स्वाभिमान की नई उड़ान – रमा देवी

पैंसठ वर्षीया सावित्री देवी के हाथों में चाय का कप हल्का-हल्का कांप रहा था। सुबह के सात बजे थे और रसोई से उनकी बहू तान्या की कर्कश आवाज़ पूरे घर में गूंज रही थी। “पता नहीं इस घर में दूध की नदियां बहती हैं क्या! सुबह उठते ही सबको दो-दो बार चाय चाहिए। बैठे-बैठे मुफ्त की रोटियां तोड़ना और हुक्म चलाना तो कोई इनसे सीखे।

” सावित्री जी ने चुपचाप अपना आधा पिया हुआ चाय का कप सिंक में उड़ेल दिया। उनके बेटे मयंक ने डाइनिंग टेबल पर बैठकर अख़बार पढ़ते हुए सब कुछ सुना, लेकिन हमेशा की तरह उसने अपनी चुप्पी साधे रखी।

सावित्री जी अपने कमरे में आ गईं और पुरानी यादों के झरोखे में झांकने लगीं। यह वही घर था जिसे उन्होंने और उनके स्वर्गीय पति ने पाई-पाई जोड़कर बनाया था। पैंतीस साल इस घर की दीवारों को, इस आंगन को और अपने बेटे मयंक को सींचने में लगा दिए। उन्होंने अपनी हर इच्छा का गला घोंटा ताकि मयंक अच्छी शिक्षा पा सके।

लेकिन पति के जाने के बाद, जैसे ही घर की चाबियां तान्या के हाथ में गईं, सावित्री जी इस घर में एक अवांछित मेहमान बनकर रह गईं।

उन्हें हर दिन यह अहसास दिलाया जाता कि वह अब किसी काम की नहीं हैं और केवल घर का राशन खत्म कर रही हैं। अपनी ही बनाई हुई गृहस्थी में दो वक्त की रोटी के लिए उन्हें हर दिन ताने सुनने पड़ते थे। उनका स्वाभिमान हर रोज़ छलता था, लेकिन बेबसी उन्हें खामोश रहने पर मजबूर कर देती थी।

इन्हीं घुटन भरे दिनों के बीच, एक दिन उनके घर श्रुति का आना हुआ। श्रुति, सावित्री जी की दूर के रिश्ते की भतीजी थी, जो कई सालों से अपने पति कार्तिक के साथ सिडनी, ऑस्ट्रेलिया में रह रही थी।

श्रुति और कार्तिक दोनों ही वहां बड़े आईटी प्रोफेशनल थे। भारत में एक शादी के सिलसिले में आई श्रुति दो दिन के लिए सावित्री जी के घर रुकी थी। श्रुति बचपन से ही सावित्री जी के बहुत करीब थी और उनके हाथ के बने खाने और उनके स्नेह की दीवानी थी।

इन दो दिनों में श्रुति की पारखी नज़रों से कुछ भी छिप नहीं सका। उसने देखा कि कैसे तान्या बात-बात पर सावित्री जी को अपमानित करती है और कैसे मयंक अपनी माँ की इस दुर्दशा पर आंखें मूंदे रहता है।

एक रात जब सब सो गए थे, श्रुति ने सावित्री जी के कमरे में जाकर उनके हाथ अपने हाथों में लिए। सावित्री जी की आँखों से बरसों का दबा हुआ दर्द आंसुओं के रूप में बह निकला।

श्रुति ने बहुत ही गंभीरता और प्रेम से कहा, “बुआ जी, मैं और कार्तिक दोनों दिन भर ऑफिस में रहते हैं। हमारा चार साल का बेटा कियान डे-केयर में रहता है। हमें हमेशा यह चिंता सताती है कि कोई अपना हमारे बच्चे के पास नहीं है।

अगर आप हमारे साथ सिडनी चलें और हमारे घर की, कियान की और रसोई की ज़िम्मेदारी संभाल लें, तो हम आपके बहुत आभारी होंगे।

और हां, यह कोई एहसान नहीं होगा, मैं आपको इसके लिए बकायदा हर महीने एक अच्छी सैलरी दूंगी। आपको कभी भी मयंक या तान्या के आगे अपनी ज़रूरतों के लिए हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा। आप मेहनत करेंगी और अपने आत्मसम्मान की रोटी खाएंगी।”

