**फ़र्ज़ की वेदी पर खिला प्रेम** – विजय सीकर

“सच बताऊं मयंक?” पल्लवी ने एक गहरी और हताशा भरी सांस ली। “एक तो अब उम्र बहुत हो गई है। पैंतीस की होने वाली हूँ मैं। इस उम्र में हमारे समाज में लड़कियों को सिर्फ समझौते मिलते हैं, जीवनसाथी नहीं। और दूसरा, अब इस उम्र में मुझे कौन ढूंढेगा? न मेरे सिर पर पिता का साया है,

न ही मेरे उस भाई को मेरी कोई फिक्र है जिसके लिए मैंने सब कुछ लुटा दिया। अकेले अपने लिए लड़का ढूंढना और फिर उस पर भरोसा करना… ये सब अब मेरे बस का नहीं है।” उसने अपनी बात खत्म करते हुए कॉफी का कप उठाया।

बाहर दिसंबर की सर्द शाम धीरे-धीरे गहरी हो रही थी। दिल्ली के उस छोटे से, शांत कैफे में हल्की-हल्की धुन पर कोई पुराना गीत बज रहा था। कैफे की खिड़की के पास बैठी पल्लवी कॉफी के कप से उठती भांप को बड़ी खामोशी से निहार रही थी। उसकी आँखों में एक ऐसा ठहराव था,

जो सिर्फ उन्हीं लोगों में होता है जिन्होंने ज़िंदगी के बहुत बड़े तूफानों को अकेले पार किया हो। तभी कैफे के दरवाज़े की घंटी बजी और मयंक ने अंदर कदम रखा। मयंक, पल्लवी का कॉलेज के दिनों का सबसे अच्छा दोस्त हुआ करता था,

लेकिन वक़्त और ज़िम्मेदारियों की आंधी ने उन दोनों को सालों तक एक-दूसरे से दूर रखा था। आज लगभग दस साल बाद दोनों एक कॉमन फ्रेंड के ज़रिए दोबारा मिले थे।

मयंक ने पल्लवी के सामने वाली कुर्सी खींची और बैठ गया। उसने पल्लवी के चेहरे को ध्यान से देखा। वक़्त ने पल्लवी के चेहरे पर कुछ लकीरें ज़रूर खींच दी थीं,

लेकिन उसकी आँखों की वो चमक और गहराई आज भी वैसी ही थी। दोनों के बीच कुछ देर तक पुरानी यादों और दोस्तों की बातें होती रहीं, लेकिन फिर बात पल्लवी के उस फैसले पर आ गई, जिसने मयंक को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था।

“पल्लवी, तुम सच में बहुत महान हो। तुमने अपने परिवार के लिए जो किया, वो कोई आम इंसान सोच भी नहीं सकता। तुमने खुद का बलिदान दिया, और वो भी एक बार नहीं, बल्कि दो-दो बार। पहली बार अपने भाई-बहनों को पालने के लिए तुमने अपनी शादी नहीं की, अपने करियर के सपने छोड़ दिए। और दूसरी बार…

जब उन भाई-बहनों की ज़िंदगी संवर गई, तो उनकी खुशी के लिए तुमने अपना वो घर ही छोड़ दिया, जिसे तुमने अपने खून-पसीने से सींचा था। जो घर तुम्हारी सबसे प्रिय जगह थी, जहाँ तुम्हारी माँ की यादें थीं,” मयंक ने अपना सिर झुकाकर बेहद आदर और भारी आवाज़ में कहा। 

मयंक को अंदर ही अंदर बहुत गर्व महसूस हो रहा था कि उसकी दोस्त ने अपने परिवार के हित के लिए इतना बड़ा बलिदान दिया है। उस समर्पण को देखकर मयंक के मन में पल्लवी के लिए एक गहरी श्रद्धा और एक अनकहा प्यार उमड़ रहा था।

पल्लवी ने एक ठंडी आह भरी। उसकी आँखों के सामने उसका पूरा अतीत किसी फिल्म की रील की तरह घूमने लगा। जब वह बाइस साल की थी, तब एक कार एक्सीडेंट में उसके माता-पिता का देहांत हो गया था। पीछे रह गए थे एक चौदह साल का छोटा भाई, विवान, और दस साल की बहन, श्रुति।

पल्लवी उस वक्त अपनी एमबीए की पढ़ाई पूरी करके एक बड़े करियर के सपने देख रही थी। लेकिन हालात ने उसे रातों-रात एक माँ और एक पिता दोनों बना दिया। उसने अपनी पढ़ाई छोड़ी, एक मामूली सी क्लर्क की नौकरी जॉइन की और अपनी पूरी जवानी उन दोनों बच्चों को पढ़ाने-लिखाने में झोंक दी।

पल्लवी ने अपने लिए कभी कपड़े नहीं खरीदे, कभी किसी त्योहार पर अपने लिए कुछ नहीं मांगा। उसने विवान को इंजीनियर बनाया और श्रुति की एक बहुत अच्छे घर में शादी की। विवान की भी शादी हो गई। 

पल्लवी को लगा था कि अब उसकी ज़िम्मेदारियाँ पूरी हो गई हैं। अब वह अपने उसी पुश्तैनी घर में अपने भाई और बहू के साथ सुकून से रहेगी। लेकिन विवान की पत्नी, रिया को घर में पल्लवी का रहना खटकने लगा। उसे लगता था कि घर में पल्लवी की वजह से उसकी आज़ादी छिन रही है। रोज़-रोज़ के ताने, बात-बात पर क्लेश और भाई का अपनी पत्नी के आगे मजबूर होकर चुप रहना पल्लवी के दिल को चीरने लगा था।

जिस भाई के लिए उसने अपनी जवानी राख कर दी, आज उसी भाई के घर में वह एक ‘बोझ’ और ‘बाहरी’ बन गई थी। घर की शांति बनाए रखने और विवान का घर टूटने से बचाने के लिए, पल्लवी ने एक दिन अपना सामान पैक किया और उस पुश्तैनी घर को हमेशा के लिए छोड़ कर एक वर्किंग वुमन हॉस्टल में रहने आ गई। उसने अपनी माँ की निशानी वो घर भी अपने भाई के नाम कर दिया।

मयंक की आवाज़ ने पल्लवी को उसकी यादों से बाहर निकाला। “क्या तुम्हें इन इतने सालों में कभी किसी से प्यार हुआ है पल्लवी?” मयंक ने एक बहुत ही करीबी और अच्छे दोस्त की तरह उसकी आँखों में देखते हुए पूछा।

पल्लवी के होंठों पर एक बहुत ही फीकी और दर्द भरी मुस्कान आ गई। “पता नहीं मयंक। मेरे कंधों पर जवाबदारी इतनी बड़ी थी, और हालातों की धूप इतनी तेज़ थी कि प्यार की वो हल्की सी गरमाहट मैंने कभी महसूस ही नहीं की। जब मेरी उम्र प्यार करने की थी, तब मैं इस चिंता में जागती थी

कि विवान की फीस कैसे भरनी है और श्रुति के लिए कपड़े कहाँ से लाने हैं। प्यार करने के लिए मन में जो एक खाली जगह और फुर्सत चाहिए होती है, वो मुझे कभी मिली ही नहीं,” पल्लवी ऐसे बोली, जैसे उसके मन के किसी बहुत गहरे कोने में उस अनछुए प्यार की एक टीस या कसक अभी भी बाकी हो।

मयंक ने अपना हाथ मेज़ पर रखा और पल्लवी की तरफ थोड़ा झुकते हुए कहा, “लेकिन अब तो कोई जवाबदारी नहीं है तुम्हारे ऊपर। विवान और श्रुति दोनों अपनी-अपनी ज़िंदगी में खुश हैं। अब तुम क्यों नहीं शादी कर रही हो? अब तुम्हें अपने बारे में सोचना चाहिए।”

