घर में बहुत चहल-पहल थी इतने मेहमान आए हुए थे अनुराग और उसकी पत्नी अनुपमा दोनों ही व्यस्त थे और मेहमानों की व्यवस्था में, घर की सजावट में लगे हुए थे क्यों ना लगें उनकी इकलौती बेटी अनुश्री की सगाई और शादी जो थी! उज्जैन शहर के बहुत बड़े हीरे के व्यापारी सियाराम जी का बेटा सूर्यांश से अपनी बेटी की शादी कर रहे थे
वह अनुश्री को बहुत ज्यादा चाहते थे क्योंकि अनुराग और अनुपमा के कोई बच्चा नहीं था डॉक्टर के पूरी कोशिश करने के बाद भी जब कोई औलाद नहीं हुई तो अचानक 8 साल बाद अनुश्री मिली थी।
अनुपमा अपने ख्यालों में खो जाती है वह कितना भाग्यशाली दिन था जिस दिन उन्हें अनुश्री मिली उन्हें याद है वह किसी फंक्शन में शामिल होने जा रहे थे उज्जैन से बेंगलुरु जब वह बेंगलुरु पहुंचे तो रेलवे स्टेशन पर एक बच्ची ने अनुपमा का आंचल पकड़ लिया और जोर-जोर से रोने लगी मां- तुम आ गईं? मां- तुम आ गईं? अनुपमा से भी रहा नहीं गया
और उसने बच्ची को गोद में उठा लिया इतने में अनाथ आश्रम के मलिक दौड़ते हुए आए और उन्होंने बच्ची को ले लिया और बोले जैसे ही ट्रेन की सीटी बजती है बेटी अनु दौड़ती हुई रेलवे स्टेशन पर आती है और रेल की पुरानी टूटी हुई पटरियों के पास बैठकर अपनी मां का इंतजार करती है।
चार साल पहले इसकी मां इसे छोड़कर चली गई थीं और बोल कर गई थीं कि मैं वापस आऊंगी तब तक इसको संभाल लो लेकिन वह नहीं आईं इस रेलवे स्टेशन के सामने ही अनाथ आश्रम है पर बच्ची को मां से बिछड़ने का बहुत गहरा सदमा लगा अनु अपनी मां को याद करके ट्रेन की सिटी बजते ही दौड़कर यहां आ जाती है
क्योंकि उसने मां को ट्रेन में चढ़ते हुए देख लिया था और अनु बेटी मेरी गोद में थी जोर-जोर से रो रही थी मैं भी तब से उसकी मां का इंतजार कर रहा हूं आज यह 8 साल की हो गई पता नहीं उसे अपनी मां की शक्ल भी याद नहीं है लेकिन हर आने जाने वाले को बहुत ध्यान से देखती है पहली बार आपका पल्ला पड़कर मां बोली है।
अनुपमा एकदम भावुक हो जाती है और अनुराग से बोलती है अपने भी कोई औलाद नहीं है मुझे इससे एकदम ऐसा प्रेम हो गया है ऐसा लगता है जैसे भगवान ने मेरे लिए ही भेजा है, मैं ही इसकी मां हूं, मेरा इससे पिछले जन्म का कोई नाता है यह देखकर अनुराग ने कहा अच्छा तुम्हारी इच्छा है तो
अपन इसे गोद ले लेते हैं इससे अनु बेटी को भी माता-पिता का “सहारा” मिलेगा और अपन को एक सुंदर बेटी जो अपनी जिंदगी का “सहारा” बनेगी अनुराग और अनुपमा अनाथ आश्रम के मालिक से कहकर अनु को गोद ले लेते हैं। अनाथ आश्रम का मालिक भी अनु को अपनी बेटी की तरह मानता था लेकिन उसे अनु पर बहुत दया आती थी
कि उसकी मां ऐसे छोड़ कर चली गई लेकिन आज अनु की खुशी देखकर वह भी कुछ नहीं बोल पाया और तुरंत अनुराग और अनुपमा को अनु बेटी को गोद देने के लिए तैयार हो गया लेकिन उसने एक शर्त लगाई कि मैं पहले आपका घर परिवार देखुंगा मुझे यह पता चल जाए कि यह बच्ची अच्छे परिवार में जा रही है तभी मैं इस बेटी को दे पाऊंगा।
अनाथ आश्रम के मालिक अजय ने जब अनुपमा और अनुराग के घर का पता किया तब उन्हें पता चला वह बहुत अच्छे संभ्रांत परिवार के लोग हैं और अनुराग गवर्नमेंट ऑफिसर हैं पैसे वाले हैं उनके कोई औलाद नहीं है और अनु को वह बहुत अच्छे से अपनी बेटी की तरह पालेंगे
