औरत का दर्द – सुधा चौहान

 “चुप… एकदम चुप बेशरम!” शालिनी ने अपनी उंगली नीलू  के चेहरे की तरफ तानते हुए फुफकार कर कहा। “बोल तो ऐसे रही है जैसे वह तेरे मालिक न होकर तेरे बहुत अपने हो गए हों।

अरे बदज़ात, तूने यह भी नहीं सोचा कि तू किस घर में सेंध मार रही है? पर तू भला क्यों सोचेगी? तेरी तो फितरत ही यही है। अगर यही सब सोचना होता तो शहर में यूँ दर-दर क्यों भटकना पड़ता तुझे? अरे, पति मेरे हैं, उन्हें जो भी होता मैं आकर देखती, मैं सँभालती। पर तूने मेरी गैरहाजिरी का फायदा उठाकर…”

शहर की एक पॉश कॉलोनी में रहने वाली शालिनी का घर जितना बड़ा था, उसकी सोच उतनी ही छोटी थी। उसके घर के पिछवाड़े बने एक छोटे से सर्वेंट क्वार्टर में नीलू  अपनी चार साल की बेटी सलोनी के साथ रहती थी। नीलू  शालिनी के घर का सारा काम करती थी—कपड़े धोना, बर्तन मांजना, झाड़ू-पोछा करना और कभी-कभी सिलाई का काम भी।

नीलू  की उम्र मुश्किल से अट्ठाईस साल रही होगी, लेकिन उसकी आँखों में जो सूनापन था, वह किसी सत्तर साल की वृद्धा जैसा था। पाँच साल पहले एक सड़क दुर्घटना में नीलू  के पति का देहांत हो गया था। पति के जाने के बाद नीलू  पूरी तरह टूट चुकी थी, लेकिन किस्मत को शायद उसका और भी इम्तिहान लेना था।

पति की मौत के कुछ ही महीनों बाद, जब वह काम की तलाश में एक रात लौट रही थी, तो समाज के कुछ दरिंदों ने उसकी आबरू लूट ली। उस खौफनाक रात ने नीलू  को सलोनी के रूप में एक ऐसी निशानी दी, जिसे यह समाज ‘पाप’ कहता था।

कालोनी की औरतें नीलू  को देखते ही मुँह फेर लेती थीं। उसे ‘कुलटा’, ‘बदचलन’ और न जाने किन-किन नामों से पुकारा जाता था। शालिनी भी नीलू  से हमेशा दूरी बनाकर रखती थी। वह उसे सिर्फ इसलिए काम पर रखे हुए थी क्योंकि नीलू  बहुत कम पैसों में दिन-रात खटती थी और काम में कोई कोताही नहीं बरतती थी।

शालिनी के पति, अविनाश, एक बहुत ही शांत और सुलझे हुए इंसान थे। वह अक्सर अपनी पत्नी को समझाते थे कि किसी की मजबूरी का इस तरह मज़ाक उड़ाना ठीक नहीं है, लेकिन शालिनी को अपने पैसे और अपनी ‘पवित्रता’ का बहुत घमंड था। अविनाश को दिल की बीमारी थी और उनका इलाज चल रहा था।

एक दिन दोपहर का समय था। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। शालिनी अपनी सहेलियों के साथ एक किटी पार्टी में गई हुई थी। घर पर सिर्फ अविनाश थे,

जो अपने कमरे में आराम कर रहे थे, और नीचे बरामदे में नीलू  सिलाई मशीन पर शालिनी के कुछ कपड़ों की तुरपाई कर रही थी। अचानक ऊपर के कमरे से किसी भारी चीज़ के गिरने की ज़ोरदार आवाज़ आई। नीलू  के हाथ रुक गए। उसने एक पल के लिए सोचा कि शायद हवा से कोई खिड़की टकराई होगी, लेकिन फिर उसे अविनाश के खांसने और कराहने की आवाज़ सुनाई दी।

नीलू  बिना एक पल गँवाए सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर अविनाश के कमरे की तरफ दौड़ी। कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था। उसने देखा कि अविनाश ज़मीन पर गिरे हुए हैं, उनका एक हाथ उनके सीने पर है और वे बुरी तरह हाँफ रहे हैं। उनका पूरा चेहरा पसीने से भीग चुका था और उनके होंठ नीले पड़ रहे थे। नीलू  समझ गई कि यह दिल का दौरा है। वह घबरा गई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी।

“मालिक! क्या हो रहा है आपको? आँखें खोलिए!” नीलू  ने अविनाश के पास ज़मीन पर बैठकर उनका सिर अपनी गोद में रख लिया। उसने तुरंत उनकी शर्ट के बटन खोल दिए ताकि उन्हें सांस लेने में आसानी हो। उसे याद आया कि शालिनी ने एक बार बताया था कि अविनाश की आपातकालीन दवाइयाँ बेड के पास वाले दराज़ में रहती हैं। नीलू  ने तुरंत दराज़ खोला, एक छोटी सी शीशी निकाली और एक गोली अविनाश की जीभ के नीचे रख दी।

