जया जब से शादी करके ससुराल गई थी,ससुर को हमेशा शांत और अनुशासित ही देखा था।नौकरी से रिटायर होने के बाद भी, हर सुबह ठीक नौ बजे प्रेस किए कपड़े पहने घूमने निकल जाते थे।
अपने पुराने दोस्तों के साथ मिलकर चाय पीना उनकी दिनचर्या में शामिल था।जया को जब भी कुछ खाने का मन करता, तो उन्हीं से कहती।क्या मजाल कि वो कभी कुछ लाना भूले हों।
एक दिन अपना पास बुक निकाल कर सासू मां को दिखाकर कहते सुना था जया ने”बीना, अब मेरा बैंक बैलेंस ज्यादा नहीं बचा।छोटी बेटी की शादी के लिए जो फिक्स डिपॉजिट किया है, वही संबल है।चालू खाते में ज्यादा कुछ है नहीं।सुनीता(बड़ी बेटी)की डिलीवरी भी होगी, कुछ महीनों में।बेटे (अमित)से कुछ मांगने में शर्मिंदगी महसूस होती है।”
जया को बहुत बुरा लगा था तब।अमित से कहा था उसने उसी दिन”बाबा को हर महीने कुछ रुपये क्यों नहीं देते आप?घर के लिए कुछ ना कुछ लाते रहते हैं।रिटायर हो चुके हैं।
आपको समझना चाहिए कि वो आपसे ख़ुद कुछ नहीं मांगेंगे।” अमित ने चिढ़कर कहा था”तुम जानती ही कहां हो बाबा को।कभी मुझसे पैसे नहीं लेंगे वो।उनके सामने ज्यादा जोर देकर बोलने का भी साहस नहीं है मुझमें।इतना स्वाभिमान भी नहीं रखना चाहिए बड़ों को।
अरे,मैं तो बेटा हूं उनका,मेरी बात मानते ही नहीं कभी।बहन अपने पति के साथ जब भी आती है,ख़ुद ही जाकर सब सामान पहले से खरीद लाते हैं।मुझे बताने की जरूरत भी नहीं समझते।तुमने देखा है ना , हमारी ज्यादा बात नहीं होती।छोटी के माध्यम से ही थोड़ी बहुत बात हो जाती है।
और हां , तुम सुन लो कान खोलकर।अच्छी बहू बनने के चक्कर में, उन्हें पैसे मत देने जाना कभी।वो कभी माफ नहीं करेंगे तुम्हें।”
जया का बाबा के प्रति सम्मान और बढ़ गया।उसने अपने पिता को बचपन में ही खो दिया था।वह खुद भी नौकरी करके अपने परिवार को संभाल चुकी थी।मायके में परिवार या बाहर वाले इसी बात का ताना मारते थे कि स्वाभिमान को घोलकर पी लेने से पेट नहीं भरता।जया के लिए परंतु यही सबसे बड़ी ताकत थी,
जो उसे हर नई चुनौती का सामना करने का साहस भी देती थी और जीत भी।बाबा को देखकर उसे एक नई ऊर्जा मिलती।हर महीने बाबा को पैसे देने का नया तरीका ढूंढ़ ही लिया था उसने।अमित की तनख्वाह मिलते ही, उनके पर्स में चुपचाप रुपए रख देती।
रोज सुबह जब बाबा तैयार होकर निकलने को होते, तब बड़े अधिकार से कुछ लाने की लिस्ट बता देती।बाबा बहुत खुश होते थे।दोनों बेटियों से जैसे वो खुलकर बात करते थे,
अब जया भी तीसरी बेटी बन गई थी उनकी। पर्स में रखें पैसे पहली बार देखकर तो दहाड़े ही थे उस दिन” ये रुपए यहां कैसे आए खुकू (छोटी)?तेरे दादा ने रखे हैं क्या? मैं अभी इतना गया गुजरा नहीं हो गया हूं, कि बेटे के पैसे लूं।”
छोटी ने तब कोहनी मारकर भाभी को आगे कर दिया।जया ने आंखें दिखाकर गुस्से से कहा था”क्यों, बेटा नहीं रख सकती, तो बेटी तो रख सकती है ना।” उन्होंने तपाक से कहा”वो कहां से देगी? वो क्या कमाती है?
वो नहीं कमाती तो क्या हुआ,दादा तो कमाता है।आपका बेटा अपने परिवार के लिए कमाता है ना,तो उनकी कमाई में सबका हिस्सा होगा।जैसे आपकी कमाई में आप करते थे।सब को देते थे ना पैसे?तो अब आपका बेटे ने फैसला लिया है कि घर के सभी सदस्यों को तनख्वाह मिलते ही रुपये दे दिया करेंगें।मां को,मुझे,और छोटी को भी दिया है।
आप तो लेंगे नहीं ,छोटे हो जाएंगे,बेटे से रुपए लेने में।तो हम सबने अपने हिस्से से आपका हिस्सा बना दिया।जब पैसे नहीं रहेंगे तो,मूंगफली,गुड़ के सेव,हमारी उबली बैर कैसे ला पाएंगे आप।सुबह नौ बजे तो बेटा आपका ड्यूटी चला जाता है, तब अगर हमें जलेबी खाने का मन हो तो आप ही ना लाएंगे।”,
बहू की बात समझकर मुस्कुराए बाबा और खुकू(छोटी)से कहा” बड़ी जिद्दी है तेरी भाभी।स्कूल टीचर हैं ना,अपनी बात मनवा कर ही दम लेती है।तेरी मां की किस्मत बहुत अच्छी निकली रे कि ऐसी समझदार बहू मिली उसे।
अब यह क्रम आरंभ हो चुका था।पाकेट में पैसे रहने से, गिर जाओ,चोटिल हो जाओ तब भी दर्द का अहसास नहीं होता, अगर जेब में पैसे हों तो कोई मुश्किल, मुश्किल नहीं लगती।ये कहावत परम पूज्य बाबा की थी।और( जया)मैं थी उनकी सबसे बड़ी प्रशंसक।सारा दिन मैं उनके हर काम खुश होकर करती।
पता भी नहीं चला कि कब बाबा अपने अमित के बेटे और बेटी के दादा बन गए।सूद का मोह ज्यादा होता है, यह कहावत सिर्फ कर्ज देने वालों के ऊपर लागू नहीं होता बल्कि, एक दादा -दादी , नाना-नानी के ऊपर भी लागू होता है।अब बच्चों के बाल, जो दस रुपए में कट जाते थे, सौ चाहिए होते थे
उन्हें।कोई और समझ पाए या ना समझे, जया उस दिन एक सौ का नोट पहले ही जेब में रख देती।दोनों को नाई की दुकान तक जाने में मात्र पांच मिनट की दूरी थी।
पर वो जाते अपने चंगू-मंगू के साथ ऑटो में।बाल कटवाने से पहले मिठाई की एक प्रसिद्ध दुकान में दोनों बच्चों को बिठाकर भरपूर मिठाई(गले तक)खिलाते।फिर केश करतन में जाना होता। लौटते हुए कोल्ड ड्रिंक्स साथ लाना कभी नहीं भूलते।आज की तारीख में शायद तब उनकी ट्रीट हो जाया करती थी।
अपने कपड़े खुद धोते,साथ में बच्चों के कपड़े अच्छे से चमका देते थे वे।ऐसे ही थें वे।उनका चेहरा हमेशा धधकता रहता था ,उनकी आत्मिक शक्ति से।कभी हार नहीं मानी उन्होंने।सेना से एक पैर खो गया तो,रिटायर कर दिए गए।नकली पैर लगाकर नौकरी की सरकारी कोल माइंस में,वेल्डर बेस्ट थे वो।
फिर खुद की शादी,बच्चों को पैदा करने की जिम्मेदारी उठाई।उन्हें पढ़ाया -लिखाया।अब दो बच्चों की तो शादी हो गई थी,एक छोटी बेटी बची थी।अब उसी के सिलसिले में सब साथ बैठकर एक रूपरेखा बनाना चाहते थे।
जबरदस्ती अमित को भी बैठा दिया जया ने उस खास मीटिंग में।बातचीत के बाद सुझाव दिया गया सासू मां की तरफ से कि” शादी भोपाल में ही जाकर देंगे।लड़के वालों का घर है भोपाल में।
