। इसी वयस में उसमें मातृत्व की भावना को अंकुरित कर दिया है। अनाथाश्रम में भी उसने कई बच्चियों की देख-भाल की थी, परन्तु इस तरह ममत्व का एहसास उसे कभी नहीं हुआ।इस मासूम बच्ची ने एक ही रात में उसे बिनब्याही माॅं बना दिया।वह वात्सल्य रस से अभिभूत हो उठी।बच्ची के रूप में उसे जीने का मकसद मिल गया।उसने कानूनन बच्ची को गोद लेने का मन बना लिया।

नमिता अब घर में ही छोटे-छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपनी और बच्ची की छोटी-मोटी जरूरतें पूरी करने लगी।वह बच्ची को हमेशा काकी की नजरों से दूर रखने की कोशिश करती।एक परिवार मिल जाने से वह काफी खुश थी।जिन रिश्तों के लिए वह जिंदगी भर तरसती रही, उन्हें पाकर वह खुद को धन्य समझने लगी।अब काकी की कड़वी बातें सुनकर भी वह आहत नहीं होती। निःस्वार्थ भाव से काकी और बच्ची की सेवा में लगी रहती।वह इन रिश्तों को ताउम्र सॅंजोए हुए रखना चाहती थी,ताकि उसकी बच्ची को कम-से-कम परिवार और रिश्तों का एहसास हो।

समय अपनी लय में गुजर रहा था।अब काकी ने बच्ची को देखकर चिल्लाना बन्द कर दिया था।एक दिन नमिता की नींद देर से खुली। सुबह-सुबह उसने जो देखा,उसे सहसा अपनी ऑंखों पर भरोसा नहीं हुआ।जो काकी बच्ची को देखते ही चिल्लाने लगती थी,वहीं काकी‌ बच्ची को गोद में लेकर चम्मच से दूध पिला रही है और ममता भरी दृष्टि से उसे एकटक निहार भी रही है।बच्ची भी हाथ-पैर फेंककर मानो काकी में सुप्त वात्सल्य भावना को जगा रही है।

रामलाल पत्नी का यह रूप देखकर गदगद हो उठे। उन्होंने पत्नी से कहा-“भाग्यवान!तुमने जिस ममत्व-भावना को सुप्त समझ लिया था,वह आज भी तुम्हारे अंदर समंदर की भाॅंति हिलोरें ले रही है!”

सचमुच काकी को अब एहसास हो चुका था कि वात्सल्य रस के एहसास से बड़ा कुछ नहीं है और नि: स्वार्थ ममता की कोई कीमत नहीं है!

नमिता ने आगे बढ़कर बच्ची को गोद में लेने की कोशिश की, परन्तु काकी ने बच्ची को सीने से लगाते हुए कहा -“इस मासूम बच्ची ने मेरी जीजीविषा बढ़ा दी है।मेरी बीमारी भी खत्म हो गई है।आज से तुम दोनों मेरी बेटियाॅं हो। दोनों की जिम्मेदारी हमारी है!”

पत्नी के इस बदलते रूप को देखकर रामलाल मन-ही-मन सोचते हैं -“सचमुच! मातृत्व में बहुत शक्ति है।इसी कारण इसे अनमोल कहा गया है, क्योंकि ममता की कोई कीमत नहीं होती है!”

काकी ने  दोनों बच्चियों को आलिंगन में भर लिया और ममता के सागर में डूबने-इतराने लगी।

समाप्त।

लेखिका -डाॅ संजु झा (स्वरचित)

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