जो बोया, वही पाया – बिमला रावत जड़धारी

रामेश्वरी की अंतिम विदाई थी। सभी रिश्तेदार और दोनों बेटियाॅं भी पहुॅंच गयी थी। सभी कह रहें थे अच्छा हुआ मुक्ती

मिल गयी, बहुत कष्ट में थी। दोनों बेटियाॅं आपस में बोली, मम्मी ने जो बोया था वही पाया। दादी को कितना परेशान किया

था।दादा जी तो थे नहीं, दादी जी ही थी जो गाॅंव में ही रहती थी।दादी जी के एक बड़ी बेटी और तीन बेटे थे। तीनों ही

दिल्ली में नौकरी करते थे। और अपनी बहन के साथ ही रहते थे। परिवार गॉंव में ही रहता था। अभी ऐसी स्थिति नहीं थी

कि परिवार को अपने साथ रखें। रामेश्वरी सबसे बड़ी बहू थी। फिर सीता और सबसे छोटी कमला।कमला ने बोला मैं यहॉं

नहीं रहूंगी जब दिल्ली रहने का इंतजाम हो जाएगा तो बता देना मैं अभी अपने मायके जा रही हूॅं।सीता को गांव मैं रहने में

कोई आपत्ति नहीं थी। उसे खेत में काम करना अच्छा लगता था।रामेश्वरी भी गॉंव में नहीं रहना चाहती थी। उसकी दो

बेटियाॅं‌ थी। उसे अपनी बेटियों से कोई मोह नहीं था। आए दिन अपनी बेटियों को बिना बात के मारती और सास से झगड़ा

करती। एक दिन सास ने बोला मुझसे अब खेत और घर का काम नहीं होता, तुम दोनों देवरानी जेठानी आपस में काम बांट

लो।तभी सीता बोली मैं खेत का काम और भैंसो के लिए घास भी ले आऊंगी, जेठानी जी आप खाना बना दिया करो और

पानी ले आया करो।तू कौन होती है काम बताने वाली। मुझे कोई भी काम नहीं करना।बहु ऐसा करो तुम अपने और

अपनी बेटियों के लिए ही खाना बना लिया करो। अगर तुम्हें खेतों में अपना हिस्सा चाहिए तो ऐसा बोलो परन्तु लड़ाई

झगड़ा मत करो।रामेश्वरी ने अपनी सास के बाल पकड़ कर खींचे और बोली मुझे सलाह देने की जरूरत नहीं है समझी

फिर अपने बच्चों को झंझोड़ कर बोली ये सब तुम्हारी वजह से हो रहा है। अगर तुम दोनों नहीं होती तो मैं आज दिल्ली

चली गयी होती। जाओ यहाॅं से सामने पहाड़ से छलांग लगाकर मर जाओ वरना मैं ही छलांग लगा लेती हूॅं। और रामेश्वरी

बाहर की तरफ भागी। गाॅंव वाले उसे पकड़ कर ले आए।सीता बोली आप बच्चों पर गुस्सा क्यों निकाल रही हो। बच्चियाॅं

इतनी छोटी नहीं है कि कुछ समझती ना हो। एक सात साल की है और एक चार साल की है वह बहुत समझदार है। सासु

जी आप किसी के पास से जेठ जी को खबर पहुॅंचा दो कि अलग से एक कमरा ले लो और जेठानी जी को ले जाए मैं दोनों

बेटियाॅं को पाल लूंगी। कुछ महीनों बाद जेठ जी आए और अपनी पत्नी रामेश्वरी और बच्चों को दिल्ली ले गए। कमला भी

अपने पति के साथ दिल्ली चली गयी। सीता भी कभी – कभी दिल्ली चली जाती परन्तु आधिकतर वह गाॅंव में ही रहती।

सास की तबियत भी खराब रहने लगी। सीता ने गाॅंव से खबर भिजवाई की सासु जी की तबीयत खराब है उन्हें शहर के

डाॅक्टर को दिखाओ। तीनों भाई अपनी बहन के घर आऐ और बोले माॅं की तबियत ठीक नहीं है उन्हें शहर ला कर डाॅक्टर

को दिखना था पर अभी हमारे पास टाइम नहीं है। जब भी समय मिलेगा हम में से कोई भी लेने चला जाएगा। तब तक

डाॅक्टर ताऊजी से दवाई लेकर खा लेगी (जो एक वैद्य है)।तुम्हारे जीजाजी ने कल रात की बस से गाॅंव जाना है। जब वे