हमारी सुनीता का घर भी है बड़ा बंगला।दामाद जी की बुद्धि अमित से लाख गुना ज्यादा है।दाम में कभी भी करवा पाएंगें और शान से शादी भी करवा पाएंगे सिर्फ ये ही।”
सास की बात सुनकर बाबा गंभीर हो गए।फोन पर दामाद से बात की, तो दामाद बेटी को लेकर तुरंत पहुंच आएं।लेन-देन की लिस्ट देखकर पहले तो बिगड़े”, कि इतना दहेज कौन देता है।अच्छी संस्कारी लड़की दे रहें हैं।इससे ज्यादा और क्या चाहिए उन्हें।।फिर भी हम तो अपनी लाड़ली को सब देंगे।
आप चिंता मत करिए बाबा,मैं हूं ना।आप सब मुझ पर छोड़ दीजिए।मैं छोटी की ऐसी ग्रैंड शादी करवाऊंगा, कि सब देखते रह जाएंगे।
और तो और गहनों में भी नुस्ख निकालकर ,ख़ुद गहने देने की बात भी कही।” कस्टम विभाग में थे ,तो स्वाभाविक है कि रुतबा बहुत बड़ा था।
मां तो फूली नहीं समा रहीं थीं।बड़ी बेटी और दामाद इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभाल रहें हैं,ये हमारे पिछले जन्म के पुण्य हैं।शादी की रस्में शुरू हो चुकी थीं, काफी देर बाद बड़े दामाद पंहुचे घर।जिन -जिन चीजों को देने का वादा किया था,
एक भी हांथ में नहीं थीं।अब शहर उनका, घर उनका।बाबा या अमित के लिए तो सब नया था।ना किसी से जान , ना पहचान।सभी पछता रहे थे, भोपाल में आकर शादी नहीं करनी थी।
छोटी के जिन गहनों को लाने की बात कही गई थी,एक भी उपलब्ध नहीं था।तब जया अमित के साथ जाकर अपने गहने बेच कर नए ले आई।अमित से कह भी दिया था कि गहने बेचने की बात बाबा को ना बताए कभी।छोटी की शादी अच्छे से हो जाए बस।
बारात पहुंचते ही बड़े दामाद नौ दो ग्यारह हो गए।कुक को भी उन्होंने तय किया था।खाना बनाते समय सारे अनाज,मेवे,देखकर जया को खटका लगा तुरंत।बैंक अप तो रखना पड़ेगा।बारातियों को खाना परोसा जा रहा था,पर घराती भी थे बहुत।बड़े दामाद ने सिर्फ बारातियों के लिए अच्छे आइटम बनवाए थे,और कॉलोनी वालों,जान पहचान वालों,जो उतनी दूर से हमारी बेटी की खुशी में शामिल होने आए थे,अति साधारण खाना।बाबा को किसी और ने शायद बत दिया था ।बिना आपा खोए, सीधे-सीधे कुक को कहलवा दिया कि खाना एक जैसा ही बनेगा।।थोड़ी देर बाद खबर आई कि कुक को दूसरी शादी अटैंड करने जाना है।खाना अब और नहीं बना पाएगा।बाबा तो सिर पर हांथ रखकर बैठे और रोने लगे।इतने सशक्त(मानसिक)इंसान को पहली बार इतना कमजोर देखा था।अमित,जया ,कालोनी के पुरुष और महिलाएं मिलकर मोर्चा खोल दिया।दो घंटे के अंदर पूरा खाना दोबारा बन गया।बाबा ने पहली बार अमित को गले लगाया था उस दिन।जया की तारीफ में कुछ कहा नहीं उन्होंने, बस सिर पर हांथ रखकर आशीर्वाद दिया।
