जब स्वाभिमान ने तोड़ी अपमान की बेड़ियां – निधि सहाय

अवनि आज बहुत देर तक आईने के सामने खड़ी रही। कांच में उभरने वाला अक्स उसे अपना सा नहीं लग रहा था। यह वह अवनि तो बिल्कुल नहीं थी जो पांच साल पहले इस घर में दुल्हन बनकर आई थी। तब वह छरहरी थी, उसके चेहरे पर एक अलग सा नूर था और उसके पति सार्थक की नज़रें उस पर से हटती ही नहीं थीं।

लेकिन आज, आईने में उसे एक ऐसी औरत दिखाई दे रही थी जिसका शरीर एक मुश्किल प्रेगनेंसी और थायरॉइड की बीमारी के बाद काफी भारी हो गया था। उसके पेट पर स्ट्रेच मार्क्स थे और चेहरे पर एक अजीब सी थकान। लेकिन जो चीज़ उसे सबसे ज़्यादा बदसूरत बना रही थी,

वह उसका बढ़ा हुआ वज़न नहीं, बल्कि सार्थक की वह नफरत भरी आवाज़ थी जो पिछले कई महीनों से उसके कानों में गूंज रही थी और उसकी आत्मा को छलनी कर रही थी।

शादी के शुरुआती कुछ साल बहुत खूबसूरत बीते थे। सार्थक हर जगह अवनि को अपने साथ लेकर जाता था। उसे अवनि की खूबसूरती पर नाज़ था। लेकिन जैसे ही उनके बेटे आरव का जन्म हुआ, अवनि के शरीर में हॉर्मोनल बदलाव आने लगे। वह बीमार रहने लगी और दवाइयों के असर से उसका वज़न तेज़ी से बढ़ने लगा।

शुरू में सार्थक ने इसे सामान्य माना, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया और अवनि का वज़न कम नहीं हुआ, सार्थक का नज़रिया बदलने लगा। वह नज़रिया जो कभी प्यार से भरा होता था, अब उसमें एक चुभन सी आ गई थी। 

शुरुआत मज़ाक से हुई थी। खाने की मेज़ पर परिवार के सामने सार्थक अक्सर कह देता, “अरे अवनि, अब और मत खाओ, वरना घर के दरवाज़े चौड़े करवाने पड़ेंगे।” परिवार के लोग इस बात पर हंस देते। अवनि भी मुस्कुरा कर बात टाल देती, लेकिन निवाले उसके गले में अटक जाते।

उसे लगता कि शायद सार्थक बस मज़ाक कर रहा है, लेकिन धीरे-धीरे यह मज़ाक अपमान में बदलने लगा। सार्थक ने अवनि के साथ बाहर जाना लगभग बंद कर दिया था। कोई पार्टी हो, परिवार का कोई फंक्शन हो

या दोस्तों के साथ वीकेंड का डिनर, सार्थक कोई न कोई बहाना बना देता। “तुम घर पर ही रुक जाओ, आरव छोटा है,” या “मेरी कोई खास पार्टी नहीं है, तुम्हें बोरियत होगी।” अवनि सब समझती थी। वह जानती थी कि सार्थक उसे दुनिया की नज़रों से छिपाना चाहता है क्योंकि वह अब उसके ‘स्टेटस’ से मैच नहीं करती थी।

अवनि खामोश रहती। वह खुद को कसूरवार मानती थी। वह हर दिन नए-नए डाइट प्लान आज़माती, घंटों भूखी रहती, लेकिन थायरॉइड की वजह से वज़न टस से मस नहीं होता। उसकी इस खामोशी ने सार्थक को और भी निर्दयी बना दिया था। अब वह सबके सामने भी उसे ‘मोटी’ या ‘हाथी’ कहने से नहीं हिचकिचाता था। उसका हर तंज अवनि के आत्मविश्वास की एक-एक ईंट को गिरा रहा था।