अविनाश की सांसें उखड़ रही थीं। उन्होंने डर के मारे नीलू  का हाथ कसकर पकड़ लिया था। नीलू  उनके हाथों को मलने लगी ताकि शरीर में गर्मी बनी रहे। उसने अपने काँपते हाथों से एम्बुलेंस को फोन किया। जब तक एम्बुलेंस आती, नीलू  अविनाश के पास ही बैठी रही,

उनके पसीने पोंछती रही और उन्हें हिम्मत बंधाती रही। उसे उस वक्त सिर्फ एक इंसान की जान बचाने की फिक्र थी; उसे यह याद ही नहीं रहा कि वह एक ‘बेवा’ है और एक पराये मर्द को इस तरह छूना समाज की नज़रों में क्या मायने रखता है।

एम्बुलेंस के आते ही नीलू  अविनाश के साथ ही अस्पताल चली गई। उसने रास्ते में शालिनी को फोन करके खबर दे दी थी। अस्पताल पहुँचते ही डॉक्टरों ने अविनाश को इमरजेंसी वॉर्ड में ले लिया।

नीलू  बाहर कॉरिडोर में बदहवास सी खड़ी थी। उसके कपड़े बारिश और पसीने से भीग चुके थे और अविनाश को सँभालने की वजह से उसके ब्लाउज़ का एक कोना हल्का सा खिसक गया था, जिसका उसे कोई होश नहीं था।

करीब आधे घंटे बाद शालिनी किटी पार्टी के उन्हीं भड़कीले कपड़ों में अस्पताल के कॉरिडोर में भागती हुई आई। उसकी आँखों में गुस्सा और घबराहट दोनों थे। जैसे ही उसने नीलू  को इमरजेंसी वॉर्ड के बाहर खड़ा देखा, उसके दिमाग का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। शालिनी की नज़र नीलू  की अस्त-व्यस्त हालत पर पड़ी।

बिना यह जाने कि अंदर क्या हुआ है, शालिनी ने नीलू  का हाथ ज़ोर से पकड़कर उसे एक तरफ खींचा।

“बस, मिल गया मौका तुझे एक अमीर मर्द को फांसने का?” शालिनी की आवाज़ पूरे कॉरिडोर में गूँज गई।

नीलू  अवाक रह गई। “यह क्या बोल रही हैं मालकिन? मैं तो एम्बुलेंस बुलाकर लौट ही जाती, पर मालिक को उस हालत में अकेले छोड़ना मुझे ठीक नहीं लगा। उनकी सांसें उखड़ रही थीं। अगर रास्ते में मालिक को कुछ हो जाता तो?”

“चुप… एकदम चुप बेशरम!” शालिनी ने अपनी उंगली नीलू  के चेहरे की तरफ तानते हुए फुफकार कर कहा। “बोल तो ऐसे रही है जैसे वह तेरे मालिक न होकर तेरे बहुत अपने हो गए हों। अरे बदज़ात, तूने यह भी नहीं सोचा कि तू किस घर में सेंध मार रही है? पर तू भला क्यों सोचेगी? तेरी तो फितरत ही यही है। अगर यही सब सोचना होता तो शहर में यूँ दर-दर क्यों भटकना पड़ता तुझे? अरे, पति मेरे हैं, उन्हें जो भी होता मैं आकर देखती, मैं सँभालती। पर तूने मेरी गैरहाजिरी का फायदा उठाकर…”

“बस… बस मालकिन, बस कीजिए!” अचानक नीलू  की आवाज़ में एक ऐसी धार पैदा हुई जिसने शालिनी को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। नीलू  के धैर्य का बाँध आज टूट चुका था। सालों से सीने में दबा हुआ ज़हर आज आँसुओं और शब्दों के रूप में फूट पड़ा था।

“अगर आज मालिक को कुछ हो गया होता तो क्या कर लेतीं आप आकर? लाश पर बैठकर रोने के सिवा क्या कर लेतीं?” नीलू  की आँखें लाल हो चुकी थीं और उसका पूरा शरीर काँप रहा था।

“अरे, पति का दर्द क्या होता है, यह आप क्या समझेंगी शालिनी जी? आपके माथे पर तो यह लाल सिंदूर चमक रहा है न। आपके आगे-पीछे समाज खड़ा है। मुझसे पूछिए… मुझसे पूछिए कि जब एक औरत की माँग सूनी हो जाती है, तो उसकी ज़िंदगी कैसी हो जाती है। यह समाज, यह दुनिया, एक बेवा औरत को नोच खाने के लिए कैसे कुत्तों की तरह इंतज़ार करती है, यह आप कभी नहीं समझ पाएंगी। आपने मुझे कैसी-कैसी गालियां नहीं दीं। मेरे चरित्र पर कीचड़ उछाला। किसलिए? सिर्फ इसलिए न कि आज मेरे पति का हाथ मेरे सिर पर नहीं है। अगर आज मेरे पति ज़िंदा होते, और अगर छिपकर मैं किसी गैर मर्द से भी यह बच्ची पैदा कर लेती, तो कोई मुझसे सवाल नहीं करता। समाज उसे मेरे पति का ही नाम दे देता।”