“सच बताऊं मयंक?” पल्लवी ने एक गहरी और हताशा भरी सांस ली। “एक तो अब उम्र बहुत हो गई है। पैंतीस की होने वाली हूँ मैं। इस उम्र में हमारे समाज में लड़कियों को सिर्फ समझौते मिलते हैं, जीवनसाथी नहीं। और दूसरा, अब इस उम्र में मुझे कौन ढूंढेगा? न मेरे सिर पर पिता का साया है, न ही मेरे उस भाई को मेरी कोई फिक्र है जिसके लिए मैंने सब कुछ लुटा दिया। अकेले अपने लिए लड़का ढूंढना और फिर उस पर भरोसा करना… ये सब अब मेरे बस का नहीं है।” उसने अपनी बात खत्म करते हुए कॉफी का कप उठाया।

मयंक ने तुरंत टोका, “ये क्या बेवकूफी वाली बात है पल्लवी? चौंतीस-पैंतीस साल की उम्र कोई बहुत बड़ी उम्र नहीं होती। ज़िंदगी तो किसी भी उम्र में नई शुरुआत कर सकती है।”

पल्लवी ने उसकी बात को टालने के इरादे से मुस्कुरा कर कहा, “देखते हैं, ज़िंदगी अब किस मोड़ पर ले जाती है। जो किस्मत में होगा, वो मिल ही जाएगा।” फिर उसने अचानक मयंक की तरफ अपनी नज़रें गड़ाईं और एक सवाल दाग दिया, “चलो मेरी बात तो छोड़ो। तुम्हारी उम्र भी तो बिल्कुल मेरे जितनी ही है, पैंतीस साल। फिर तुमने क्यों अभी तक शादी नहीं की? तुम तो एक अच्छी कंपनी में मैनेजर हो, शक्ल-सूरत भी अच्छी है। तुम्हें क्या परेशानी थी?”

यह सवाल सुनकर मयंक की मुस्कान भी अचानक गायब हो गई। उसने नज़रे चुराते हुए खिड़की के बाहर देखना शुरू कर दिया। कुछ पल की खामोशी के बाद मयंक ने बोलना शुरू किया, “मेरी कहानी भी तुमसे कुछ ज्यादा अलग नहीं है पल्लवी। तुम्हें याद है जब हम कॉलेज के आखिरी साल में थे, तब मेरे पिताजी का व्यापार में बहुत बड़ा नुकसान हुआ था? पिताजी उस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाए और हमें कर्ज़ के एक बहुत बड़े पहाड़ के नीचे छोड़कर दुनिया से चले गए। पीछे रह गई थीं मेरी बीमार माँ और तीन छोटी बहनें।”

पल्लवी ध्यान से सुन रही थी। उसे याद आया कि कॉलेज के दिनों में मयंक अचानक कितना शांत और गंभीर हो गया था। 

मयंक ने आगे कहा, “पिताजी के जाने के बाद कर्ज़दारों ने घर के बाहर लाइन लगा दी थी। मुझे अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर नौकरी करनी पड़ी। दिन में ऑफिस और रात में एक कॉल सेंटर में काम करता था। एक-एक पाई जोड़कर पहले वो सारा कर्ज़ चुकाया, ताकि मेरी माँ को कोई ताने न मार सके। फिर तीनों बहनों की एक-एक करके शादी की। सबसे छोटी बहन की शादी तो पिछले साल ही हुई है। माँ भी काफी बीमार रहने लगी थीं, उनका इलाज करवाते-करवाते और बहनों का घर बसाते-बसाते मुझे पता ही नहीं चला कि मैं खुद कब पैंतीस साल का हो गया। पिछले महीने ही माँ भी इस दुनिया से चली गईं। अब मेरे पास एक बहुत बड़ा घर है, बैंक बैलेंस है, लेकिन उस घर में मेरा इंतज़ार करने वाला कोई नहीं है।”