यह देखकर अनाथ आश्रम के मालिक अजय ने उन दंपत्ति को अनु को देने का फैसला कर लिया तो उसके बाद अजय ने समय-समय पर अनु बेटी से मिलने का वादा किया क्योंकि उसे भी बहुत मोह हो गया था। अनुपमा और अनुराग जिस फंक्शन में जा रहे थे वहां न जाकर वापस अपने घर आकर फंक्शन मनाते हैं सारे रिश्तेदारों को अपने मिलने वालों को बुलाते हैं साथ ही अनाथ आश्रम के मलिक अजय को भी बुलाते हैं सभी लोग उस बच्ची को देखकर खुश हो जाते हैं
बच्ची बड़ी प्यारी थी सुंदर भी थी बिल्कुल लगता था कि जैसे इन्हीं की बेटी हो वह सब के बीच में उसका नामकरण संस्कार करते हैं उसका नाम अनुश्री रखते हैं अनु तो पहले ही थी लेकिन श्री लगाकर उन्होंने कहा कि लक्ष्मी का आगमन हो गया है मेरे घर में रौनक हो गई देखते-देखते आज अनुश्री इतनी बड़ी हो गई उसने इंजीनियरिंग पास कर ली और अनुश्री की शादी इतने बड़े व्यापारी के बेटे से हो रही है।
व्यापारी सियाराम जी का बेटा सूर्यांश बहुत ही संस्कारी था इतना पैसा होने के बाद भी वह अपने घर परिवार के सभी सदस्यों को बहुत चाहता था और सब का ध्यान रखता था और पढ़ा लिखा भी था उसने भी इंजीनियरिंग की थी विदेश से पढ़ाई करके आया था लेकिन अपने पापा के इतने बड़े बिजनेस में उसको हाथ बटाना था
जब वे अनुश्री से मिला और उनकी शादी की बात हुई अनुश्री को देखते ही सारे घर वालों ने उसे पसंद कर लिया क्योंकि वह थी इतनी सुंदर सूर्यांश भी अच्छे व्यक्तित्व वाला बहुत सुंदर और सुशील लड़का था इसलिए अनुश्री के माता-पिता ने भी उसको पसंद कर लिया सूर्यांश को देखकर अनुश्री भी मना नहीं कर पाई जब वे अनुश्री से मिला तो उसने अनुश्री से बोला
तुम पढ़ी लिखी हो इंजीनियरिंग किया है अगर तुम नौकरी करना चाहो तो कर सकती हो मुझे कोई परेशानी नहीं है घर में काम के लिए इतने नौकर चाकर लगे हैं बस तुम तो आराम से रहना पर मेरे माता-पिता, भाई, बहन, की इज्जत करना छोटा भाई दिव्यांश और बहन प्रियांशी है
दोनों अभी पढ़ाई कर रहे हैं सबके साथ घुलमिलकर रहना और मुझे कुछ नहीं चाहिए मैं तुम्हारे हर काम में एक दोस्त की तरह साथ दूंगा और तुम्हारा पूरा ध्यान रखूंगा कि तुम्हारा भी मान सम्मान हमारे परिवार में बड़ी बहू की तरह रहे और सब एक दूसरे का “सहारा” बनें यह सब सुनकर अनुश्री बहुत खुश हो जाती है इतना अच्छा पति मेरे लिए मेरे माता-पिता ने ढूंढा है।
अनुराग की आवाज सुनकर अनुपमा का ध्यान टूट जाता है अनुराग जोर से बोलता है अनुपमा तुम कहां खो गईं बारात आने का टाइम हो गया है जल्दी से आरती की थाली लाओ दूल्हा दरवाजे पर आने वाला है और अनुश्री तैयार हो गई क्या? अनुपमा ने अपनी ननद से बोला जाओ जल्दी देख कर आओ अनुश्री तैयार है
क्या बस देखते-देखते बारात दरवाजे पर आ गई चारों ओर शहनाइयों की गूंज से वातावरण संगीतमय हो गया अनुश्री बिल्कुल राजकुमारी की तरह लग रही थी सभी लोगों ने सूर्यांश और अनुश्री की बहुत तारीफ की अनुश्री के दादा- दादी भी
बहुत खुश थे दादा जी रायबहादुर और दादी सरस्वती सभी ने मिलकर बारात का स्वागत किया और देखते देखते सबके आशीर्वाद से अनुश्रीऔर सूर्यांश की शादी हो गई। आज अनुपमा और अनुराग दोनों ही बहुत खुश थे माता-पिता को बेटी के साथ-साथ दामाद का भी “सहारा” मिल गया।
सुनीता माथुर
अप्रकाशित मौलिक रचना
पुणे महाराष्ट्र
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