कहते हैं कि घर तब तक घर नहीं बनता जब तक उसमें निस्वार्थ प्रेम की सांसें न गूंजें।
गाँव के आखिरी छोर पर बनी एक जर्जर मिट्टी की झोपड़ी सिर्फ एक ढहती हुई छत नहीं, बल्कि एक अटूट रिश्ते की गवाह थी। उस आंगन में नीम के पेड़ के नीचे बंधी रहती थी— “गौरी”। सफेद रंग, शांत आँखें और गले में बजती छोटी-सी घंटी। वह गणपत के लिए सिर्फ एक गाय नहीं, बल्कि उसके परिवार की रीढ़ थी।
वह परिवार के सदस्य थी उसे बहोत प्यार करता है.एक बाप और बेटी रिश्ता था. गांव वाले भी गणपत को हमेशा पूछते थे कहाँ है तुम्हारी बेटी? गौरी को पूछते थे?
हर सुबह गणपत की आँखें सबसे पहले गौरी को ढूंढतीं। वह उसके पास जाता, प्यार से उसकी पीठ थपथपाता और पूछता, “क्या रे गौरी… ठीक है ना तू?” उसके लिए चारा-पानी करने के बाद ही गणपत के घर में चाय बनती थी। गाँव वाले हंसते, “अरे गणपत, तू गाय को जानवर कम और घर की लक्ष्मी ज्यादा मानता है!
” गणपत बस मुस्कुरा देता। वह जानता था कि जब पत्नी सावित्री बीमार हुई, तो गौरी के दूध से दवा आई। जब बच्चों की फीस का संकट आया, तब भी इसी गौरी ने सहारा दिया। कई रातें ऐसी भी आईं जब घर की आखिरी रोटी गौरी को देकर गणपत और सावित्री खुद पानी पीकर सो गए।
मगर एक सुबह गौरी ने चारा छुआ तक नहीं। उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे और वह बेदम होकर बैठ रही थी। डॉक्टर ने जांचकर गंभीर आवाज में कहा, “हालत बहुत खराब है, इलाज और दवाइयां बहुत महंगी होंगी।” यह सुनते ही गणपत के पैरों तले जमीन खिसक गई; जेब में महज कुछ सौ रुपये थे। उस रात मायूसी के अंधेरे
में सावित्री ने चुपचाप अपने पैरों की चांदी की इकलौती पायल गणपत के हाथ पर रख दी और रुआंसी आवाज में बोली, “जिसने सालों-साल हमारा घर संभाला, आज उसकी जान के लिए क्या हम इतना भी नहीं कर सकते? इसे बेच दीजिए।”
अगले दिन गणपत पायल बेचकर दवाइयां ले आया। उसी रात मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। झोपड़ी की छत टपक रही थी, पर गणपत पूरी रात गौरी के पास बैठा रहा।
वह खुद भीगते हुए बोरी तानकर गौरी को बौछार से बचाता रहा और कांपते होंठों से मन्नत मांगता रहा, “तू ठीक हो जा गौरी… तेरे बिना यह घर बिखर जाएगा।”
सुबह जब बारिश थमी, तो गौरी धीरे-धीरे उठ खड़ी हुई और उसने अपना सिर गणपत के कंधे पर रख दिया। गणपत की आँखों से खुशी के आंसू बह निकले। पास खड़े छोटे बेटे ने मासूमियत से पूछा, “बाबा, आप इस गाय से इतना प्यार क्यों करते हो?”
गणपत ने बेटे को गले से लगाया और कहा, “बेटा, ममता सिर्फ इंसानों में नहीं होती। जो बिना बोले हमारा दर्द समझ ले और अपना सुख देकर हमारा घर बचाए, उसका प्यार पैसों से नहीं तोला जाता। दुनिया में हर चीज की कीमत लग सकती है, लेकिन सच्चे रिश्तों और ममता की कोई कीमत नहीं होती।”
“सच्ची ममता अनमोल है, इसके रिश्ते बाज़ार में नहीं बिकते।”
तृप्ति देव
भिलाई छत्तीसगढ़
#ममता की कोई कीमत नहीं होती