मयंक की बातें सुनकर पल्लवी की आँखें छलक आईं। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि जो लड़का कॉलेज में इतना चुलबुला और लापरवाह हुआ करता था, उसने अपने अंदर इतने बड़े संघर्ष को छिपा रखा है। दोनों की कहानियाँ कितनी मिलती-जुलती थीं। दोनों ने ही अपने यौवन के सबसे खूबसूरत दिन अपने परिवार की ज़रूरतों की वेदी पर चढ़ा दिए थे। और आज जब वो दोनों अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियों से आज़ाद हुए थे, तो दोनों के पास सिर्फ अकेलापन और खालीपन था।

कैफे में बज रहे गाने की धुन अब बदल चुकी थी। बाहर बारिश शुरू हो गई थी। मयंक ने पल्लवी की आँखों में झांकते हुए बहुत ही धीमी लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा, “पल्लवी, हम दोनों ने अपनी पूरी ज़िंदगी दूसरों के लिए जी है। हमने अपने-अपने हिस्से का फर्ज़ बहुत ईमानदारी से निभाया है। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि हम खुद को सज़ा दें और बाकी की ज़िंदगी इस अकेलेपन में काट दें?”

पल्लवी ने हैरानी से मयंक की तरफ देखा। “तुम क्या कहना चाहते हो मयंक?”

मयंक ने मेज़ पर रखे पल्लवी के हाथ को अपने हाथों में ले लिया। पल्लवी ने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा। मयंक के हाथों के उस स्पर्श में एक अजीब सी सच्चाई और अपनापन था। 

“मैं यह कहना चाहता हूँ पल्लवी कि हम दोनों एक-दूसरे के दर्द और एक-दूसरे के बलिदान को बहुत अच्छी तरह से समझते हैं। मुझे एक ऐसी जीवनसाथी की तलाश नहीं है जो सिर्फ मेरे घर की शोभा बढ़ाए, बल्कि मुझे एक ऐसी हमसफ़र चाहिए जो मेरी खामोशी को समझ सके। और तुमसे बेहतर मुझे कौन समझ सकता है? क्या तुम इस उम्र के तकाज़े और दुनिया की परवाह किए बिना, अपनी ज़िंदगी की यह दूसरी पारी मेरे साथ शुरू करना चाहोगी? क्या तुम मुझसे शादी करोगी पल्लवी?”

पल्लवी सन्न रह गई। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मयंक उससे यह बात कहेगा। उसकी आँखों से आंसुओं की एक धारा बह निकली। यह आंसू दुख के नहीं थे, बल्कि उस राहत के थे जो सालों की घुटन के बाद किसी इंसान को मिलती है। जिस समाज और जिस परिवार ने उसे ‘ज़िम्मेदारी’ का तमगा पहनाकर एक कोने में छोड़ दिया था, आज उसी दुनिया में एक इंसान उसे उसके बलिदान के लिए ही सबसे ज़्यादा सम्मान दे रहा था। 

पल्लवी ने अपने आंसू पोंछे, मयंक के हाथों को कसकर पकड़ा और एक बहुत ही खूबसूरत, आज़ाद और निश्छल मुस्कान के साथ हाँ में सिर हिला दिया। उस सर्द दिसंबर की शाम में, ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दबे दो अकेले दिलों ने अपनी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत और नई शुरुआत की थी। उन्हें समझ आ गया था कि प्यार और साथ की कोई उम्र नहीं होती, और जो लोग दूसरों के लिए अपनी खुशियाँ कुर्बान करते हैं, ईश्वर उन्हें कभी खाली हाथ नहीं छोड़ता।

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 लेखक : विजय सीकर

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