नीलू  फूट-फूट कर रो रही थी, लेकिन उसकी आवाज़ की गूँज कम नहीं हुई थी। “यह सलोनी, जिसे पूरी कॉलोनी और आप मेरा ‘पाप’ समझते हैं, इसमें मेरी क्या गलती है? अरे, हम औरतें तो होती ही कमज़ोर हैं। जब हम सड़क पर अकेली होती हैं तो हमारी कोई ताकत नहीं होती। बताइए मालकिन, आप ही बताइए… अगर कोई गैर मर्द किसी बेबस औरत की इज़्ज़त ज़बरन लूट ले, उसके शरीर को अपनी हवस का शिकार बना दे, तो कुलटा वह मर्द हुआ या वह औरत हुई? पर नहीं, हमारे समाज में गलत सिर्फ औरत होती है। उस रात जब उन तीन दरिंदों ने मेरा मुँह दबाकर मेरी दुनिया उजाड़ी थी, तब समाज कहाँ था? तब किसी ने उन मर्दों को कुलटा क्यों नहीं कहा?”

शालिनी बुत बनकर खड़ी थी। उसके पास नीलू  के इन सवालों का कोई जवाब नहीं था। आस-पास खड़े कुछ लोग भी अब वहाँ इकट्ठा हो गए थे, लेकिन नीलू  को अब किसी की परवाह नहीं थी।

“खैर,” नीलू  ने अपने आँसू पोंछते हुए एक गहरी और दर्द भरी साँस ली। “मर्द लोग औरत को जो समझते हैं, सो तो समझते ही हैं, वे तो अपनी मर्दानगी के नशे में अंधे होते हैं। पर दुःख तो इस बात का है शालिनी जी, कि औरतें भी औरत का मर्म नहीं समझतीं। आपने एक बार भी यह नहीं सोचा कि मैं किस दर्द से गुज़री हूँ। आपको मेरे बिखरे हुए कपड़ों में मेरा ‘चरित्र’ नज़र आ गया, लेकिन आपको वो पसीना और वो घबराहट नज़र नहीं आई जो आपके पति की जान बचाते हुए मुझे हुई थी। औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन है, यह कहावत आज आपने सच साबित कर दी।”

कॉरिडोर में एक भारी सन्नाटा छा गया। शालिनी की आँखें शर्म से झुक गई थीं। तभी इमरजेंसी वॉर्ड का दरवाज़ा खुला और डॉक्टर बाहर आए। डॉक्टर ने सीधे शालिनी की तरफ देखा और कहा, “मिसेज अविनाश, आप बहुत खुशकिस्मत हैं। अगर इन्हें (नीलू  की तरफ इशारा करते हुए) सही समय पर वो इमरजेंसी पिल न दी होती और इन्हें बेहोश होने से न बचाया होता, तो अविनाश जी का बचना नामुमकिन था। ही इज़ आउट ऑफ़ डेंजर नाउ। आप अंदर जाकर मिल सकती हैं।”

डॉक्टर की बातों ने शालिनी के गाल पर एक ऐसा अदृश्य तमाचा जड़ा जिसकी गूँज उसे शायद ज़िंदगी भर सुनाई देने वाली थी। जिस औरत को वह अपने घर की सबसे बड़ी गंदगी समझती थी, जिस पर वह घर तोड़ने और उसके पति को फंसाने का घिनौना इल्ज़ाम लगा रही थी, असल में वही औरत आज उसके सुहाग की रक्षक बनकर खड़ी थी।

शालिनी ने काँपते हुए कदमों से नीलू  की तरफ देखा। नीलू  ने बिना कुछ कहे, बिना कोई उम्मीद जताए, अपना दुपट्टा ठीक किया और पलटकर अस्पताल के उस लंबे कॉरिडोर से बाहर की तरफ चल दी। उसके कदमों में आज कोई डर नहीं था, बल्कि एक ऐसा स्वाभिमान था जिसने शालिनी के झूठे रुतबे और समाज के उस खोखले अहंकार को ज़मीन में गाड़ दिया था। शालिनी वहीं खड़ी अपने ही बुने हुए घमंड के जाल में घुटती रह गई, यह सोचकर कि उसने आज सिर्फ एक इंसान का ही नहीं, बल्कि एक औरत होने का भी अपमान किया था।

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 लेखिका : सुधा चौहान

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