आएंगे तो अपने साथ माॅं जी को लेते आएंगे।;दादी को फूफा जी शहर लाते हैं और डॉक्टर को दिखाते हैं। कुछ टेस्ट करने के

बाद दादी के रसौली निकलती है । और आपेरशन करने के लिए बोलते है। पापा दादी का आपरेशन कराने के लिए तैयार हो

जाते हैं।आपरेशन के बाद दादी एक हफ्ते अस्पताल ही रहती है। जब डाॅक्टर घर ले जाने को बोलते हैं तो तीनों बेटों में से

कोई भी अपने घर ले जाने को तैयार नहीं होता। बड़ा बेटा बोलता है कि मेरी पत्नी माॅं जी की देखभाल नहीं करेगी तुम्हें तो

पता ही है माॅं जी से कितना लड़ती थी। दूसरा बेटा बोला मेरी घरवाली तो गाॅंव है मैं कैसे कर पाऊॅंगा। छोटे बेटे को किसी ने

कुछ नहीं बोला क्योंकि उसका हाथ तंग था। दादी को अस्पताल में दो दिन ओर रुकना पड़ा कोई भी अपने साथ ले जाने को

तैयार नहीं था। तीसरे दिन फूफा जी टैक्सी से अपने घर ले आए और अपने साथ ही रखा। बीच बीच में अस्पताल डाॅक्टर को

दिखने ले जाते।दो हफ्ते बाद छोटा बेटा दादी जी को अपने घर ले गया। वही दादी की सेवा करने लगा। दादी की तबीयत में

कोई सुधार नहीं हो रहा था। हालत दिन प्रतिदिन खराब होती जा रही थी। एक दिन पापा मम्मी को लेकर दादी को देखने

जाते हैं। दादी को देखकर पापा बोले माॅं की तबीयत ज्यादा ही खराब लग रही है। ऑपरेशन के बाद से तो कोई सुधार नहीं

हुआ।जेठ जी अब तो सासु जी खाना भी नहीं खा रही है। बड़ी मुश्किल से थोड़ी सी दाल पीती है।जिद्द कर रही है मुझे गॉंव

जाना है। ऐसे में इन्हें कैसे गाॅंव भेज दें।गाॅंव नहीं भेजना वहाॅं कौन देखभाल करेगा यहॉं डॉक्टर है। कुछ दिनों के लिए मैं

अपने साथ ले जाता हूॅं ।हो सकता है जगह चेंज होने से तबीयत में कुछ सुधार हो जाए। मैं टैक्सी लेकर आता हूॅं।तभी मम्मी

(रामेश्वरी) बोली थ्री व्हीलर लेकर आओ टैक्सी बहुत महंगी होगी।रामेश्वरी होश में रह कर बात किया करो। थ्री व्हीलर में

झटके लगेंगे तो उससे और ज्यादा तबीयत खराब होगी और टांके खुलने का भी डर रहेगा। म्मी वहीं पापा से लड़ने लगी।

पापा फिर थ्री व्हीलर लेने चलें गये। घर आकर दादी जी की तबीयत और ज्यादा तबीयत खराब होने लगी। दादी पीछे पड़

गई कि मुझे यहाॅं नहीं रहना मुझे गांव भेज दो। फिर पापा दादी को गाॅंव छोड़ आए फिर दादी कुछ महीने ही रह पायी।

दादी को इस दर्द से हमेशा हमेशा के लिए छुटकारा मिल गया।दादी के जाने के दो साल बाद मेरा भाई हुआ। मम्मी बहुत

खुश थी। मम्मी पहले ही हमें कुछ नहीं समझती थी। अब तो हम उनके लिए कुछ भी नहीं थे। स्कूल से आने के बाद हम दोनों

बहनों को घर का और भाई का सब काम करना पड़ता था। बारहवीं के बाद मेरी शादी हो गयी। मैं जब भी मायके आती

मम्मी कहती तुम आ गयी हो ये काम कर दो वो काम कर दो। एक मिनट भी आराम से नहीं बैठने देती। फिर छोटी की भी

बारहवीं के बाद शादी कर दी। हम दोनों बहनें जब भी एक साथ मायके आती तो गुस्सा होती एक साथ मत आया करो मुझे

परेशानी होती है। जब मेरा बेटा हुआ तो मेरा आना बंद हो गया। मैं अब व्यस्त रहने लगी। छोटी का भी जाना लगभग बंद