जैसे -तैसे विवाह संपन्न हुआ।अब लेन-देन को लेकर दोनों पक्षों में थोड़ा विवाद होने लगा।शायद कैश और मांग रहे थे लड़के वाले।
बाबा ने जया को बुलाया और कहा”अब एक ही रास्ता है,तुम अमित से कहो भास्कर(दामाद)से पैसे ले ले।बाजार से लेने में ब्याज बहुत देना पड़ेगा।हम हर महीने थोड़ा थोड़ा करके पूरा कर्जा चुका देंगें।”
जया को भी यही उचित लगा।दौड़कर गई और अमित के कानों में बाबा की कही बात सुनाई।अमित बिना आना कानी के बहन और बहनोई से अकेले में बात करने लगा।जया ,बाबा के साथ थोड़ा दूर खड़ी थी।थोड़ी देर बाद ही विदाई का मुहूर्त था।उसके पहले व्यवस्था तो करनी होगी।तभी अमित मायूस होकर आए और बाबा से बोले”उनके पास नहीं है कैश ।सब शेयर में फंसा है।इस वक्त तो शेयर बेचना बेवकूफी होगी।सुनीता बहुत रो रही थी बाबा।हमारी सबसे बड़ी मजबूरी यह है कि हम यहां किसी को नहीं जानते।”
बाबा ने चुप रहकर अमित की बात सुनी।तुरंत ऑटो बुलवाया और चलने के लिए तैयार होने लगे।जया भी साथ में जाने की जिद करने लगी।तो उसे भी ले लिया साथ।एक बड़े से पॉश एरिया में महलनुमा इमारत के सामने गाड़ी रुकी।गाड़ी बाबा के मित्र ने ही भिजवाई।उनसे जया का परिचय करवाकर कहा”यहां मैं शादी करने का सोचकर ही गलती किया।किसी को जानता नहीं,कि पैसे ब्याज में ही ले लूं” उस आदमी ने शायद पहले से तय रकम लाकर बाबा के हांथ में देकर कहा “दादा आपकी बेटी , मेरी बेटी है।मेरे निकम्मे बेटे को अपने हाथों से आपने काम करना सिखाया है।आज यहां सबसे बड़ा गैराज हमारा है।यह सब आपकी लगन और मेहनत का नतीजा है।जाइये बेटी को खुशी -खुशी विदा करिए।जब आपके पास हों तब वापिस करिएगा दादा।”
बाबा की आंखों से झर-झर आंसू गिरने लगे।एक दोस्त के लिए दूसरे दोस्त का सम्मान बच पाया आज।
विदा हो गई छोटी।अमित के पास छुटृटी नहीं बची थी अब।तो तय यह हुआ कि मां-बाबा कुछ दिन यहीं सुनीता के घर रुकेंगे।छोटी पगफेरे में यहीं आ जाएगी।तब तक सुनीता की डिलीवरी का समय भी हो जाएगा।तो मां का रुकना तो जरूरी था।
अमित ,जया बच्चों के साथ आ गए।आते हुए उन स्वाभिमानी पुरुष की जेब में रुपये रखना नहीं भूली थी जया।प्रमाम करके स्टेशन जाने लगी तब बाबा ने कहा” तुम्हारी मां के मोह में रहना पड़ रहा है,वरना मैं साथ ही चलता बहू मां।तुम ताला लगा दिया करना दरवाजे पर समय से।ये तो अब खदान से घर आए ठीक ही नहीं।”
जया ने अलग से एकमुश्त रकम,जो वह डिलीवरी के लिए अलग से बचाकर रखी थी कबसे,बाबा के हाथों में लिया और बोली”लड़का या लड़की जो भी हो।तुम और मां पास में ही सुनार की दुकान में जाकर चांदी का कुछ खरीदना पहले,फिर मुंह देखना।मुंहझूठन के समय तो हम सोना दे ही देंगें।सुनीता के लड्डू भी बनवा लेना।”
