बहुत समय बाद भावना को एक सेमिनार के सिलसिले में दिल्ली आना पड़ा। पूरी रात मां के साथ पुरानी यादें ताजा करते रहे। क्योंकि सेमिनार पुराने घर के पास था, और भावना ने विचार बनाया था कि वह ताई जी ताऊ जी से मिलकर ही सेमिनार स्थल पर जाएगी।
रह रहकर बचपन का वह समय याद आ रहा था जब सारे भाई बहन ताई जी के घर में खेला करते थे। उन के चार बच्चे और भावना (तीन भाई बहन), दादी की डांट का तो कोई असर ही नहीं होता था।मुश्किल समय तो सिर्फ तब होता था जब ताऊ जी घर में होते थे। ताऊ जी की उपस्थिति और एक हिटलर की उपस्थिति एक बराबर थी।
सवेरे उठते ही ताऊ जी की कड़क आवाज पूरे घर में गूंजती थी । वह उठते ही ताई जी को जी भर के गालियां देते थे । यह तो दादी थी, जो “ताऊ जी को हाथ उठाने से रोक देती थी “वरना वह उन्हें गंवार और भी जाने क्या क्या कहते थे । उनका ऐसा बोलना किसी को भी अच्छा नहीं लगता था ।
भावना को याद आ रहा था कि ताऊ जी के निकलते ही पीछे वाले घर से वह और उसके भाई बहन सब खेलने के लिए ताई जी के पास आ जाते थे। सारे बच्चे मिलकर धमा चौकड़ी मचाते थे। ताई जी ने कभी भी अपने और पराए बच्चों में फर्क नहीं समझा । किसी बच्चे को कभी नहीं डांटा।
लड़कियों की शादी हो गई। घर में दो बहुएं भी आ गई। दुकान अलग होने से भावना के माता-पिता भी दूर शिफ्ट हो गए थे। मां ने बताया “सिर्फ बच्चे बदले थे” ताई तब भी वैसे ही काम करती रहतीं थीं। ताऊजी बहुओं के सामने भी ताई को इतना अपमानित करते थे कि कुछ पूछो मत। बहुएं तो उन्हें गंवार नहीं लगती थी।
उनसे तो तुम तुम कहकर बोलते थे। बहुएं भी ताऊ जी को प्रभावित करने का एक भी अवसर हाथ से जाने नहीं देती थीं। ताई जी अब भी सारा दिन काम करती हुई यही सोच कर खुश रहतीं थीं कि कोई बात नहीं अपने बच्चों का ही तो काम कर रही हूं।
ताई जी के दोनों बेटों ने भी अपना अपना काम अलग कर लिया था ।बड़ा बेटा घर छोड़कर जा चुका था। छोटा बेटा और बहू दोनों नौकरी करते थे और उनका बेटा हॉस्टल में पढ़ता था। ताऊ जी की उपेक्षा और घर में गहराए खालीपन ने ताई को मानसिक रूप से विक्षिप्त कर दिया था।
यह वक्त की ही मार थी, अक्सर वे सब कुछ भूल जाती थीं, या कभी पुराना समय याद करके अपने आप बातें करती रहती थीं। ताई जी की तो हमेशा सबने उपेक्षा की ही थी, अब जैसे-जैसे ताऊ जी का भी रुबाब कम हो रहा था
और शारीरिक अस्वस्थता बढ़ रही थी तो बच्चों द्वारा वह भी उपेक्षित होते थे। ताई इस हालत में भी उनके लिए खाना और पानी का पूरा ख्याल रखने की कोशिश करती थीं।
दूसरे दिन पुरानी यादें ताजा करते हुए भावना 5:00 बजे ताऊ जी के घर पहुंची सेमिनार 7:00 बजे था। घर को देख कर के हर पुरानी याद जीवंत हो उठी थी ।दादी ,भाई ,बहनों के साथ खेलना सब कुछ चित्रपट के जैसे आंखों के सामने घूम रहा था। घर पहुंच कर पहली बार डोर बेल बजाई ,वरना ताई जी का घर तो हमेशा खुला ही रहता था।
दरवाजा उनके नौकर ने खोला। ताई जी और ताऊ जी कमरे में पलंग पर बैठे थे। दूर-दूर तक दवाइयों की महक आ रही थी। ताऊजी चलने फिरने मे असमर्थ थे, पर सदा बोलती रहने वाली ताई जी एकदम चुप थी। ताऊजी भावना को देखकर बहुत खुश हुए, और ताई जी से बोले! पहचाना है तुमने ?
देखो तो कौन आया है? जीवन में पहली बार ताऊ जी को ताई जी से इतने प्यार से बोलते हुए सुना। ताई जी ने जवाब दिया, हां मैं पहचान गई ।भावी है। फिर बोलीं,” चल भावी बच्चों के पास घर चलते हैं”। ताऊ जी यह सुनकर जोर जोर से रो उठे ,और बोले यही तो घर है तुम्हारा,” यही तो घर है तुम्हारा” ” तुम मालिक हो इस घर की”।
रोते-रोते ताऊ जी बोले ,मैंने इसे बहुत तंग किया है , यही कारण है कि यह इस हालत में आ गई है ।अब मैं चाहूं तो मर भी नहीं सकता, क्योंकि मेरे बाद इसका क्या होगा?
वक्त कभी एक सा नहीं रहता और वक्त कभी ठहरता भी नहीं। इससे आगे उस कमरे में बैठना भावना के लिए भी असहनीय हो उठा था।उसने जाने की आज्ञा मांगी । कभी ना बोलने वाले ताऊजी लगातार बातें करते जा रहे थे।भावना को उठती देख कर बोले, थोड़ी देर और रुक जा ,तेरी भाभी आएगी ,तो तेरे लिए चाय बना देगी।
नहीं! इससे आगे रुकना लगभग असंभव था। भावना भी बाहर निकल आई। अब ताऊ जी को ताई जी की कीमत समझ में आई भी ,तो क्या फायदा? पर ,——-इन्हीं खयालों में खोई हुई, रूंधे गले और भरी आंखों से भावना अपने सेमिनार स्थल पर पहुंची। काश! उन्होंने यह सब बातें पहले समझ ली होती, तो आज नज़ारा शायद कुछ और ही होता। वक्त की मार ने आज सिखाया भी तो क्या?
मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा