श्याम वर्ण श्यामा भले ही सांवली सलोनी थी पर चेहरे पर मासूमियत और सुन्दरता मे कोई कमी नहीं थी।तभी तो पिता ने श्यामा नाम धर दिया था बेटी का ।बहुत शांत और सुशील श्यामा ने मैट्रिक पास ही किया था कि पिता ने अच्छा घर वर देख कर उसकी शादी तय कर दी ।
बहुत पढ़ना चाहती थी वह।आगे कुछ करने की इच्छा मन मे लिए ससुराल विदा कर दी गई ।माँ ने एक बार कहा भी था कि कमसे कम पढ़ाई पूरी कर लेती तो ठीक था ।पर पिता ने कड़े शब्दों में अपनी बात रख दिया “मेरे पास अधिक पैसे नहीं है,कहाँ से पूरी करें उसकी इच्छा “फिर अच्छा घर वर संयोग से ही मिलता है ।
माँ चुप हो गयी ।माँ की चलती भी नहीं थी पिता के आगे ।श्यामा ससुराल आई तो नयी बहू का खूब स्वागत हुआ ।रोज अच्छा खाना,अचछे कपड़े पहनने को मिलते तो उस कम उम्र की बालिका को लगता की यही जीवन का असली सुख है ।सास ससुर, जेठ जेठानी और पति ।इतना ही छोटा परिवार ।
किसी तरह की कोई बन्दिश नहीं थी।खेलते कूदते चार वर्षों में दो बेटों की माँ भी बन गई थी ।सुन्दर गोल मटोल बेटा पाकर पति और ससुराल वाले खुश थे।एक ही समस्या थी कि वह शाकाहारी थी और ससुराल में सभी लोग मांस मछली के शौकीन थे ।
शुरुआत में थोड़ी दिक्कत महसूस हुईथी उसे लेकिन परिवार के लोगों ने सहयोग किया और रसोई के बर्तन अलग हो गये ।अब अलग चूल्हा अलग बर्तन में वह सब बनता तो श्यामा को अच्छा लगा कि कितना खयाल रखते हैं परिवार के लोग उसका।खैर समय कब रुका है ।
पति की नौकरी कलकत्ता में रेलवे में लग गई ।अच्छा क्वाटर मिला हुआ था ।श्यामा अपने बच्चों के साथ कलकत्ता चली गई ।साथ मे सास ससुर को चलने के लिए कहा तो उनहोंने इनकार कर दिया “यहाँ अपना घर है।थोड़ी खेती-बारी भी है।घर में काम करने के लिए बसंती है ही।
बाहर के लिए सोहन काका है ना तो जिंदगी मजे से कट जायेगी “जरूरत पड़ी तो फिर तुम लोग तो हो ही ।यहां दालान मे बैठते हैं तो चार आते जाते लोग दुआ सलाम कर लेते हैं ।बड़े शहरों में वह बात कहाँ? श्यामा की जिंदगी अपने रफ्तार से भाग रही थी।
बच्चे होनहार निकले।पढ़ाई पूरी करके अच्छी नौकरी पा गये थे ।लेकिन सब दिन एक समान कहाँ रहता है ।दुर्गा पूजा के अवसर पर सास ससुर जेठ जेठानी उसके पास आ रहे थे तो रास्ते में किसी ट्रक से धक्का लगा और उनकी बस पलट गई ।अस्पताल जाने का भी समय नहीं मिला ।चारो एक साथ खत्म हो गये।श्यामा तक खबर पहुँची तो पति पत्नी दौड़ पड़े ।
लेकिन कुछ बचा नहीं था।टूट गई थी श्यामा दोनों पति पत्नी ।बच्चे बंगलोर में थे।घर खाली खाली लगता ।पति की उदासी उसे देखी नहीं जा रही थी।एक साल किसी तरह रो धो कर बीत गया ।अब खुशी लौटाने का एक ही उपाय था कि बेटों की शादी कर देनी चाहिए ।
विचार विमर्श हुआ तो बड़े सौरभ ने अपना फैसला सुना दिया “अम्मा,मैंने अपने आफिस में साथ काम करने वाली नीति को पसंद कर लिया है ।शादी उसी से करना है”क्या कहती वह।बेटे की पसंद उसकी पसंद ।लेकिन इतना बड़ा फैसला खुद ही कर लिया ।माँ बाप को बताना भी जरूरी नहीं समझा? कितने अरमान थे मन में ।सब खत्म हो गये।चलो ठीक है ।
एक छोटका तो है न अभी ।उसके लिए अपनी पसंद की दुल्हन लाना है ।पति सीधे सादे थे।हर बात में तैयार हो जाते।सोचा दोनों की शादी एक बार में ही निबटा देंगे ।लड़की देखने का सिलसिला शुरू हो गया ।परिवार मे ही दूर की रिश्तेदारी में सुन्दर कन्या मिल गई ।
