कुछ संतानें पिता के स्वाभिमान को अपने कर्मों से आसमान की ऊॅॅंचाईयों तक पहुॅंचा देखतीं हैं और कुछ संतानें ऐसी भी होती हैं,
जिनके कारण पिता का स्वाभिमान खंड-खंड होकर बिखर जाता है। पौराणिक कथा का अष्टावक्र ऐसा ही पात्र हैं, आरंभ में जिसके आचरण के कारण उसके पिता कहोड़ ऋषि के स्वाभिमान को ठेस पहुॅंची थी, परन्तु एक दिन उसी पुत्र अष्टावक्र ने अपने पिता को शास्त्रार्थ में हारने से बचाकर उनके स्वाभिमान की रक्षा की थी।
अष्टावक्र परम विशुद्ध सत्यवादी ज्ञानी थे, उन्होंने सत्य के शुद्धतम रूप की व्याख्या अपने ढ़ंग से की,जो उन्हें अन्य पंडितों, ज्ञानियों से भिन्न श्रेणी में स्थापित करता है।
इन्होंने सत्य के मर्म को अपने तरीके से महसूस किया।ये किसी परंपरा या वाद से नहीं जुड़े थे,इस कारण उन्हें वैसी प्रसिद्धि नहीं प्राप्त हुई,जिसके वे हकदार थे। उनके जीवन का दुर्भाग्य था कि जब वे गर्भ में थे,उसी समय पिता कहोड़ ऋषि द्वारा अभिशप्त हो गए थे।
अष्टावक्र मिथिला नरेश राजा जनक जी के समकालीन थे।राजा जनक एक न्यायप्रिय और धार्मिक राजा थे।उनके राज्य में प्रजा सभी तरह से सुखी थी।चहुॅंओर धार्मिक वातावरण था। प्रत्येक जगह ऋषि -मुनि,ज्ञानी-जन स्वेच्छा से वेद-पाठ और अनुष्ठान करते रहते थे।
राजा जनक जी के राज्य में उद्दालक नाम के ऋषि रहते थे।वे बहुत सारे शिष्यों को धर्म-कर्म और ज्ञान की शिक्षा देते थे।उनके शिष्यों में कहोड़ नाम का एक शिष्य था,
जो उद्दालक ऋषि को अत्यंत प्रिय था। उद्दालक ऋषि ने अपने प्रिय शिष्य कहोड़ को संपूर्ण वेदों का ज्ञान दिया था।कहोड़ की शिक्षा समाप्त होने पर उद्दालक ऋषि ने अपनी सर्वगुण संपन्न पुत्री सुजाता का ब्याह उससे कर दिया।
शादी के बाद सुजाता अपने पति के साथ सुखपूर्वक रहने लगी। ईश्वर की कृपा से कुछ दिनों बाद सुजाता गर्भवती हो गई। ऋषि कहोड़ रोज स्नान -ध्यान कर पूजा और वेद पाठ करते थे।
एक दिन जब ऋषि कहोड़ वेद पाठ कर रहें थे,उसी समय गर्भ से ही बालक ने पिता को ग़लत वेद पाठ करने के लिए टोकते हुए कहा -“ज्ञान तो खुद मनुष्य के अंदर होता है। ज्ञान शास्त्रों में न होकर स्वंय में होता है। शास्त्र तो केवल शब्दों का संग्रह मात्र है,उसे सत्य के द्वारा जाना जा सकता है!”
