अतुल ने अपने पिता गिरधारी लाल से कहा-” पिताजी आप समझते क्यों नहीं है, एक तो शहर में खर्चा इतना ज्यादा होता है और ऊपर से छोटे-छोटे घर, भैया और मैं एक साथ मां का और आपका खर्चा नहीं उठा पाएंगे, इसीलिए आप मेरे साथ रहे और भैया के साथ मां रहने चली जाएगी, थोड़े-थोड़े दिनों में आप दो-चार दिन के लिए या तो भैया के घर या हमारे घर एक साथ मिलकर रह लेना। आप समझिए, बच्चों की पढ़ाई लिखाई और ट्यूशन कितना खर्च है हम पर। ”
गिरधारी लाल -” बेटा, हमने भी तो गरीबी में तुम दोनों को पढ़ाया लिखाया और लायक बनाया, अब तुम बुढ़ापे में हमें अलग कर दोगे, हमने ऐसा कभी नहीं सोचा था। ”
अतुल की मां सुमित्रा ने कहा-” कोई बात नहीं,हम रह लेंगे, आप बच्चों की प्रॉब्लम को समझिए। ”
गिरधारी लाल -” सुमित्रा उनकी हां में हां मत मिलाओ, मैं कह रहा हूं बाद में पछताओगी, याद नहीं है कि तुम मुझे छोड़कर मायके में भी ज्यादा दिन रहती नहीं थी, अब क्या हुआ? ”
सुमित्रा-” हां मुझे याद है, लेकिन हम बच्चों की समस्या को हल नहीं करेंगे तो कैसे चलेगा? कभी आप विपुल के यहां आ जाना तो कभी मैं अतुल के यहां आ जाऊंगी। ”
आखिरकार बहुत बहस के बाद गिरधारी लाल अतुल के पास रह गए और विपुल मां को लेकर दूसरे शहर चला गया।
थोड़े दिनों बाद सुमित्रा अतुल के यहां आ गई। हफ्ते, 15 दिन रहने के बाद वह वापस लौट गई। गिरधारी लाल को बहुत ही अकेलापन लगता था। बेटा बहू और पोते पोतियो अपने पढ़ाई और कामों में व्यस्त रहते थे। उनके साथ बात करने वाला कोई नहीं था। वह अपना टाइम पास करने के लिए सुबह शाम गार्डन में टहलने चले जाते थे, लेकिन गिरधारी लाल का नेचर ऐसा था कि वह जल्दी से किसी को भी दोस्त नहीं बना पाते थे। इसीलिए सुबह शाम पार्क में अकेले ही टहलते रहते थे।
कुछ दिनों बाद उन्होंने अतुल को कहा -” बेटा, मेरी टैक्सी बुक करवा दे, मैं विपुल के यहां जाना चाहता हूं। ”
अतुल -” टैक्सी, टैक्सी की क्या जरूरत है पापा जी, बस में जाइए, टैक्सी तो बहुत महंगी पड़ेगी, आपको तो पता ही है कि मेरा हाथ कितना टाइट चल रहा है। ”
गिरधारी लाल को मजबूरी में बस में जाना पड़ा। बस में वह सोचते हुए जा रहे थे कि अतुल जब हफ्ते में एक दिन बच्चों समेत बाहर खाना खाने जाता है तब वह तीन हजार उडाकर आता है, तब उसका हाथ टाइट नहीं होता और मेरी टैक्सी के ₹2000 उसे महंगे लग रहे हैं। बचपन में अतुल और विपुल जो कुछ भी मांगते थे, हम उन्हें मना नहीं करते थे। जैसे तैसे इंतजाम करके उनकी इच्छा पूरी करते थे। 2 घंटे का सफर पुरानी बातें सोचते सोचते बीत गया और गिरधारी लाल विपुल के घर पहुंच गए।
वहां रहते रहते उन्होंने महसूस किया कि सुमित्रा खुश नहीं दिख रही, ऐसा लग रहा है कि बस समय काट रही है और यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि सब कुछ ठीक है।
एक दिन सुबह के समय सुमित्रा टीवी पर कोई प्रोग्राम देख रही थी, तभी बहू ने आकर टीवी बंद कर दिया और का कर चली गई,” मां जी, क्या आप रात दिन टीवी देखते रहते हो, पता भी है बिजली का बिल कितना आता है? ”
गिरधारी लाल ने यह सब कुछ अपनी आंखों से देखा था।
सुमित्रा देवी को खांसी हो रही थी। गिरधारी लाल ने कहा ” तुम्हें गले में खुशकी हो रही है तुम एक कप दूध क्यों नहीं पी लेती। ”
सुमित्रा ने टालने की कोशिश की, लेकिन गिरधारी लाल नहीं माने और एक कप गर्म दूध लाकर सुमित्रा को दे दिया। 5 मिनट बाद ही बहू आ गई और सुमित्रा पर चिल्लाने लगी-” माँ जी, इतनी मुश्किल से हम बच्चों के लिए दूध मंगाते हैं पर हम खुद नहीं पीते। आपको तो जरा सी भी शर्म नहीं है, बच्चों के दूध पर भी आपकी नजर है और उसमें से आप एक कप लेकर बैठी आराम से पी रही हो। ”
गिरधारी लाल जोर से चिल्लाए-” बहू, यह क्या तरीका है अपनी सास से बात करने का। ”
बहू-” पिताजी आप तो चुप ही रहिए, मां जी का खर्चा क्या कम था, जो आप भी यहां आ गए हैं। ”
सुमित्रा और गिरधारी लाल की आंखों में आंसू थे लेकिन तब भी सुमित्रा ने गिरधारी लाल को अपनी कसम देकर शांत करवा दिया।
गिरधारी लाल ने विपुल से बात करने के बारे में सोचा। लेकिन शाम को आते ही बहू ने उल्टी सीधी शिकायतें लगाकर उसके कान भर दिए। विपुल, अपनी मां और पापा से लड़ने लगा और उन्हें खरी खोटी सुनाने लगा।
विपुल-” पापा, आप तो रिटायर होकर पड़े हैं, हमें ही सारे खर्चे संभालने पड़ते हैं, आपको क्या पता मां कितनी लापरवाह है, कभी अपना चश्मा तोड़ देती है तो कभी कहती है कि मुझे सत्संग में जाना है ऑटो का किराया दे दो। सौ बार समझाया है कि सत्संग टीवी पर देख लिया करो, पर नहीं, इन्हें तो बुढ़ापे में भी घूमने की पड़ी है और क्या-क्या बताऊं? ”
गिरधारी लाल ने चिल्लाकर कहा -” पहले अपनी पत्नी से जाकर पूछो कि वह सुमित्रा को टीवी देखनेभी देती है या नहीं और छोटी-छोटी बात उसका अपमान करती है। एक कप दूध पीना भी उसके लिए मुश्किल कर रखा है। वहां पर अतुल ने मेरा जीना हराम कर रखा है और यहां पर तूने अपनी मां का। अब बस बहुत हुआ, हमारा स्वाभिमान अभी जिंदा है। ”
विपुल ने बदतमीजी से कहा -” बड़े आए स्वाभिमान वाले”
गिरधारी लाल का पारा हाई हो चुका था। उन्होंने अपना और सुमित्रा का बैग उठाया और विपुल से कहा-” अतुल को फोन करके बता देना कि हम दोनों गांव जा रहे हैं और वहीं पर रहेंगे और हमारे खर्च की चिंता तुम मत करना। हम गांव के घर के दो कमरे किराए पर दे देंगे और एक में रहेंगे। जब तुम लोगों का गांव आने का मन हो, तो अपने रहने का इंतजाम खुद कर लेना। ”
चलो उठो सुमित्रा। गिरधारी लाल ने कहा और सुमित्रा का हाथ पकड़ कर बस अड्डे की तरफ चल दिए। यह एक पिता का स्वाभिमान था।
अप्रकाशित स्वरचित गीता वाधवानी दिल्ली
साप्ताहिक प्रतियोगिता विषय #पिता का स्वाभिमान