चीज़ें तब बर्दाश्त के बाहर हो गईं जब सार्थक की चचेरी बहन की शादी का मौका आया। पूरा घर रोशनी और मेहमानों से भरा हुआ था। अवनि ने इस दिन के लिए बहुत अरमानों से एक महँगी साड़ी खरीदी थी। वह घंटों तैयार हुई, इस उम्मीद में कि शायद आज सार्थक की आँखों में वही पुराना प्यार दिख जाए। जब वह तैयार होकर कमरे से बाहर आई, तो सार्थक वहां खड़ा फोन पर किसी से बात कर रहा था। अवनि मुस्कुराते हुए उसके पास गई और पूछा, “कैसी लग रही हूँ मैं?” सार्थक ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, उसके चेहरे पर एक अरुचि का भाव आया और उसने मुंह फेर कर कहा, “ठीक ही लग रही हो, साड़ी अच्छी है।” अवनि का दिल बैठ गया। 

शादी के पूरे माहौल में सार्थक ने अवनि से दूरी बनाए रखी। जब स्टेज पर फोटो खिंचवाने की बारी आई, तो अवनि सार्थक के बगल में जाकर खड़ी हो गई। सार्थक ने झिड़कते हुए धीरे से कहा, “तुम थोड़ा साइड में खड़ी हो जाओ, मैं अपने दोस्तों के साथ फोटो ले रहा हूँ।” अवनि के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उसने देखा कि सार्थक अपनी महिला मित्रों के साथ जो बहुत ही स्लिम और ट्रेंडी थीं, उनके साथ हंस-हंस कर तस्वीरें खिंचवा रहा था। अवनि एक कोने में खड़ी अपने आँसू रोकती रही।

रात को जब सभी मेहमान चले गए और कमरे में सिर्फ अवनि और सार्थक थे, तो अवनि के भीतर का दबा हुआ गुबार फूट पड़ा। उसने हिम्मत जुटाकर सार्थक से पूछ ही लिया, “सार्थक, आखिर तुम्हें क्या हो गया है? तुम मुझसे इतनी दूरियां क्यों बना रहे हो? हम एक ही घर में, एक ही कमरे में अजनबियों की तरह रहते हैं। तुम मेरी तरफ देखते भी नहीं। क्या हुआ है तुम्हें? तुम्हें पता है ना मैं तुमसे कितना प्यार करती हूँ।”

सार्थक, जो उस समय अपनी घड़ी उतार रहा था, अवनि की बात सुनकर अचानक पलट गया। उसके चेहरे पर एक अजीब सी झुंझलाहट और क्रूरता थी। उसने एक ठंडी और चुभती हुई हंसी हंसी और कहा, “ओह! कम ऑन अवनि। तुम सच में पूछ रही हो कि मुझे क्या हुआ है? एक बार इस कमरे के उस आदमकद आईने में जाकर खुद को देख तो लेती। अवनि, तुम कितनी मोटी हो गई हो! तुम एक बेडौल औरत बन चुकी हो। मैंने एक खूबसूरत, छरहरी और स्मार्ट अवनि से प्यार किया था और उसी से शादी की थी। एक ऐसी औरत से जो मेरे साथ चले तो लोग मुड़-मुड़ कर देखें। ना कि ऐसी जो मेरे बगल में खड़ी हो तो मुझे शर्मिंदगी महसूस हो। एक मोटी और बेडौल औरत के साथ रहकर मैं अपना मज़ाक नहीं बनवा सकता। हम अब एक दूसरे के स्तर के नहीं रहे, वी डोंट मैच ईच अदर एनीमोर। बात कड़वी है, लेकिन सच यही है।” 

सार्थक की इस बात ने अवनि को सिर से पांव तक सुन्न कर दिया। जैसे किसी ने उसके वजूद पर एक भारी हथौड़ा मार दिया हो। वह पलक झपकाना भी भूल गई। सार्थक की वह निर्लज्ज हंसी उसके कानों के पर्दे फाड़ रही थी। उस हंसी ने अवनि की आत्मा, उसके आत्मसम्मान और उस प्यार की धज्जियां उड़ा दीं जिसे वह अपनी पूरी ज़िंदगी मान बैठी थी। सार्थक अपना तकिया लेकर बाहर गेस्ट रूम में सोने चला गया, अवनि को उसके आंसुओं और टूटे हुए स्वाभिमान के साथ अकेला छोड़कर।

