उम्मीदों का त्याग ।। – अंजना ठाकुर

नमिता ससुराल में कदम रखते ही एक पल के लिए ठिठक गई बिल्कुल साधारण घर लग रहा कमरे में चार कुर्सी और एक टेबल पड़ी थी साइड में एक पलंग रखा था बहु का स्वागत करने के बाद उसे अंदर कमरे में ले गए नमीता ने देखा वहां भी एक लोहे की अलमारी और एक पलंग रखा था बीच जगह में चटाई बिछी थी उस पर नमिता को बैठा दिया ।

सास ने प्यार से हाथ फेर कर कहा थोड़ी देर सुस्ता लो फिर थोड़ी रस्म करने के बाद कमरे में आराम कर लेना ।नमिता कुछ नहीं बोली उसका दिमाग खराब हो गया था पिताजी ने तो कहा था अच्छा परिवार है लड़का भी अच्छा कमाता है पर ये तो मायके से भी गया गुजरा है।

नमिता का मायका बहुत साधारण था कुछ चीज खरीदने से पहले महीनों इंतजार करना पड़ता घर में उस से छोटी दो बहनें और फिर एक भाई पिताजी अकेले कमाने वाले  थे बच्चों की पढ़ाई और घर खर्च के बाद मुश्किल से ही कुछ बचता जिस से कभी किसी की जरूरत पूरी होती ।

नमिता  की शुरू से चाह थी उसे एक अच्छी ससुराल मिले जिस से वो अपनी खुशियां ससुराल में पूरी कर सके ।जब  अमित का रिश्ता आया तो  फोटो देखकर पसंद आ गया और जब पिताजी ने कहा परिवार अच्छा है लड़का भी अच्छा कमाता है तो नमिता को लगा उसकी उम्मीदें पूरी हो जाएगी ।पर उसके तो सपने अधूरे रह गए अब नमिता आगे की सोच कर चिढ़ गई

थोड़ी देर बाद कमरे मै आराम करने आई तो उसे बहुत गुस्सा आ रहा था उसने कमरा बंद कर लिया और रोने लगी ।

रात को अमित कमरे में आया और बात करने लगा तो नमिता ने ढंग से बात नहीं करी और थकान का बहाना करके सो गई ।उसका मन कर रहा था कि यहां से भाग जाए पर माता – पिता के बारे में सोच कर रह गई ।

कहते है जब हम जो चाहते है वो नहीं मिले तो सब बेमानी लगता है यही नमिता के साथ हो रहा था अमित और ससुराल में सास, ननद, देवर ,ससुर सब बहुत ख्याल रखते पर नमिता खींची  खींची रहती ।शुरू में सबको लगा नया माहौल है पर काफी दिनों बाद भी बही हाल ।अमित की कमाई घर की जिम्मेदारी में खर्च हो रही थी भाई ,बहन की पढ़ाई फिर शादी सब जिम्मेदारी पूरी करनी थी ।

अमित कहीं घूमने जाने की कहता तो मना कर देती क्योंकि उसका तो सपना था कार में अपने पति के साथ घूमे अच्छी अच्छी ड्रेस पहने। कहीं हिल स्टेशन घूमने जाए ।धीरे धीरे अमित को नमिता की बातों से समझ आ गया कि वो उस से खुश नहीं है तो उसने भी दूरी बना ली घर में माहौल अजीब हो गया।

एक दिन नमिता की सहेली उससे मिलने आई उसने नमिता को छेड़ते हुए कहा शादी के मजे खत्म हुए कि नहीं तुम्हें तो हमारे लिए वक्त ही नहीं है ।नमिता चिढ़ कर बोली अरे क्या मजे मेरी तो उम्मीदें ही टूट गई और नमिता ने पूरी कहानी बता दी ।

सुनकर सहेली बोली तू पागल हो गई है उम्मीद करना अच्छी बात है पर अगर वो पूरी नहीं हो तो ऐसी उम्मीद का त्याग कर देना चाहिए ये तुम दोनों और परिवार की खुशी का सवाल है अभी तो रिश्ते की शुरुआत हुई है और अमित और उसके घरवाले तुझे कितना प्यार करते ही तू पैसों के चक्कर में प्यार का महत्व खो रही और तू तो बचपन से ऐसे माहौल में रही है

माना हम बेहतर की उम्मीद करते है तो कल अमित की जिम्मेदारी खत्म हो जाएगी तो सुविधाएं बढ़ेगी और तू भी नाराज होने की जगह हाथ  बंटा सकती है आय बढ़ाने में।

उसकी बाते सुनकर नमिता को अहसास हुआ वो सही कह रही है उसे अपने ऊपर ग्लानि हुई कि उसने सबका दिल दुखाया पर अब ऐसा नहीं करेगी ऐसी उम्मीद का त्याग कर के जो है उसमें खुश रहने की कोशिश करेगी और सबको खुश रखेगी उसने सहेली को कस कर गले लगाया और दिल से धन्यवाद कहा ।

उसके जाने के बाद सास के पास आई बोली आज में खाना बनाऊंगी बताओ सबको क्या पसंद है सासू जी गौर से देखने लगी तब तक अमित भी आ गया उसने अपने व्यवहार के लिए सबसे माफ़ी मांगी और अमित से बोली हम सब खाने के बाद आइसक्रीम खाने चलेंगे ।

रात मै अमित से ढेर सारी बातें हुई नमिता का मन हल्का हो गया और दूसरे दिन उम्मीदों का नया सवेरा हुआ जिसमें खुशियां और प्यार था ।

उम्मीद करना अच्छी बात है और हम और बेहतर की उम्मीद ही करते है लेकिन अगर बेहतर ना मिले तो जो अच्छा  मिल रहा है उसको भी खो देना समझदारी नहीं है जो मिल रहा उसमें खुश रहे ।।ऐसी उम्मीदों का त्याग करें जो आज की खुशी छीन रही हो ।आप सबके क्या विचार है प्रतिक्रिया अवश्य दें ।

स्वरचित

अंजना ठाकुर

कहानी प्रतियोगिता – ,उम्मीदों का नया सवेरा 

error: Content is protected !!