यह प्रस्ताव सुनकर सावित्री जी एक पल के लिए सुन्न रह गईं। पैंतीस साल जिस घर को संवारा, उसे छोड़ना कोई आसान फैसला नहीं था। उन्हें लगा कि दुनिया क्या कहेगी कि एक माँ अपने बेटे का घर छोड़कर भतीजी के यहाँ नौकरी करने जा रही है। लेकिन फिर उनके कानों में तान्या के वो ताने गूंजे— “मुफ्त की रोटियां तोड़ती हैं।

” सावित्री जी को एहसास हुआ कि जिस बेटे के लिए उन्होंने अपना जीवन होम कर दिया, जब वह उनके स्वाभिमान की रक्षा नहीं कर सका, तो ऐसे खोखले रिश्तों का क्या मोल? सम्मान की सूखी रोटी, अपमान के छप्पन भोग से कहीं बेहतर होती है। उन्होंने अपने आंसुओं को पोंछा और एक दृढ़ निश्चय के साथ श्रुति को हामी भर दी।

सावित्री जी के इस फैसले से श्रुति बेहद खुश हुई। उसने तुरंत सिडनी लौटकर अपने पति कार्तिक से बात की और सावित्री जी का पासपोर्ट और वीज़ा बनवाने की प्रक्रिया शुरू कर दी। कार्तिक भी इस बात से बहुत खुश था कि उनके बच्चे को एक दादी का प्यार मिलेगा और घर में एक बुजुर्ग का साया रहेगा।

जब मयंक और तान्या को इस बात का पता चला, तो उन्होंने कोई खास विरोध नहीं किया। समाज को दिखाने के लिए मयंक ने एक-दो बार रस्मी तौर पर कहा कि “माँ, इस उम्र में विदेश जाकर काम करने की क्या ज़रूरत है?” लेकिन उसके लहज़े में कोई ज़ोर नहीं था। वीज़ा आने में करीब दो महीने का समय लगा।

इन दो महीनों में सावित्री जी ने खुद को मानसिक रूप से उस घर से पूरी तरह आज़ाद कर लिया था। अब तान्या के ताने उन्हें चुभते नहीं थे, क्योंकि उन्हें पता था कि उनके स्वाभिमान की नई उड़ान बस शुरू ही होने वाली है।

आखिरकार वह दिन आ ही गया जब सावित्री जी को सिडनी के लिए उड़ान भरनी थी। गाड़ी में बैठते समय सावित्री जी ने एक आखिरी बार उस घर को मुड़कर देखा, लेकिन उनकी आँखों में अब कोई आंसू नहीं था।

गाड़ी के आगे बढ़ते ही तान्या ने राहत की सांस लेते हुए मयंक से कहा, “चलो, बला टली! वैसे भी यहां बैठी-बैठी मुफ्त की रोटियां ही तो तोड़ रही थीं। अब अपना कमाएं और अपना खाएं, हमें भी रोज़-रोज़ की चिकचिक से फुर्सत मिली।”

तान्या की यह बात उसकी ओछी मानसिकता को दर्शा रही थी, लेकिन सावित्री जी इन सबसे बहुत दूर जा चुकी थीं। सिडनी पहुँचकर सावित्री जी की ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई। श्रुति और कार्तिक ने उन्हें अपनी माँ से भी बढ़कर सम्मान दिया। कियान के रूप में उन्हें अपनी ममता लुटाने का एक नया बहाना मिल गया था।

हर महीने श्रुति उनके बैंक अकाउंट में उनकी मेहनत की कमाई डाल देती। उन पैसों से सावित्री जी अपनी पसंद की चीज़ें खरीदतीं, दान-पुण्य करतीं और सबसे बड़ी बात, उन्हें यह सब करने के लिए किसी की मोहताज नहीं होना पड़ता था।

आज सावित्री जी सिडनी में पूरी तरह से रच-बस गई हैं। वीकेंड्स पर जब श्रुति और कार्तिक उन्हें बाहर घुमाने ले जाते हैं, तो उनके चेहरे पर एक ऐसी संतुष्टि और चमक होती है, जो मयंक के घर में कभी नहीं दिखी। उन्होंने साबित कर दिया था कि स्वाभिमान की कोई उम्र नहीं होती और जब अपने ही बेगाने हो जाएं, तो इंसान को खुद ही अपने सम्मान का रास्ता तलाशना पड़ता है।

क्या आपको लगता है कि सावित्री जी का अपनी उम्र के इस पड़ाव पर अपना पुश्तैनी घर और बेटे को छोड़कर आत्मसम्मान के लिए यह कदम उठाना सही था? क्या समाज के तानों से डरकर अपमान सहते रहना एक माँ की नियति होनी चाहिए? अपने विचार हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं।

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लेखिका : रमा देवी 

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