उस रात अवनि सोई नहीं। वह ज़मीन पर बैठकर बिलख-बिलख कर रोती रही। क्या प्यार इतना सतही होता है? क्या शादी के सात फेरे सिर्फ शरीर की सुंदरता के लिए थे? जिस शरीर ने मौत से लड़कर सार्थक के बच्चे को जन्म दिया, जिस शरीर ने इस परिवार के लिए अपनी रातों की नींदें हराम कीं, आज उसी शरीर को सार्थक ने एक कूड़े के ढेर की तरह नकार दिया था। 

सुबह हो चुकी थी। अवनि की आँखें सूज कर लाल हो गई थीं। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। अवनि की सास, सुमित्रा जी कमरे में आईं। सुमित्रा जी एक बहुत ही सुलझी हुई और समझदार महिला थीं। उन्होंने रात को सार्थक और अवनि की आवाज़ें सुन ली थीं। जब उन्होंने अवनि को ज़मीन पर बिखरा हुआ देखा, तो उनका दिल भर आया। वह अवनि के पास आईं और उसका सिर अपनी गोद में रख लिया।

“रो ले मेरी बच्ची, जितना रोना है रो ले,” सुमित्रा जी ने अवनि के बालों में हाथ फेरते हुए कहा। 

अवनि सुबकते हुए बोली, “माँ जी, क्या मैं सच में इतनी बदसूरत हो गई हूँ कि मेरा पति मुझे देखना भी पसंद नहीं करता? मेरा वज़न ही मेरा सबसे बड़ा गुनाह बन गया है। मेरा मन करता है कि मैं इस शरीर को कहीं मिटा दूँ।”

सुमित्रा जी ने अवनि का चेहरा अपने हाथों में लिया और उसकी आँखों में आँखें डालकर बहुत ही सख्त लेकिन प्यार भरे लहज़े में कहा, “अवनि, एक बात हमेशा याद रखना। एक औरत का शरीर उसका गहना नहीं है, उसका वजूद है। यह कोई सजावट की चीज़ नहीं है जिसे कोई जब चाहे पसंद करे और जब चाहे नकार दे। तुम्हारे इस शरीर ने एक जान को जन्म दिया है। इसने बीमारी की तकलीफ़ें झेली हैं। तुम्हारे ये निशान, ये बढ़ा हुआ वज़न तुम्हारी कमज़ोरी नहीं, तुम्हारी ताकत की गवाही हैं। और अगर मेरा बेटा इस बात को नहीं समझ सकता, तो वह अंधा है। उसने सिर्फ तुम्हारी चमड़ी से प्यार किया था, तुम्हारी रूह से नहीं। और जो इंसान रूह से प्यार न कर सके, उसके लिए अपने आँसू बहाना बंद करो।”

सुमित्रा जी की बातों ने अवनि के भीतर एक सोई हुई चिंगारी को हवा दे दी। जिस अपमान को वह अपनी किस्मत मानकर घुट रही थी, आज उसे उस अपमान के खिलाफ लड़ने की ताकत मिल रही थी और वह भी अपनी सास के रूप में मिले एक गुरु से। 

“तुम्हें किसी और के लिए पतली नहीं होना है अवनि। तुम्हें अपने लिए स्वस्थ होना है। सार्थक की नज़रों में खुद को साबित करने के लिए भूखी मत मरो। खुद से प्यार करना सीखो। जब तुम खुद का सम्मान करोगी, तो दुनिया भी करेगी। उठो और अपने इस टूटे हुए स्वाभिमान को वापस जोड़ो।” सुमित्रा जी यह कहकर वहां से चली गईं।

अवनि ने आईने की तरफ देखा। कल रात तक उसे वहां एक हारी हुई, बदसूरत औरत दिख रही थी, लेकिन आज उसे वहां एक ऐसी माँ, एक ऐसी इंसान दिख रही थी जो बहुत मज़बूत थी। उसने अपने आँसू पोंछे। उसने तय किया कि वह अब सार्थक के इस खोखले प्यार के लिए भीख नहीं मांगेगी। 