पुत्र के वेद पाठ के बीच में व्यवधान करने से कहोड़ ऋषि बहुत क्रोधित हो गए।क्रोध में उन्हें अपने पुत्र का भी ख्याल नहीं आया। पुत्र को गुस्से में शाप देते हुए उन्होंने कहा -“जो पुत्र गर्भ से ही पिता के स्वाभिमान को ठेस पहुॅंचाता है,वह पुत्र जन्म से ही आठ जगहों से टेढ़ा हो जाएगा।”
इस तरह पिता से शापित होने के कारण अष्टावक्र का शरीर आठ जगहों से टेढ़ा हो गया।प्रतीत होता है कि महाभारत पात्र अभिमन्यु की तरह अष्टावक्र गर्भ से ही महाज्ञानी था।पिता कहोड़ ने अपने स्वाभिमान में आकर छोटी-सी गलती पर पुत्र को शापित कर दिया, परन्तु पुत्र अष्टावक्र सदैव पितृभक्त ही बना रहा।
मिथिला नरेश जनक जी के दरबार में महान ज्ञानियों और पंडितों के बीच शास्त्रार्थ चलते रहते थे।एक बार राजा जनक जी के दरबार में विशाल शास्त्रार्थ सम्मेलन का आयोजन किया गया।देश के सारे प्रकांड पंडितों और विद्वजनों को शास्त्रार्थ हेतु आमंत्रण भेजा गया,चूॅंकि अष्टावक्र के पिता कहोड़ भी प्रकांड पंडित और महान शास्त्रज्ञ थे,इस कारण उन्हें विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। मिथिला नरेश जनक जी ने शास्त्रार्थ में एक हजार गायें,जिनकी सींगें स्वर्णजड़ित थीं और गले में हीरे-जवाहरात थे,विजेता के लिए घोषित कर दिया।
मिथिला नरेश जनक जी के दरबार में शास्त्रार्थ में भाग लेने देश के बड़े -बड़े विद्वान और पंडित शामिल हुए। विद्वजनों के बीच शास्त्रार्थ चलने लगें। मुख्य शास्त्रार्थ ऋषि कहोड़ और ऋषि बंदी के बीच चल रहा था।सभी ज्ञानियों से जीतने के बाद शास्त्रार्थ के अंतिम चरण में पहुॅंचते-पहुॅंचते ऋषि कहोड़ ऋषि बंदी से हारने लगें।उस समय बालक अष्टावक्र मात्र बारह वर्ष का था और अपने मित्रों के साथ खेल रहा था।पिता के हारने की खबर सुनकर वह तुरंत आयोजन स्थल पर पहुॅंच गया।वहाॅं द्वारपाल ने उसे रोकते हुए कहा -“वत्स!यह आयोजन बच्चों के लिए नहीं,बड़ों के लिए हो रहा है!”
प्रत्युत्तर देते हुए अष्टावक्र ने कहा -“अवस्था अधिक होने से कोई बड़ा नहीं होता है,जिसे वेदों का ज्ञान हो और बुद्धि में तेज हो,वहीं बड़ा होता है!”
बालक अष्टावक्र की वाक्पटुता से उसे राजा जनक जी के दरबार में प्रवेश मिल जाता है।बालक अष्टावक्र के प्रवेश करते ही सभी पंडित,ज्ञानीजन समेत राजा भी उसे देखकर हॅंसने लगते हैं।उनलोगों को हॅंसते हुए देखकर अष्टावक्र पूछता है -“सुधिजन!आपलोग मुझ पर हॅंस रहें हैं या मुझे बनानेवाले विधाता पर?जिस प्रकार मंदिर टेढ़ा होने से आकाश टेढ़ा नहीं हो जाता,उसी प्रकार मेरा शरीर टेढ़ा है, परन्तु मेरे भीतर जो बसा है वो टेढ़ा नहीं है।”
बालक अष्टावक्र का जवाब सुनकर सभी विद्वजनों में शान्ति जा गई।राजा जनक भी अपराध-बोध से भर गए।राजा जनक जी के जीवन की यह बहुत मार्मिक घटना थी।बालक अष्टावक्र को बंदी ऋषि से शास्त्रार्थ करने की अनुमति मिल जाती है।राजा जनक जी शास्त्रार्थ से पहले कुछ सवालों द्वारा बालक अष्टावक्र की परीक्षा लेते हैं ।
राजा जनक जी पहला सवाल पूछते हैं -“सुप्तावस्था में भी कौन अपनी ऑंखें बंद नहीं रखता है?”
अष्टावक्र जवाब देते हुए कहता है -“सुप्तावस्था में मछली अपनी ऑंखें बंद नहीं रखतीं हैं!”
