“मम्मी, ये पुरानी सिलाई मशीन कब तक संभालकर रखोगी? अब तो कोई इसका इस्तेमाल भी नहीं करता।”
संजय ने स्टोर रूम की धूल साफ़ करते हुए झुंझलाकर कहा।
नीरा मुस्कुराई, मशीन पर हाथ फेरा और बोली,
“कुछ चीज़ें सिर्फ़ सामान नहीं होतीं बेटा… उनमें किसी की पूरी ज़िंदगी सिलाई हुई होती है।”
संजय ने बात को हल्के में लिया और फिर मोबाइल में खो गया।
उसकी दुनिया सोशल मीडिया, ब्रांडेड कपड़े और दिखावे के बीच सिमट चुकी थी।
वो एक सफल डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी चलाता था। पैसे की कमी नहीं थी, मगर रिश्तों के लिए उसके पास हमेशा “टाइम नहीं” होता था।
पापा का फोन आए तो “मीटिंग में हूं…”
पुराने दोस्त मिलना चाहें तो “भाई, बहुत बिज़ी हूं…”
मां कुछ कहना चाहें तो “मम्मी प्लीज़, अभी नहीं…”
नीरा कई बार उसे समझाती,
“बेटा, पैसा कमाना अच्छी बात है, लेकिन इंसान अगर अपनों से दूर हो जाए तो वो सबसे गरीब होता है।”
मगर संजय को ये बातें पुराने ज़माने की लगती थीं।
एक दिन उसने अपने ऑफिस में नया नियम लागू किया—
“जो कर्मचारी महीने का टारगेट पूरा नहीं करेगा, उसकी सैलरी कटेगी।”
ऑफिस में सब डर गए।
उनमें एक लड़की थी—सिया।
बहुत मेहनती, मगर घर की ज़िम्मेदारियों में उलझी हुई। उसकी मां बीमार रहती थीं।
एक शाम सिया ने हिम्मत करके कहा,
“सर, दो दिन की छुट्टी चाहिए… मां अस्पताल में हैं।”
संजय लैपटॉप से नज़र हटाए बिना बोला,
“काम और इमोशन्स साथ नहीं चलते। अगर छुट्टी ली तो प्रोजेक्ट किसी और को दे दूंगा।”
सिया की आंखें भर आईं, मगर वो चुपचाप चली गई।
नीरा ने ये सब सुन लिया था।
उस रात खाने की टेबल पर उसने सिर्फ़ इतना कहा,
“जिस दिन तुम्हें अपने दर्द के लिए किसी अपने की ज़रूरत होगी न… उस दिन समझ आएगा कि इंसान मशीन नहीं होता।”
संजय ने फिर बात टाल दी।
समय बीतता गया।
एक सुबह संजय की एजेंसी पर साइबर फ्रॉड का बड़ा हमला हुआ।
क्लाइंट्स का डेटा लीक हो गया।
सोशल मीडिया पर उसकी कंपनी ट्रोल होने लगी।
जो लोग कल तक उसकी तारीफ़ करते थे, वही अब मीम बनाकर हंस रहे थे।
इन्वेस्टर्स पीछे हट गए।
दो बड़े क्लाइंट्स ने कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर दिया।
संजय पहली बार अंदर से टूट गया।
उसने अपने दोस्तों को कॉल किया।
किसी ने फोन नहीं उठाया।
कुछ ने सिर्फ़ मैसेज किया—
“भाई, अभी थोड़ा बिज़ी हूं।”
उसे अचानक अपने ही शब्द याद आए—
“अभी टाइम नहीं है…”
उस रात वो देर तक छत पर बैठा रहा।
नीचे शहर जगमगा रहा था, लेकिन उसके अंदर अंधेरा था।
तभी मां चुपचाप उसके पास आकर बैठ गईं।
हाथ में वही पुरानी सिलाई मशीन का छोटा-सा टूटा हुआ पहिया था।
“जानते हो, तुम्हारे पापा की नौकरी चली गई थी तब मैंने इसी मशीन से लोगों के कपड़े सिलकर घर चलाया था।”
नीरा बोलीं।
संजय पहली बार ध्यान से सुन रहा था।
“रात-रात भर जागती थी। कई लोग पैसे तक नहीं देते थे। लेकिन मैंने कभी किसी ज़रूरतमंद को खाली हाथ नहीं लौटाया। क्योंकि मुझे भरोसा था… इंसान जो बोता है, वही लौटकर आता है।”
“और आया?”
संजय ने धीमे से पूछा।
नीरा मुस्कुराई,
“आज भी मोहल्ले में कोई परेशानी में होता है तो सबसे पहले हमारे घर आता है। ये रिश्ते मैंने कमाए हैं बेटा… पैसों से नहीं, व्यवहार से।”
संजय की आंखें झुक गईं।
अगले दिन ऑफिस पहुंचकर उसने सबसे पहले सिया को बुलाया।
“तुम्हारी मां कैसी हैं?”
उसने पूछा।
सिया हैरान थी।
“अब ठीक हैं सर।”
संजय कुछ पल चुप रहा, फिर बोला,
“उस दिन मैंने इंसानियत से ज़्यादा काम को महत्व दिया। सॉरी।”
पूरे ऑफिस में सन्नाटा छा गया।
क्योंकि पहली बार उनके सख्त बॉस की आवाज़ में अहंकार नहीं, अपनापन था।
धीरे-धीरे उसने कंपनी का माहौल बदलना शुरू किया।
कर्मचारियों के लिए हेल्थ फंड बनाया।
हर महीने एक दिन “फैमिली डे” रखा।
और सबसे बड़ी बात—लोगों को सिर्फ़ कर्मचारी नहीं, इंसान समझना शुरू किया।
कुछ महीनों बाद उसकी कंपनी फिर संभलने लगी।
लेकिन इस बार फर्क था।
पहले ऑफिस में सिर्फ़ चमक थी…
अब दुआएं भी थीं।
एक शाम संजय ने मां से कहा,
“मम्मी, आपने सही कहा था। इंसान आखिर वही पाता है, जो वो दूसरों के लिए बोता है।”
नीरा ने मुस्कुराकर पूछा,
“तो अब क्या बोओगे?”
संजयने मां का हाथ थाम लिया।
“रिश्ते… भरोसा… और थोड़ा-सा समय अपने लोगों के लिए।”
स्टोर रूम में रखी पुरानी सिलाई मशीन आज भी वहीं थी।
फर्क बस इतना था कि अब संजय उसे कबाड़ नहीं समझता था।
क्योंकि उसे समझ आ गया था—
ज़िंदगी में हर चीज़ ऑनलाइन नहीं खरीदी जा सकती।
कुछ चीज़ें बरसों की अच्छाई से कमाई जाती हैं।
सुदर्शन सचदेवा