रोती आंखों से उन्होंने अपने पोते-पोतियों को विदा किया।एक महीने बाद जून में अमित आकर ले जाएंगे,ऐसा तय हुआ।क्योंकि मई की गर्मी भयानक थी।
भारी मन से जया ,पति और बच्चों के साथ घर पहुंची।अभी एक हफ्ता भी नहीं बीता था,कि लैंडलाइन में ननदोई ने साले को खबर दी” मां-बाबा अब यहां रहना नहीं चाहते।परसों रिजर्वेशन करवाया है।स्टेशन में आ जायेगा।”खबर सुनते ही जया का माथा ठनका, गर्मी और ताप से भागने वाले बाबा नौ तपे के बीच में क्यों आ रहें हैं भला?पर किया भी क्या जा सकता था।
स्टेशन पर जया ही गई थी।अमित को माइंस से निकलने ही नहीं मिला।जया से नजरें चुरा रहे थे बाबा।घर आकर गुस्से में ही पूछा जया ने” इतनी हड़बड़ी क्यों करने लगे आप लोग?हम में से कोई ना कोई तो जाता ना वहां आप लोगों को लाने।इतना भी सब्र नहीं कर पाए आप लोग।”
मां भरी बैठी थीं,छूटते ही बोली “अरे,ये आदमी कभी किसी की बात सुनते हैं।अभी सुनीता का बच्चा छोटा है।दो महीने रहकर सेवा करने का मन था,पर तुम्हारे बाबा आने की जिद पकड़ लिए।”
जया चुपचाप सुनती रही।तभी बाबा ने पूछा” अमित कब तक आएगा?”जया ने बताया कि रात हो जाएगी।निश्चिंत होकर तब उन्होंने कहा” देख बेटा तू अमित या खुकू को कुछ मत बताना।मैंने जब दामाद जी से(भास्कर)पैसे मांगे, उन्होंने कहा था नहीं है।मैं मान भी गया था।अरे नहीं होते कैश ऐसे ऑफिसर्स के पास।दो दिन पहले ही मैंने सुनीता और भास्कर की बात सुनी।हमारे वहां जाने से पहले(खुकू की शादी से पहले)ही उन लोगों ने सारा कैश बैंक में जमा करवा दिया था।उन्हें यही डर था कि हम मांग लेंगे।कुक को भी हमसे जो दाम लिया,उससे कम दाम पर रखा था,तभी वो चला गया।इतना झूठ और फरेब अपनी औलाद करेगी,सपने में भी नहीं सोचा था।अभी मैं जिंदा हूं,और मुझसे मेरा स्वाभिमान छीनकर मुझे मारना चाहते हैं ।तुम्हारी मां अपनी ममता की आंधी में अंधी हो जाती हैं,उन्हें मान -अपमान का भास ही नहीं होता।
मैंने सदा तीनों बच्चों को जी भर कर खिलाया,घुमाया।जिस चीज पर हांथ रख देतें ,तुरंत दिलवाया। समय-समय पर सुनीता के पति की भी मदद की।फिर आज मेरी सहायता करने से उन्हें संकोच क्यों हो रहा।मुझे क्या भिखारी समझ लिया।
पिता कंधे पर बच्चों को उठाए झुके रह सकता है,पर बेटा या बेटी के द्वारा झूठ का सहारा लेकर तिरिस्कार करना मुझसे सहन नहीं हुआ।अब जीते जी उनके घर में कभी नहीं जाऊंगा।मेरी ही बेटी की शादी में,मुझसे पूरा पैसा लेकर आधा मजदूरों को दिया।
“अब बहू एक वादा करेगी मुझसे”उनकी लाचारी देख जया भी सहम गई।
“मुझे अब कभी इस घर से दूर कहीं मत भेजना।मैं जी नहीं पाऊंगा। पिता का स्वाभिमान मारने की कोशिश करेंगे तो , अपने बाबा को ही खो देंगे सब।
शुभ्रा बैनर्जी
साप्ताहिक कहानी-पिता का स्वाभिमान