अगले कुछ दिनों में घर का माहौल एकदम बदल गया। अवनि ने सार्थक के व्यंग्य बाणों पर खामोश रहना छोड़ दिया। एक दिन जब नाश्ते की मेज़ पर सार्थक ने फिर से अवनि के पराठे खाने पर तंज कसा, “थोड़ा कम खाया करो, वैसे ही सांचे से बाहर आ रही हो,” तो अवनि इस बार सहमी नहीं। उसने पराठा साइड में रखा, सार्थक की आँखों में सीधा देखा और बहुत ही शांत और स्थिर आवाज़ में कहा, “सार्थक, मेरा शरीर कैसा है, इसका फैसला करने का हक़ मैंने तुम्हें नहीं दिया है। मेरा शरीर सांचे से बाहर इसलिए है क्योंकि इसने तुम्हारे बच्चे को अपनी कोख में पाला है। मेरी बीमारी मेरा चुनाव नहीं थी, लेकिन मेरा स्वाभिमान मेरा चुनाव है। तुमने कहा था ना कि हम मैच नहीं करते? तुम बिल्कुल सही थे। एक ऐसा इंसान जो प्यार की गहराई को सिर्फ एक ‘पतली कमर’ से मापता हो, वह मेरी जैसी मजबूत औरत के साथ सच में मैच नहीं कर सकता।”

सार्थक के हाथ से चाय का कप छलक गया। उसने कभी अवनि को इस तरह पलटकर जवाब देते हुए नहीं देखा था। परिवार के बाकी लोग भी सन्न थे, लेकिन सुमित्रा जी के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान थी।

“मैं आज से खुद पर ध्यान दूंगी,” अवनि ने आगे कहा। “लेकिन तुम्हारे लिए नहीं, तुम्हारे खोखले स्टेटस के लिए नहीं, बल्कि खुद के लिए। क्योंकि मैं जीना चाहती हूँ, स्वस्थ रहना चाहती हूँ। और हां, आइंदा से मेरे शरीर पर कोई टिप्पणी करने की जुर्रत मत करना, क्योंकि जो इंसान मेरी कमियों के साथ मुझे इज़्ज़त नहीं दे सकता, मुझे उसका प्यार भी नहीं चाहिए।”

उस दिन के बाद अवनि ने अपनी ज़िंदगी का रुख बदल दिया। उसने योग शुरू किया, एक अच्छे डॉक्टर से अपना थायरॉइड का इलाज करवाया। उसने एक स्कूल में पढ़ाने की नौकरी भी ढूंढ ली। वह दिन-ब-दिन निखरने लगी, शारीरिक रूप से नहीं, बल्कि मानसिक रूप से। उसके चेहरे पर जो आत्मविश्वास लौट कर आया था, वह दुनिया के किसी भी मेकअप से ज़्यादा खूबसूरत था।

सार्थक को अपनी गलती का एहसास होने लगा था। उसने देखा कि जिस अवनि को उसने कमज़ोर और बेचारी समझकर अपमानित किया था, वह दरअसल एक आग थी। सार्थक ने कई बार अवनि से बात करने की, माफ़ी मांगने की कोशिश की, लेकिन अवनि ने अपने और सार्थक के बीच एक ऐसी लकीर खींच दी थी जिसे सार्थक के लिए पार करना अब नामुमकिन था। अवनि अब सार्थक की मोहताज नहीं थी। उसने अपनी कीमत जान ली थी। उसे समझ आ गया था कि जो प्यार शर्त लगाकर किया जाए, वह प्यार नहीं, सिर्फ एक सौदा होता है। और अवनि ने उस सौदे से खुद को हमेशा के लिए आज़ाद कर लिया था।

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दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या एक पति या पत्नी को अपने जीवनसाथी के शारीरिक बदलावों पर उनका इस तरह अपमान करने का हक़ है? क्या अवनि ने सार्थक को उसकी जगह दिखा कर सही किया? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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लेखिका : निधि सहाय

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