बेनाम रिश्तों की अनकही दास्तान – कृतिका भण्डारी

शाम के धुंधलके में बारिश की हल्की फुहारें शहर की सड़कों को भिगो रही थीं। ऑफिस की दसवीं मंजिल पर स्थित केबिन में खामोशी छाई हुई थी। यह खामोशी किसी उदासी की नहीं, बल्कि एक लंबे और सफल सफर के खत्म होने की थी। श्रुति अपनी डेस्क पर रखा अपना सारा सामान समेट रही थी।

पिछले दो सालों से जिस आर्किटेक्चरल प्रोजेक्ट पर वह और उसकी कंपनी काम कर रही थी, वह आज सफलतापूर्वक पूरा हो गया था। अब उसकी कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो चुका था और कल से उसे इस ऑफिस में नहीं आना था। फाइलों को बैग में डालते हुए श्रुति का मन एक अजीब सी बेचैनी से भरा हुआ था।

तभी दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई और राघव अंदर आया। राघव इस कंपनी का डायरेक्टर था और पिछले दो सालों में वह श्रुति का सबसे अच्छा दोस्त, मेंटर और न जाने कब उसके दिल के सबसे करीब का इंसान बन गया था। 

राघव को देखते ही श्रुति ने अपनी भावनाओं को छिपाने की कोशिश करते हुए एक फीकी सी मुस्कान दी। “तो… फाइनली प्रोजेक्ट खत्म हो गया,” श्रुति ने कहा। राघव धीरे-धीरे चलते हुए श्रुति की डेस्क के पास आया।

उसकी आँखों में एक गहरी गंभीरता थी। उसने श्रुति की ओर देखते हुए बहुत ही शांत स्वर में कहा, “प्रोजेक्ट खत्म हुआ है श्रुति, हमारा सफर नहीं। हमारे ऑफिस के रास्ते भले ही कल से अलग हो जाएं, लेकिन अगर तुम चाहो, तो हमारी जिंदगी के रास्ते हमेशा के लिए एक हो सकते हैं।” 

राघव की बात सुनकर श्रुति के हाथ ठिठक गए। उसके चेहरे पर आश्चर्य, घबराहट और एक अनजानी सी खुशी के अनगिनत भाव एक साथ उभर आए। उसने अविश्वास से राघव की ओर देखा। राघव ने बिना अपनी पलकें झपकाए कहा, “क्या तुम मुझसे शादी करोगी, श्रुति?” 

यह वह सवाल था जिसे सुनने के लिए श्रुति का दिल न जाने कब से तरस रहा था, लेकिन इस सवाल के साथ ही उसके मन की गहराइयों में दबी हुई एक गहरी पीड़ा ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ी। उसने अपने कांपते हुए हाथों को मेज पर रखा और एक लंबी सांस लेते हुए खुद को संयमित करने की कोशिश की। उसकी आँखों में आंसू तैरने लगे थे। 

“राघव, तुम नहीं जानते कि तुम क्या कह रहे हो,” श्रुति की आवाज़ भर्राई हुई थी। “तुम्हें शायद यह भी नहीं पता कि मैं असल में कौन हूँ। सच कहूं तो, मुझे खुद भी नहीं पता कि मैं कौन हूँ। क्या तुम सच में एक ऐसी लड़की को अपने परिवार का हिस्सा बनाना चाहोगे, जिसके नाम के आगे लगाने के लिए कोई सरनेम नहीं है? जिसकी कोई जाति नहीं है, कोई धर्म नहीं है? कोई खानदान, कोई पुश्तैनी पहचान नहीं है? राघव, मैं एक अनाथ हूँ। मेरे माता-पिता कौन थे, मुझे जन्म देकर किसने लावारिस छोड़ दिया, मैं कुछ नहीं जानती। मेरी पूरी जिंदगी ‘नवजीवन’ नाम के एक अनाथालय की चारदीवारी में गुजरी है। मेरे पास तुम्हें या तुम्हारे परिवार को देने के लिए कोई ‘पहचान’ नहीं है।” यह सब कहते-कहते श्रुति का कंठ पूरी तरह भर आया और उसके गालों पर आंसू लुढ़क पड़े। वह हमेशा से इस सच को लेकर हीन भावना का शिकार रही थी। समाज ने हमेशा उसे बिना जड़ों के पेड़ की तरह देखा था।

श्रुति की सारी बातें सुनने के बाद राघव के चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी। वह अपनी जगह पर अडिग खड़ा रहा। उसने आगे बढ़कर श्रुति के कांपते हुए हाथों को अपने हाथों में ले लिया और एक बेहद कोमल लेकिन दृढ़ स्वर में बोला, “श्रुति, मुझे यह सब आज नहीं पता चला है। मैं पहले दिन से ही तुम्हारा पूरा सच जानता हूँ। जब तुमने हमारी कंपनी में इंटरव्यू दिया था, तब मैंने तुम्हारी फाइल पढ़ी थी, जिसमें कोई सरनेम नहीं था, पिता के नाम की जगह एक लकीर खिंची थी और पते की जगह एक अनाथालय का नाम था। मैंने तुमसे प्यार तुम्हारे किसी गोत्र या खानदान को देखकर नहीं किया है। मैंने उस श्रुति से प्यार किया है जो अपनी मेहनत से यहाँ तक पहुँची है, जिसकी आत्मा इतनी पवित्र है और जिसके संस्कार किसी भी ऊंचे खानदान की लड़की से कहीं ज्यादा ऊंचे हैं। मुझे तुम्हारी कोई पुश्तैनी पहचान नहीं चाहिए, क्योंकि आज से मेरी पहचान ही तुम्हारी पहचान होगी।”

राघव के इन शब्दों ने श्रुति के भीतर बरसों से जमी हुई बर्फ को पिघला दिया। वह फूट-फूट कर रो पड़ी। राघव ने उसे अपने गले से लगा लिया और उसे रोने दिया, ताकि उसके मन का सारा बोझ आंसुओं के रास्ते बह जाए। 

लेकिन यह तो सिर्फ इस कहानी की शुरुआत थी। असली परीक्षा तो अभी बाकी थी। राघव का परिवार बनारस के एक बहुत ही प्रतिष्ठित और संभ्रांत ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखता था। उसके पिता, पंडित दीनानाथ, शहर के जाने-माने विद्वान थे और उसकी माँ, सुमित्रा देवी, परंपराओं और खानदानी रुतबे को अपनी जान से ज्यादा मानती थीं। उनके घर में हर छोटा-बड़ा काम शुभ मुहूर्त, गोत्र और जाति-पाति को देखकर होता था। जब राघव ने अपने परिवार को बताया कि उसने अपने लिए जीवनसाथी चुन लिया है, तो घर में खुशी की लहर दौड़ गई। लेकिन राघव जानता था कि श्रुति का सच जब उनके सामने आएगा, तो तूफान मचना तय है। 

कुछ दिनों बाद राघव श्रुति को लेकर बनारस पहुँचा। गंगा के किनारे बने उस विशाल पुश्तैनी हवेली को देखकर श्रुति घबरा रही थी। उसे लग रहा था जैसे वह किसी ऐसी दुनिया में आ गई है जहाँ उसका कोई वजूद ही नहीं है। सुमित्रा देवी ने अपनी होने वाली बहू का बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया। श्रुति की सादगी और उसकी सुंदरता देखकर वे बहुत प्रसन्न हुईं। ड्राइंग रूम में पूरा परिवार बैठा था। पंडित दीनानाथ ने मुस्कुराते हुए पूछा, “बेटी, तुम्हारे पिता जी क्या करते हैं? और तुम्हारा गोत्र क्या है? विवाह की कुंडली मिलवानी होगी।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। राघव कुछ बोलने ही वाला था कि श्रुति ने उसे इशारे से रोक दिया। उसने तय किया था कि वह अपने नए रिश्ते की शुरुआत किसी छलावे या किसी और के सहारे से नहीं करेगी। श्रुति ने अपने दोनों हाथ जोड़े और विनम्रता से, लेकिन स्पष्ट स्वर में कहा, “माफ़ कीजिएगा बाबूजी, मेरे पास कोई जन्मपत्री नहीं है। मैं नहीं जानती कि मेरे माता-पिता कौन हैं। मेरा कोई गोत्र या जाति नहीं है। मेरा पालन-पोषण एक अनाथ आश्रम में हुआ है।”

यह सुनते ही कमरे का माहौल एकदम से बदल गया। सुमित्रा देवी के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई और उसकी जगह एक गहरे सदमे और क्रोध ने ले ली। दीनानाथ जी के हाथ से चाय का प्याला छूटते-छूटते बचा। 

“यह तुम क्या कह रहे हो राघव?” सुमित्रा देवी लगभग चिल्लाते हुए बोलीं। “एक लावारिस लड़की? जिसका ना कोई कुल है, ना कोई गोत्र… उसे तुम इस खानदान की बहू बनाना चाहते हो? हमारे पुरखे क्या कहेंगे? समाज में हमारी क्या इज्जत रह जाएगी? जिस घर में आज तक बिना कुल-शील जाने किसी का पानी तक नहीं पिया गया, उस घर में मैं एक सड़क से उठाई हुई लड़की को अपनी बहू बनाकर नहीं ला सकती!”

राघव ने अपनी माँ को समझाने की बहुत कोशिश की, “माँ, आप इंसान के जन्म को देख रही हैं, उसके कर्मों को नहीं। श्रुति जैसी संस्कारी और सुलझी हुई लड़की मैंने आज तक नहीं देखी।” 

लेकिन सुमित्रा देवी कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थीं। उन्होंने साफ कह दिया कि अगर राघव ने इस लड़की से शादी की, तो इस घर के दरवाजे उसके लिए हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। श्रुति यह सब देख कर भीतर तक टूट गई। उसने राघव से कहा कि वह नहीं चाहती कि उसकी वजह से एक बेटा अपनी माँ से अलग हो जाए। उसने तुरंत अपना बैग उठाया और बनारस से वापस लौटने का फैसला कर लिया। 

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। उसी रात बनारस में भयंकर आंधी-तूफान आ गया। शहर की बिजली गुल हो गई और सारी ट्रेनें रद्द कर दी गईं। मजबूरी में श्रुति को दो दिन और उसी घर में रुकना पड़ा। सुमित्रा देवी ने श्रुति से बात करना तो दूर, उसकी तरफ देखना भी बंद कर दिया था। लेकिन इन दो दिनों में श्रुति ने हवेली के एक कोने में चुपचाप रहकर कुछ ऐसा किया जिसने धीरे-धीरे घर के माहौल को बदलना शुरू कर दिया। 

अगली सुबह जब सुमित्रा देवी उठीं, तो उन्होंने देखा कि हवेली के आँगन में स्थित तुलसी के पौधे के पास कोई दीया जला रहा है। यह श्रुति थी। उसने पूरे आँगन को साफ किया था और नहा-धोकर बिना किसी से कुछ कहे, भगवान की आरती कर रही थी। उसकी आवाज़ में इतना दर्द और इतनी मिठास थी कि दीनानाथ जी भी अपने कमरे से बाहर निकल आए। दिन भर श्रुति ने घर के हर काम में मदद की, बिना किसी अधिकार के। उसने रसोई में जाकर ऐसा सात्विक भोजन बनाया, जिसे खाकर दीनानाथ जी को अपनी स्वर्गवासी माँ के हाथ के स्वाद की याद आ गई। 

तीसरे दिन की शाम को अचानक सुमित्रा देवी बाथरूम में फिसल कर गिर पड़ीं। उनकी चीख सुनकर पूरा घर इकट्ठा हो गया। उनके पैर की हड्डी टूट गई थी और उन्हें तेज बुखार चढ़ गया। डॉक्टर ने कहा कि उन्हें कम से कम एक महीने तक पूरी तरह बिस्तर पर रहना होगा और बहुत देखभाल की जरूरत होगी। घर के बाकी रिश्तेदार और नौकर-चाकर बस दूर से सहानुभूति जता रहे थे। 

तब श्रुति आगे आई। उसने अपनी वापसी की टिकट फाड़ दी। दिन-रात एक करके उसने सुमित्रा देवी की सेवा की। रात-रात भर जागकर उनके पैरों की सिंकाई करना, उन्हें समय पर दवा देना, उन्हें अपने हाथों से खाना खिलाना और जब वे दर्द से कराहतीं, तो उनके सिरहाने बैठकर उन्हें रामचरितमानस का पाठ सुनाना—श्रुति ने एक सगी बेटी से भी बढ़कर उनकी देखभाल की। अनाथालय में पलने के कारण सेवा और समर्पण उसके स्वभाव में बसा हुआ था। 

एक रात जब सुमित्रा देवी को दर्द के कारण नींद नहीं आ रही थी, उन्होंने देखा कि श्रुति उनके बिस्तर के पास जमीन पर ही सो गई है। उसका चेहरा थकान से पीला पड़ गया था, लेकिन उसके होठों पर एक अजीब सी शांति थी। सुमित्रा देवी की आँखों से आंसू बह निकले। उन्हें समझ आ गया था कि ऊंचे कुल और गोत्र का अहंकार सिर्फ एक भ्रम है। जिस खानदान पर उन्हें इतना गर्व था, उस खानदान का कोई भी सगा रिश्तेदार उनके इस कष्ट में उनके पास नहीं बैठा था। और जिस अनाथ लड़की को उन्होंने दुत्कार दिया था, वह अपनी जान की परवाह किए बिना उनकी सेवा कर रही थी। 

अगली सुबह जब श्रुति सुमित्रा देवी को दवा देने आई, तो सुमित्रा देवी ने अचानक उसका हाथ पकड़ लिया। श्रुति घबरा गई कि शायद उससे कोई गलती हो गई है। लेकिन सुमित्रा देवी ने उसे खींचकर अपने सीने से लगा लिया और फूट-फूट कर रोने लगीं। 

“मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची,” सुमित्रा देवी ने रुंधे हुए गले से कहा। “मैं अंधी हो गई थी। मैं बाहर के झूठे गोत्र और कुल को ढूंढती रही, और यह भूल गई कि इंसान का सबसे बड़ा कुल उसकी इंसानियत होती है। जिस कोख से कोई जन्म नहीं लेता, उसका मतलब यह नहीं कि वह लावारिस है। भगवान ने तुझे इसलिए किसी एक घर में नहीं भेजा, क्योंकि उसे तुझे मेरे घर की लक्ष्मी बनाना था।”

सुमित्रा देवी ने अपने हाथों से अपने पुश्तैनी सोने के कंगन उतारे और श्रुति के हाथों में पहना दिए। उन्होंने दीनानाथ जी और राघव को बुलाकर कहा, “पंडित जी, शादी की तैयारियां शुरू कीजिए। मेरी बहू को किसी गोत्र की जरूरत नहीं है, आज से इस घर का नाम ही इसकी पहचान है।”

श्रुति की आँखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। आज उसे न सिर्फ अपना प्यार मिला था, बल्कि एक ऐसा परिवार भी मिल गया था, जिसके लिए वह जीवन भर तरसती रही थी। उसने साबित कर दिया था कि प्रेम, समर्पण और संस्कारों के आगे दुनिया की हर दीवार गिर जाती है।

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दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या आज के आधुनिक समाज में भी हम इंसान की पहचान उसके कुल और गोत्र से करते हैं या उसके कर्मों से? अगर आपके सामने कभी ऐसी स्थिति आए तो आप क्या करेंगे? अपने विचार कमेंट करके जरूर बताएं, मुझे आपके जवाब का इंतज़ार रहेगा।

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लेखिका : कृतिका भण्डारी

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