राजा जनक जी का दूसरा सवाल -“जन्म लेने के उपरांत भी चलने में कौन असमर्थ रहता है?”
अष्टावक्र ने जवाब देते हुए कहा -“जन्म लेने के उपरांत अंडा चलने में असमर्थ रहता है!”
राजा जनक जी का तीसरा सवाल -“कौन हृदयविहीन होता है?”
अष्टावक्र जवाब देते हुए कहता है -“पत्थर हृदयविहीन होता है!”
राजा जनक जी ने चौथा सवाल पूछा -“वेग से बढ़नेवाला कौन होता है?”
अष्टावक्र ने जवाब देते हुए कहा -“वेग से बढ़नेवाली नदी होती है!”
उपर्युक्त ढ़ंग से परीक्षा लेते हुए राजा जनक जी ने अष्टावक्र से अनेकों सवाल पूछे और उसके जवाब से प्रसन्न होकर उन्होंने ऋषि बंदी से शास्त्रार्थ करने की अनुमति दे दी।
शास्त्रार्थ में अष्टावक्र की विद्वता के समक्ष ऋषि बंदी टिक न सकें और हार गए।अब अष्टावक्र ने अपने पिता के स्वाभिमान की रक्षा के लिए बंदी ऋषि को सजा देने की माॅंग की।बंदी ऋषि ने हार मानते हुए अपने पिता वरुण देव की कृपा से पूर्व में सजा पाए हुए सभी ब्राह्मणों को सभा में उपस्थित कर दिया।सभी ब्राह्मण अष्टावक्र के कारण अपनी सजा से मुक्त हो गए।
अष्टावक्र के पिता कहोड़ ऋषि अपने स्वाभिमान की रक्षा और अपने पुत्र की विद्वता से काफी प्रसन्न हुए।कहोड़ ऋषि ने कहा -“वत्स! गर्भकाल में ही मैंने तुम्हें शापित किया था, परन्तु फिर भी तुमने आज मेरे स्वाभिमान की रक्षा की। तुम्हारे जैसा पुत्र पाकर मैं धन्य हो गया!”
पिता-पुत्र दोनों एक-दूसरे के गले लग गए। प्रायश्चित स्वरूप पिता कहोड़ ने पुत्र को शापमुक्ति के लिए समगंगा में स्नान करने की सलाह दी। समगंगा में स्नान करते ही ऋषि अष्टावक्र के सारे अंग सीधे हो गए।इस प्रकार पिता ने पुत्र को शाप से मुक्ति दिलाई और पुत्र ने पिता के स्वाभिमान की लाज बचाई।
मिथिला नरेश जनक जी बालक अष्टावक्र की विद्वता से रात भर अचंभित रहें।दूसरे दिन जब राजा जनक घूमने निकले तो बालक अष्टावक्र उन्हें खेलता नजर आया। राजा जनक जी अपने घोड़े से उतरकर उस बालक के चरणों में गिरते हुए कहा -” वत्स!आप में कुछ तो बात है,जिसने अपने पिता के स्वाभिमान की लाज रख ली और आपकी विद्वता ने मेरी नींद हर ली है।आपसे बड़ा कोई ज्ञानी नहीं है!आप मुझे प्रभु का ज्ञान देना स्वीकार करें।”
उसके बाद राजा जनक जी ने उस बालक से विधिवत शिक्षा ली और अष्टावक्र को अपना गुरु स्वीकार किया ।
अष्टावक्र और राजा जनक जी के बीच का संवाद ‘अष्टावक्र महागीता’ केनाम से जाना जाता है। इसमें जीवन, दर्शन,सत्य और धर्म से जुड़े प्रश्न -उत्तर हैं।
पिता द्वारा शापित होने के बावजूद पुत्र-धर्म का निर्वहन करते हुए अष्टावक्र ने अपने पिता के स्वाभिमान पर ऑंच नहीं आने दी।नमन है ऐसे महाज्ञानी को।
समाप्त।
लेखिका -डाॅ संजु झा (स्वरचित )