दोनों की शादी अच्छे से हो गई ।अधिक धूम धाम नहीं किया ।एकसाथ चार चार की मौत को भुला पाना आसान नहीं था।शादी और रिशेपशन एक ही बार कर दिया गया ।दोनों बेटे सौरभ और संतोष अपनी पत्नी को लेकर चले गए ।चार महीने बीत गए ।एक दिन पति रात में सोये तो उठे ही नहीं ।श्यामा की दुनिया उजाड़ हो गई ।अब चिंता हुई कि दो बेटों के होते हुए माँ अकेले कैसे रहेगी ।लोग क्या कहेंगे? ।
सौरभ की पत्नी ने तो साफ मना कर दिया “ना बाबा,मुझसे तुम्हारी माँ की सेवा नहीं होगी ।मै अपनी नौकरी देखूं कि उनकी सेवा करूँ? “”लेकिन नीति,वह मेरी माँ है ।अकेले कहाँ और कैसे रहेगी? “दोनों भाई मे फैसला हुआ कि छःमहीने के अंतर से दोनों के पास माँ रहेगी ।
श्यामा ने अपने आँसू पोंछ लिए ।और कोई चारा नहीं था ।न परिवार न संपत्ति ।संतोष छोटा बेटा था।पेट पोछना ।थोड़ा मोह ममता अधिक ही था उसके लिए ।चार महीने मे ही जिद करके संतोष के यहाँ आ गयी ।बेटा खुशी खुशी मां को स्टेशन से घर ले आया ।
बहू सीमा जिसे अपनी पसंद से लाई थी उसने भी नाक भौं चढ़ाया ।चार पांच दिन ठीक रहा।फिर कभी खाना समय पर मिलता कभी नाशता गायब हो जाता ।बेटा तो सुबह आफिस चला जाता ।उसे कुछ पता ही नहीं चलता कि घर में कुछ हो रहा है ।एक दिन घर में पार्टी रखी गई थी ।
आफिस के बड़े साहब के लिए ।उस दावत में बेटे के लिए तरक्की होना था।उस रात संतोष ने कुछ अधिक ही पी लिया था ।पार्टी खत्म होने पर माता के कमरे में आया “माँ छःमहीने भी नहीं हुए भैया ने अपने माथे का बोझ मुझ पर डाल दिया है “सन्न रह गई थी वह बेटे की बात सुनकर ।तो अब वह माथे का बोझ बन गई है “नहीं रहेगी वह यहाँ ।कितना प्यार से पाला था
बच्चे को ।कितने अरमान से शादी किया था कि मेरी जिंदगी कट जायेगी “सीमा भी अब घर का काम नहीं देखती ।अपनी सहेली के साथ बाजार में शापिंग करके घर आती तो पड़ी रहती “मै तो थक गई हूँ,मम्मी आप खाना बना लो।और हाँ रात को रसोई भी साफ कर देना “श्यामा थक कर चूर हो जाती ।
उम्र भी तो हो चली थी ।आखिर बुढापा सबको आना है ।समझती नहीं यह आज की पीढ़ी? छःमहीने बीत गए ।सौरभ के यहाँ भेज दी गई ।नीति का भी वही हाल था ।आफिस से आती तो थकी होने का बहाना बनाकर सो जाती।कभी बाहर से खाना आर्डर कर देती ।
शाकाहारी श्यामा को गंधाती चिकन से परहेज था।रोज सुबह उठकर चौका बर्तन, खाना बनाने से लेकर घर के साफ सफाई करती ।बेटा तो पत्नी का आज्ञाकारी था।माँ की तकलीफ नजर नहीं आती उसे ।एक दिन झाड़ू करते हुए चक्कर आ गया ।बेटा डाक्टर के यहाँ ले गया ।डाक्टर ने जवाब दिया कि अब इनको आराम चाहिए ।
काफी कमजोर हो गई है ।बहू ने सुना तो घर में उठा पटक मचा दिया ।रोज चार बात सुना देती कि मै तुमहारी नौकर नहीं हूँ ।और मेरी कमाई डाक्टर साहब के लिए नहीं है।श्यामा ने बेटे को कहा “बेटा मेरा टिकट करा दो।मै अपने घर जाना चाहती हूँ ।बहुत बूढ़ी हो रही हूँ ।आखिर बुढापा सबको आना है ।मै वहाँ आराम से रह लूंगी ।तू चिंता मत करना ।
कुछ जमीन है खाने भर हो जायेगा ।बेटा सब समझ रहा था।टिकट ले आया ।दूसरे दिन सुबह आठ बजे की गाड़ी थी।श्यामा सोच रही थी जिंदगी कहाँ से कहाँ ले आई।दूसरे दिन अपने घर लौट आई और फूट फूट कर रोने लगी ।
शायद किस्मत में यही लिखा था।चलो यहाँ बसंती तो है।कितना सेवा करती थी ।दरवाजे को खुला देख कर बसंती आई “दीदी अब मै आपको कहीं जाने नहीं दूंगी “दोनों गले मिल रही थी।बसंती आज नौकर नहीं थी।अपनी बन गई थी ।दोनों के आंसू एक हो रहे थे।”नहीं रे, अब मै यही रहूँगी तुम्हारे साथ “।—
उमा वर्मा ।नोयेडा ।स्वरचित ।मौलिक ।