*जो बोया वही पाया* – पुष्पा जोशी

‘सुजाता ओ सुजाता जरा रूकों ना’ शोभा जी ने आवाज लगाई मगर शायद सुजाता जी ने सुना नहीं। 

शोभा जी प्रात:कालीन भ्रमण करके घर लौट रही थी, आज कई दिनों के बाद, उन्हें उनकी सहेली सुजाता नजर आई और वे उसे आवाज लगा रही थी। उन्होंने अपनी चाल कुछ तेज कर दी वे सुजाता से मिलकर उसका हालचाल जानना चाहती थी। सुजाता जी के करीब पहुँच कर उन्होंने  उसके कंधे पर हाथ रखा तो उसने चौंक कर पीछे देखा,

शोभा को देखकर वह बोली कैसी हो शोभा? शोभा ने देखा कि सुजाता जी बहुत कमजोर  नजर आ रही थी। चेहरे की सारी चमक फीकी पड़  गई थी और ऑंखों के नीचे काली झांई  गहरी हो गई थी। शोभा जी ने कहा ‘मैं ठीक हूँ, और आप? बहुत दिनों के बाद दिखाई दी, कहीं बाहर गई थी क्या?

आप बहुत कमजोर नजर आ रही है।’सुजाता जी मन ही मन सोच रही थी, कहाँ जाऊँगी मैं?और कहीं ठिकाना भी तो नहीं है मेरा। वे शोभा से बोली- ‘मैं कहीं नही गई, यहीं थी, कुछ स्वास्थ ठीक नहीं था, इसलिए घूमने के लिए नहीं आ रही थी।’

बातें करते-करते शोभा का घर आ गया। वह सुजाता से बोली ‘चलो घर पर साथ में चाय पीते हैं, बहुत दिनों से साथ में चाय नहीं पी।’ सुजाता जी ने मना किया मगर शोभा जी ने बहुत मनुहार की तो रूक गई। वे बोली -‘तुम्हारी बहू नाराज तो नहीं होगी?’  ‘वह भला क्यों नाराज होगी?

वह तो हमेशा कहती हैं, मम्मी आप अपने मित्रों का सर्कल बनाओ, आपस मे मिलती जुलती रहोगी तो आपको अच्छा लगेगा। अभी तो मीरा और सीमा भी यहाँ नहीं है, अपने गॉंव गई है। सुधा के मिस्टर का भी तबादला हो गया है, आसपास में इनके सिवा मेरी उम्र का कोई है भी नहीं।

आज तुमसे मिलकर बहुत अच्छा लगा।’ दोनों ड्राइंग रूम में बैठी बातें कर रही थी। शोभा जी ने बहु को आवाज दी -‘बेटा सोनम देखो कौन आया है जल्दी से मसाले वाली चाय और कुछ नाश्ता लेकर आना।’सोनल आई उसने दोनों के पैर छूए, दोनों ने आशीर्वाद दिया।

वह बोली -‘आण्टी जी आप बहुत दिनों बाद दिखाई दिए, मम्मी जी कल आपको याद कर रहै थे।’ फिर वह नाश्ता चाय लेकर आई। सुजाता को शोभा के भाग्य पर ईर्ष्या हो रही थी। चाय नाश्ता करने के बाद वह जाने लगी तो उसके चेहरे पर उदासी के भाव नजर आ रहै थे, उसने एक ठंडी नि:श्वास ली  और बोली -‘?अच्छा शोभा अब मैं जाती हूँ।

उसकी इच्छा तो हो रही थी कि शोभा से कहै कि वह भी उसके घर आए, मगर  कह नहीं पाई, वह जानती थी अपने घर की हालत। घर जाते हुए वह सोच रही थी इन्सान जो बोता है वही काट पाता है। शोभा ने अपनी बहु को प्रेम दिया तो उसे प्रतिफल में बहू से प्रेम ही मिल रहा है।

मैंने तो अपनी बहू को कभी बहू माना ही नहीं, एक नौकरानी की तरह व्यवहार किया, खाने खेलने की उम्र थी उसकी पर मैंने उसकी भावना को कभी समझा ही नहीं। मैं किटी पार्टी में जाती, सैर सपाटा करती और वह घर पर काम करती। मैंने तो शोभा को भी समझाया था

कि बहू को माथे मत चढ़ा तुझे बाद में परेशानी होगी मगर उसने अपनी बहू को अच्छे से रखा आज उसकी बहू भी उसकी इज्जत करती है, उसका ध्यान रखती है। आज का समय बहू का है वह घर अपने हिसाब से चलाती है, जिस तरह मैं उसकी सहेलियों को घर नहीं आने देती थी,

वैसे वह भी मेरे मित्रों के घर आने पर नाराज होती है।मैंने हमारे रिश्तों मे शूल बोए है तो मुझे भी तो उन शूल की चुभन को सहना होगा। सोचते- सोचते सुजाता जी के पैर उनके घर की ओर बढ रहै थे। उनके दिमाग में बस यही विचार आ रहा था कि “हमने जो बोया है वही तो पाऐंगे।”

प्रेषक

पुष्पा जोशी

स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित

बेटियॉं डॉट इन साप्ताहिक विषय

विषय # जो बोया वही पाया

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