ही हो गया।कुछ सालों में भाई का भी काॅलेज पूरा हो कर अच्छी नौकरी लग गई। उसने अपनी पसंद की लड़की से शादी कर

ली। वह भी मम्मी की तरह बहुत तेज परंतु हमारे लिए बहुत अच्छी। हम जब भी जाते हमारे लिए किसी चीज की कोई

कमी नहीं करती। परन्तु मम्मी के साथ कभी तो बहुत अच्छी तो कभी चंडी बन जाती। भाई भी मम्मी से सीधे मुंह बात नहीं

करता। जब भाई के बच्चे हुए तो उसने मम्मी को हाथ भी नहीं लगने दिया। घर के सारे काम मम्मी से ही कराती अब पापा

मम्मी की भी उम्र हो गयी थी। एक दिन मम्मी सीढ़ी से उतर रही थी, अचानक पैर फिसलने की वजह से कोलू में लग जाती

है। पापा बेटे बहू को उन्हें डाक्टर के पास ले जाने के लिए कहते हैं।बेटा बोला कल अगर आफिस की छुट्टी मिल जाती है तो

ठीक है वरना शनिवार को चलेंगे। दूसरे दिन बहू  थ्री व्हीलर में मम्मी को डाॅक्टर के पास ले जाने लगी तो पापा ने बोला

कैब बुला लेती तो ठीक था, थ्री व्हीलर में तो मम्मी बैठ भी नहीं जाएगी।पापा जी कैसे नहीं बैठ पाएंगी। आप घर मे ही

रहो मैं लेकर जाती हूॅं। बच्चें स्कूल से आएंगे तो उन्हें खाना खिला देना और आप भी खा लेना।डॉक्टर मम्मी का एक्स रे

करता है, तो कोलू की हड्डी टूटी होती है आपेरशन के लिए बोलता है। बहू भाई से बात करके अस्पताल में भर्ती करा देती है।

और हम दोनों बहनों को फोन कर देती है। जब हम पहुंचते हैं तो मम्मी बोली मुझे मेरी करनी का फल मिल रहा है, मैंने जो

बायो वहीं पाया है।मम्मी ऐसा क्यों बोल रही हो सब ठीक हो जाएगा।तुम और छोटी घर चले जाओ मैं रात को अकेले

रह लूंगी, पापा को मत भेजना, वो कल आ जाएंगे।दूसरे दिन अस्सी साल की उम्र में मम्मी का आपरेशन हो जाता है। कुछ

दिन रह कर भाई मम्मी को घर ले आता है और कहता है आप लोग दूसरे कमरे में रहो उसके साथ बाथरूम भी है। और

कमरे से बाहर निकलने की कोई जरूरत नहीं है सब कुछ यहीं मिलेगा और अब अगर कुछ हुआ तो मैं किसी डॉक्टर के पास

नहीं ले जाऊंगा।बेटा ऐसा क्यों बोल रहा है एक ही कमरे में पूरे दिन कैसे रहेंगे।पापा सब रहा जाता है। फिर कुछ हो गया

तो।बेटा हम तेरे माॅं – बाप है, तू नहीं करेगा तो कौन करेगा।पापा तभी तो कर रहा हूॅं। अगर आप की जगह कोई और

होता तो क्यों करता आप दोनों को रहना है तो रहो वरना दोनों दीदी के यहाॅं या गाॅंव चलें जाओ।तीन साल तक ना मम्मी

कमरे से निकली ना ही भाई उस कमरे में गया। पापा कितनी बार बोलते बेटा कभी कभी अपनी मम्मी से मिल लिया करो

वह तुम्हें बहुत याद करती है।मिल लूंगा पापा मैं कौन सा बहुत दूर रहता हूॅं। जब समय मिलेगा तब मिलूंगा।बेटा समय तो

कभी नहीं आता समय निकालना पड़ता है।कल ही भाई आफिस से आ कर मम्मी से मिलने गया और पूछा तबियत ठीक है

दर्द तो नहीं हो रहा मम्मी ने बस इतना ही बोला नहीं। यही मम्मी के आखिरी शब्द थे।रात ही मम्मी ने अंतिम सांस ली

जैसे  आंखें भाई को देखने के लिए ही तरस रही थी। तीन साल बाद मम्मी घर से बाहर निकली वो भी हमेशा- हमेशा के

लिए।समाप्तधन्यवाद- बिमला रावत जड़धारी

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